वही पुराना घिसा पिटा दिन

वही पुराना घिसा पिटा दिन अपने हिस्से में आया
जो इतिहास बदलना चाहा गया वही फिर दोहराया

वही पेड़ की शाखा लटका मकड़ी के जाले सा दिन
वही पृष्ठ कोरे यादों के रह रह चुभते बन कर पिन
वही लुटा बादल की गठरी हार थका बैठा अम्बर
वही घड़ी के काँटों पर से फ़िसल फिसल  जाते पल छिन

कल की प्रतिलिपि बन कर फिर से आज पुनः सम्मुख आया
एक पुराना राग बेसुरा गया आज फिर दोहराया

बैठी रही नदी के तीरे भोर आचमन किये बिना
और देखती रही दुपहरी हाथों पर की धुली हिना
रहा ताकता संझवाती का दिया अधर की चुप्पी को
और रात गिनने में बीती स्वप्न न आये कितने दिन

लटका रहा निशा के नभ पर अंधियारे का ही साया
टूटे हुए साज पर आकर कोई राग न बज पाया

रखा रहा टेबिल पर टेलीफोन आज भी बजा नही
भूला भटका पत्र कोई भी मिला पूछते पता नहीं
दरवाजे की काल बैल थी नींद कुम्भकर्णी सोई
आंगन की सूखी फुलवारी में पत्ता तक हिला नहीं

अंक बदलते कैलेंडर ने चित्र एक ही दिखलाया
साँचे में था ढला हुआ दिन, अपने हिस्से में आया
 

वही बीता हुआ कल

आज फिर से याद आया है वही बीता हुआ कल
जब हमारे रास्ते इक मोड़ पर आ मिल गये थे
प्रीत में डूबी हुई इक बांसुरी बजने लगी थी 
और ऊसर में हजारों फूल खुद आ खिल गए थे


आज यह प्रासाद मन का शून्य सा एकांत ओढ़े
ताकता सूने पड़े है फ़्रेम जो वातायनों के
चाहता है खींचना फिर से नज़र की कूँचियों से
चित्र जो थे साथ में हमने सँवारे मधुवनों के
प्यास  से आकुल हुआ मन ढूँढता है  तृप्ति सरगम
राग जिसके साँझ कीअंगनाई में शामिल हुए थे.

फिर संजीवित् हो गया है इक वही बीता हुआ कल
जब पुरानी डायरी के पृष्ठ सहसा फड़फड़ाए
और महकी फूल की सूखी  हुई इक पाँखरी वह
चूम कर जिसको तुम्हारे होंठ  बरबस मुस्कुराये 
 दृष्टि का आकाश फिर से हो रहा है इंद्रधनुषी
उन रंगो से जो तुम्हारी ओढ़नी से ढल गए थे 

एक सूनी दोपहर में इक वही बीता हुआ कल
आ नजर के सामने चलचित्र बन कर दौड़ता है
पालकी ले कर बढ़े जाते कहारों की गति के
चिह्न का आभास पल पल आ हृदय झकझोरता है
​और वे पल फिर हुए जीवंत जब परछाइयों पर 
पड़ तुम्हारे थरथराते नैन इक पल रुक गए थ

कुछ नई सम्भावनाएँ

साथ चलती हैं दिवस के बस यही कुछ कामनाएं
हों क्षितिज के पार शायद कुछ नई सम्भाभानाएँ
आस पगली खटखटाते द्वार हारी  आगतों का
पर समय विकलांग था असमर्थ, कुछ भी सुन न पाया
जो अपेक्षा ने सजाये चित्र सूखे रंग ले कर
मेघ ने नैराश्य के हर बार ही धोकर बहाया
भोर आकर सौंपती है कंठ को नव प्रार्थनाएं
हों परे शायद क्षितिज के कुछ नई संभावनाएं
धूप की दीवार पर मन खींचता है अल्पनाएँ
ले हवा की कूँचियों को, भोर के रंगों डुबोकर
साँझ आकर पोत देती स्याह से सुरमायेपन को
और आँचल में लपेटे साथ ले जाती समोकर
रात फिर आ आँज देती है सपन की कल्पनाएँ
हों क्षितिज के पार शायद कुछ नई सम्भावनाएँ
थक चुके चलते हुए पग रिक्तता पाथेय में ले
सोच कहती अब कोई बदलाव भी सम्भव नहीं है
जो अपेक्षित था सदा ही तो उपेक्षित हो रहा है
खिंच गई जो रेख पत्थर पर कभी मिटती नहीं है

पर हताशा को सदा मन से मिली है वर्जनाएँ
हैं क्षितिज के पार निश्चित अब नई सम्भावनाएँ

मंजिले देती निमंत्रण

मंज़िले तो दे रही हैं बांह फैलाये निमंत्रण
पर गति ने साथ छोड़ा थक चुके बोझिल पगों का

हार कर बैठे हुए संकल्प सारे मन मसोसे
दृष्टि के पाटल दिखाते शून्य का आकार केवल
पंथ की विपदाओं की  संभावना दीवार बन कर

रोक लेती जब उठे हैं पांव फिर से कमर कस कर

बीतती जाती निरंतर पास में जो शेष घड़ियां
योग कोई कर न पाता रूठते जाते पलो का

लौट आई सांझ भटकी छोड़ उंगली रश्मियों की
पूछती है नीड का है द्वार आखित किस गली में
 मांगती अनुदान में मिल जायें कुछ विश्रांति के क्षण
जिस नगर में अ​लविदाये भी बिकी है पावली में

आस पगली हो तिरस्कृत लौट आती है पलट कर
नीर से परिचय न होसंबंध पर रीते घटों का 
 
मानचित्रों में सजे है रास्ते तो किसलयों से
और जितनी भी दिशाएं है सभी सुलझी हुई हैं
निश्चयों के गांव में पर नींद का साम्राज्य फैला
रोशनी के बिन्दुओ पर बेड़ियां जकड़ी हुई हैं


​आज , फिर से हार कर इतिहास का बंदी बना है 
भोर कल स्वागत करेगी नव दिवस के आगतों का ​

टूटी वीणा के तार

टूटी वीणा के तार स्वयं ही जुड़ जाएंगे
एक बार तुम मेरा गीत गुनगुना दो तो

जाने कब से मौन प्रतीक्षित सारंगी है
और एकतारा , तबला भी है गुमसुम
​हवा 
 भटकती डगर डगर ले प्रश्न चिह्न
उत्तर तलाशती कहां 
​खोये 
 स्वर के विद्रुम
​वाणी को कठघरे  कंठ के घेर रखे हैं 
सारे ही आरोह सुरों के आज हुए हैं अवरोही 
​एक अटूटा मौन निरंतर पाँव पसारे 
जो भी दिखता,रखे अधर पर उंगली को ही 

सरगम के सुर राग स्वयं ही बिखरायेंगे
एक बार तुम अधर 
​खोल 
 कर मुस्का दो तो 

चितवन ने जब छुआ तुम्हारी, आ मुझको
गीत हृदय से हुये अचानक ही मुखरित
मन के गलियारे में आ बसंत बिखरा
अंगनाई चौबारे हुए पुष्प सज्जित 
अंगड़ाई ले बही अलकनंदा
​ ​
​अ​
नगिन
​जलतरंग की धुनें तटों पर मचल उठीं 
मन की तंत्री के तार हुए अविरल झंकृत
रोम रोम में नवल सरगमें  स्वतः बजीं

टूटी वीणा के तार नई धुन 
​बन जाएंगे 
एक बार तुम अपने कंगन खनका दो तो

समय सिंधु के तट पर बिछीं हुई सिकता
जब छू लेती  पग में रंगे अलक्तक
​ ​
 को 
छंदों के तब इंद्रधनुष उग कर तनते 
आलोडित कर लहर लहर की करवट को 
मौसम ले आता मल्हारी मेघों को
हवा, मलयजी इक परिधान पहन हँसती
नभ में प्रतिबिम्बित होते सूने तट पर
सुघड़ आल्पना शंख सीपियों की बनती

बोल पडेंगे रांगोली में शामिल सब बूटे
एक बार झांझर 
​अपनी छनका 
 दो 
​तो 

बदल देता दिशायें

पांव गतिमय, बढ़ रहीं हैं दूरियाँ गंतव्य से पर
हर कदम पर कोई रह रह कर बदल देता दिशायें
 
भोर का निश्चय थमाता है 
​ सजा ​
पाथेय जितना
दोपहर की सीढियाँ चढ़ते हुये वह बीत जाता
सांझ की परछाईयां छू नीड़ की दहलीज पायें
पूर्व इसके ही, लिये संकल्प का घट रीत जाता
 
इस डगर पर हर पथिक है सहस गाथा अरब वाली
हम अधूरी इक कहानी फ़िर भला किसको सुनायें
 
दूर कितना चल चुके अब तक, पता चलता नहीं है
राह सूनी पर
​, ​
नहीं  पग्चिह्न कोई शेष रहता
लौट आती दृष्टि रह रह कर क्षितिज को खटखटाकर
शून्य का उमड़ा हुआ झोंका महज इक साथ 
​बहता 
 
पंथ ने दी थी कभी सौगंध कोई, याद इतना
किन्तु सारे सूत्र धूमिल, फिर उसे कैसे निभायें
 
है कहां कोई चले जो साथ बन सहचर दिवस भर
पूछती आशा सितारों की गली में अचकचाकर
साथ लेकर लौटती 
​आ​
भास सा आश्वासनों का
रश्मियां जो सौंप देती हैं निरन्तर जगमगाकर
 
हर घड़ी होते समर्पण का निशाचर जानता है
मोड़ पर संभव उठे पग आज शायद हार जायें

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का
रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे

राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर
नीड तत्पर हो रहा पाथेय नूतन अब सजाकर
सूर्य फिर करने लगा है उग रहे दिन के पटल पर
निज सही, संदेश देता, पांव रख आगे बढ़ा कर

वर्ष यह नव सामने है एक कोरा पृष्ठ वन कर
क्या इबारत तुम लिखो, अधिकार में केवल तुम्हारे

तुम लिखो मंगलाचरण या मंत्र संध्यावंदनों केy
आस की गाथा अधूरी , बोल या आभिनंदनो के
ये तुम्हे करना सुनिश्चित और तब है शब्द चुनना
सज सकें जो भाल की गरिमा बढ़ते चंदनो से

नयन में क्या आँजना है आज निर्धारित करो तुम
तो सजेंगे कल सहज ही स्वप्न स्वर्णिम हो तुम्हारे

नाम गति है ज़िन्दगी का, सूर्य फिर कहने लगा है
हो गया पाषाण सा निष्प्राण जो भी रुक गया है
पंथ के विस्तार को करते नियंत्रित चल रहे पग
 सत्य यह दिनरात का चलता हुआ रथ लिख गया ह

कल सजाये राह क्या निर्भर तुम्हारे निर्णयों पर
सामने हो शून्य या स्वागत करें खुल राजद्वारे


कंठ से हुआ मुखर

उठा प्रकम्प बीन के जो तार से
मधूर सुरों में सरगमां की धार से
वो एक शब्द ढल संख्य शब्द में
हुआ प्रवाह बांसुरी के द्वार से

वो शब्द एक आद्यब्रह्म जो रहा
कोटि कोटि कंठ से हुआ मुखर

गीत बन के जो कि होंठ पर चढ़ा
बिक्षुब्ध करते मौन से जो है लड़ा
अचल अटल रहा समय प्रवाह में
जो पर्वतों सा एक बिंदु पर खड़ा

वो एक स्वर जो नित्य है अशेष है
वो कोटि कोटि कंठ से हुआ मुखर

निकल के शारदा की कर किताब से
वो गूँजता है कंठ के निनाद से
वो रव में प्राण की जगाता चेतना
हुआ युवा वो भाव के प्रताप से

जो सृष्टि का समूची एक मात्रा स्वर
वो कोटि कोटि कंठ से हुआ मुखर

नव वर्ष 2018

आज प्राची के क्षितिज से हो रहे नव गान गुंजित
है नये इक वर्ष की शुभकामना तुमको समर्पित

भोर आतुर है, करे नूतन दिवस पर चित्रकारी
और कलियों ने तुहिन की बूँद ले छवियाँ पखारी
मलयजे आकर सुनाने को चली है मंगलायन
आरती की तान ने नव आस की बूटी सँवारी

आस्था के रंग फिर से आज होते है समन्वित
है नए इस वर्ष की शुभकामना तुमको समर्पित

आ गया है वर्ष लेकर डायरी के पृष्ठ कोर
शब्द लिखती हो तुम्हारे लेखनी केवल नकोरे
स्वस्ति चिह्नों से भरें रांगोलिया उगते दिवस की
और दुलराएँ गली पूरबाइयों के ही झकोरे

पगतली जो पंथ चूमे वह डगर हो पुष्प संज्जित
है नए इस वर्ष की शुभकामना तुमको समर्पित

शेष न साया रहे बीती हुई कड़वाहटों का
हर निमिष अभिनंदनी हो पास आते आगतों का
स्वप्न की जो पालकी आए, सजे दुल्हन सरीखी
साँझ नित स्वागत करे मुस्कान के अभ्यागतों का

जो नयन में कल्पनाएँ हों सभी इस बार शिल्पित
हैं सभी नव वर्ष की शुभकामना सादर समर्पित 

पीपल की छाह नहीं

आपाधापी में जीवन की कहीं तनिक विश्राम नहीं
इस पथ की अ​विरलताओं में है पीपल की छाह नहीं

मुट्ठी ​ में  उंगली थामे सेहुये अग्रसर पग चल चल कर
उंगली थमा किसी को प​थ का निर्देशन देने तक आये
कभी लोरियों ​की सरगम के झूलों पर पेंगे भर झूले
कभी छटपटात सांझो में रहे अ​केले दिया जलाये

गति ने उन्हें जकड़कर ​रखा रुक न सके थे पांव  कही 
इस पथ की अविरालताओं में, कही तनिक विश्राम नही


​स्थिति जनित विवशताओं के परिवेशों में उलझा मानस
रहा ढूंढता समीकरण के हुए तिरोहित अनुपातों को
बो​ई सदा रात की क्यारी में  मृदु आशाओ की कोंपल
और बुहारा किया दुपहरी में बिखरे टूटे ​पातों को 

सपने जिसे सजा रक्खे थे, रहा दूर ही गाँव कहीं 
और राह में दिखी कहीं भी इक पीपल की छाँह नहीं 

कोई साथी नहीं न कोई साया, नहीं काफिला कोई
बीत गए युग वृत्ताकार पथों की दूरी को तय करते
मृग मरीचिका से आशा के लटके रहे क्षितिज पर बादल
संभव नहीं हुआ पल को भी छत्र शीश पर कर कर झरते

दूर दूर तक नीड़ न कोई, जिसको घेरे घाम नहीं
और एक विश्रान्ति सजाने को पीपल की छाँह नहीं

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...