टूटी वीणा के तार स्वयं ही जुड़ जाएंगे
एक बार तुम मेरा गीत गुनगुना दो तो
जाने कब से मौन प्रतीक्षित सारंगी है
और एकतारा , तबला भी है गुमसुम
हवा
भटकती डगर डगर ले प्रश्न चिह्न
उत्तर तलाशती कहां
खोये
स्वर के विद्रुम
वाणी को कठघरे कंठ के घेर रखे हैं
सारे ही आरोह सुरों के आज हुए हैं अवरोही
एक अटूटा मौन निरंतर पाँव पसारे
जो भी दिखता,रखे अधर पर उंगली को ही
सरगम के सुर राग स्वयं ही बिखरायेंगे
एक बार तुम अधर
खोल
कर मुस्का दो तो
चितवन ने जब छुआ तुम्हारी, आ मुझको
गीत हृदय से हुये अचानक ही मुखरित
मन के गलियारे में आ बसंत बिखरा
अंगनाई चौबारे हुए पुष्प सज्जित
अंगड़ाई ले बही अलकनंदा
अ
नगिन
जलतरंग की धुनें तटों पर मचल उठीं
मन की तंत्री के तार हुए अविरल झंकृत
रोम रोम में नवल सरगमें स्वतः बजीं
टूटी वीणा के तार नई धुन
बन जाएंगे
एक बार तुम अपने कंगन खनका दो तो
समय सिंधु के तट पर बिछीं हुई सिकता
जब छू लेती पग में रंगे अलक्तक
को
छंदों के तब इंद्रधनुष उग कर तनते
आलोडित कर लहर लहर की करवट को
मौसम ले आता मल्हारी मेघों को
हवा, मलयजी इक परिधान पहन हँसती
नभ में प्रतिबिम्बित होते सूने तट पर
सुघड़ आल्पना शंख सीपियों की बनती
बोल पडेंगे रांगोली में शामिल सब बूटे
एक बार झांझर
अपनी छनका
दो
तो
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