आज तुम्हारी विरुदावलियाँ मैं गाता

आज तुम्हारे लिये शान में मैं पढ़ता हूँ चार कशीदे
कल जब मेरी बारी आये, मेरी पीठ थपथपाना तुम
 
आज लिखी जो कविता तुमने, कितनी ऊँचाई छू ली है
जितने शब्द लिखे हैं उनमें नही एक भी मामूली है
वाह वाह ! क्या लिखा, लग रहा जैसे रख दी कलम तोड़ कर
नीरज दिनकर बच्चन सबको, आये पीछे कहीम छोड़ कर
 
आज तुम्हारे लिक्खे हुये को मैं पंचम सुर में गाता हूँ
कल मैं जो कुछ लिखूँ उसे सरगम में पिरो गुनगुनाना तुम
 
समिति प्रशंसा की अपनी यह, हमें विदित है,है पारस्पर
चलो करें इसलिये प्रशंसा एक दूसरे की बढ़ चढ़ कर
कविता लेख कहानी में क्या कथ्य ? नहीं कुछ लेना देना
हर इक कविता "रश्मिरथी" है, हर किस्सा है "तोता मैना"
 
आज तुम्हारी विरुदावलियाँ मैं गाता हूँ बिन विराम के
कल मेरी जब करो प्रशंसा, आंधी बने सनसनाना तुम
 
उपमा अलंकार सब के सब सर को पीट लिया करते हैं
छन्द तुम्हारी कविताओं के आगे आ पानी भरते हैं
महाकाव्य औ’ खंडकाव्य सब रहते खड़े आन कर द्वारे
पड़े तुम्हारी दृष्टि और वे अपना सोया भाग्य संवारे
 
आज तुम्हारा भौंपा बन कर मैं जैसे गुणगान कर रहा
कल जब मेरी बात चले तो घुँघरू बने झनझनाना तुम

एक किरन प्रतिबिम्बित होकर मन वातायन सजा रही है

लगने लगें अजनबी तुमको जब घर की दीवारें अपने
सांझ भोर में दोपहरी में आंखों में तिरते हों सपने
अनायास ही वर्तमान जब चित्र सरीखा हो रह जाये
एक शब्द पर अटक अटक कर अधर लगें रह रह कर कँपने
तो शतरूपे ! विदित रहे यह मधुर प्रीत की इक कोयलिया
मन की शाखाओं पर आकर नई रागिनी सुना रही है
 
सांझ अकेली करती हो जब खिड़की के पल्लों से बातें
तारों को कर बिन्दु,खींचने लगती हो रेखायें रातें
छिटकी हुई धूप पत्तों से, सन्देसा लेकर आती हो
और हवा के झोंके लेकर आयें गंधों की बारातें
तो रति प्रतिलिपि ! यह संकुल हैपुष्प शरों के तरकस में से
एक किरन प्रतिबिम्बित होकर मन वातायन सजा रही है
 
दर्पण अपनी सुध बुध खोकर रूप निरखता ही रह जाये
पगतलियों को छूते पथ की धूल लगे चन्दन हो जाये
पत्तों की सरसर से उमड़े सारंगी की तान मनोहर
अपनी परछाईं भी लगता अपने से जैसे शरमाये
तो संदलिके! यह प्रमाण है उम्रसंधि की यह कस्तूरी 
इस पड़ाव को अपनी मोहक गंध लुटा कर सजा रही है

पीर की नई कहानियाँ


लिख रही है रोज ज़िन्दगी
पीर की नई कहानियाँ

कैनवस पे रह गये टँगे
रंगहीन एक चित्र की
अजनबी बना हुआ मिला
बालपन के एक मित्र की
रेत की तरह फ़िसल गई
हाथ में खिंची लकीर की
बँध के एक द्वार से रहा
भ्रम में खो गये फ़कीर की

चुन रही है रोज ही नई
सिन्धु तट पड़ी निशानियाँ

लिख रही है गीत से विलग
अन्तरे की अनकही व्यथा
रहजनी से गंध की ग्रसित
पुष्प की अव्यक्त इक कथा
होंठ की कगार से फ़िसल
बार बार शब्द जो गिरा
लिख रही है धूँढ़ते हुये
गुत्थियों में खो गया सिरा

कह गई लिखा अपूर्ण है
सांझ करती मेहरबानियाँ

मोड  पर जो राजमार्ग के
पांव रह गये रुके,डरे
रह गये पलक की कोर पर
अश्रु जो कभी नहीं झरे
रह गया सिमट जो मौन की
पुस्तकों में, एक गीत की
छार छार होके उड़ रही
दादा दादियों की रीत की

लिख रही हिसाब, लाभ बिन
बढ़ रही हैं रोज हानियाँ

नये अर्थ के प्रतिपादन में

समय शिला से टकरा टकरा
बिखर गये अन्तरे गीत के
शब्द हुये आवारा, बँधते नहीं
तनिक भी अनुशासन में
 
अक्षर अक्षर विद्रोही है
ले मशाल जलती हाथों में
दूर अधर की पगडंडी से
उलझा अर्थहीन बातों में
पंक्तिहीन उच्छंखल कोई
बायें जाता कोई दाय़ें
सुनी अनसुनी कर देते हैं
कोई कितना भी समझाये
 
कर बैठे दुश्मनी मात्राओं से
अपने मद में फूले
रहे पिरोते निष्ठायें पर
गीतों वाले सिंहासन में
 
अलंकार की बैसाखी पर
चलें लड़खड़ा कर उपमायें
जुड़ती नहीं तार से आकर
तथाकथित ये नई विधायें
समुचित विस्तारों में अक्षम
वाक्य रहे हैं टूट टूट कर
और भावना विधवाओं सी
रहे बिलखती फ़ूट फ़ूट कर
 
सतही समझ पूज लेती है
केवल उन लहरों की हलचल
जिनका गठबन्धन करता है
बस निवेश इक विज्ञापन में
 
गीत और व्याख्यानों में अब
अन्तर नहीं कसौटी करती
लगीं अस्मिता तलक दांव पर
शायद इसीलिये ही डरती
सत्य अधर की देहरी को भी
छूने से अब कतराता है
चाटुकारिता का कोहरा ही
अपनी सीमा फ़ैलाता है
 
मिले धरोहर में जितने भी
नियम उठा कर फ़ेंक दिये हैं
व्यस्त सभी हैं निज मतलब के
नये अर्थ के प्रतिपादन में

केवल पीर रहा बरसाता

अँगनाई में किसी राशि की जाकर ठहरे सूरज चाहे
कैलेन्डर निज  व्यवहारों में कोई अंतर नहीं दिखाता
चौघड़िये दिन के हों चाहे संध्या भोर निशा के हों या
सभी आँकड़े षड़यंत्री हैं, उत्तर नहीं भिन्न मिल पाता
 
सावन भादों क्वार पौष हो या मौसम हो कभी चैतिया
अम्बर  तो बिन बादल के भी केवल पीर रहा बरसाता
 
जितनी बार उगाईं मन ने अपनी क्यारी में मंजरियां
उतनी बार अंकुरित होते रहे नागफ़नियों के काँटे
नयनों के गंगाजल ने जिन पौधों को सींचा था प्रतिपल
उगी हुई विषबेलों ने वे एक एक कर कर के बाँटे
 
बीज मोतिया बेला के हों या गुलाब की रेपें कलमें
बागीचा पर आक धतूरा ही केवल वापिस लौटाता
 
गतियाँ हर इक बार घड़ी की छूते दृष्टि हुईं हैं द्रुत ही
इसीलिये हर बार प्राप्ति का पल पोरों से परे रह गया
पग के उठ पाने से पहले दिशा राह ने अपनी बदली
निर्णय का पल असमंजस में घिरा ह्रदय से दूर रह गया
 
यद्यपि भोर नित्य भर देती है संकल्पों से आंजुर को
बदला हुआ धूप का तेवर सहज सोख उसको ले जाता
 
ओढ़ी हुई अवनिकाओं से छुपता नहीं सत्य चेहरे का
मुस्कानें बतला देती हैं कितना पिया अश्रु का क्रन्दन
रहती हो अदृश्य भले ही नयनों से तरी पगडंडी
उसके चिह्न बता देती है विद्रुप हुई अधर की थिरकन
 
सरगम ने हर बार बिलम्बित करके ही लौटाया है सुर
और तार पर चढ़ने की कोशिश करते ही वह गिर जाता

वही प्रश्न दस्तक देते हैं

जिन प्रश्नों का उत्तर कोई मिला नहीं हैं कभी कहीं से
वही प्रश्न दस्तक देते हैं आज पुन: द्वारे पर आकर
 
किसने किसके लिये लगी थी कल के पट पर सांकल खोली
कौन खेलता गै हाथों की रेखाओं से आंख मिचौली
कहाँछुपे हैं इतिहासों में वर्णित स्वर्णमयी रजनी दिन
किधर वाटिकायें गूँजे है जिनमें प्रीत भरी बस बोली
 
यद्यपि ज्ञातन उत्तर का रथ मुडन सकेगा इन गलियों को 
बार बार कर रहीं प्रतीक्षा आँखें मोड्क्ष गली के जाकर 
 
क्या कारण था क्या कारण है परिवर्तन की नींद न टूटे 
किसने खींचे राज पथों पर ही क्यों आ बहुरंगी बूते
भला किसलिए सावन चलता रहा पुराणी ही लीकों पर 
कटते रहे एकलव्यों के ही क्यों कोई कहे अंगूठे 
 
कब से नियमावलिया  क्यों हम आँख मूड कर रहे अनुसरण 
कोई भेद नहीं बतला पाया है यह हमको समझा कर 
 
 
किये अनकिये प्रश्नों में ही दिवस निशा नित उलझे रहते .
क्यों विपरीत दिशाओं में ही गंधों वाले झोंके बहते 
क्यों लुटती हैं विकच प्रसूनों की पांखुर ही वन उपवन में 
क्यों कांटे भी नहीं सहायिकाओं पर जा कर सजाते रहते 
 
प्रश्नाचिहं की  झुकी कमर पर प्रश्नों का बोझा है भारी 
आशा यही कोई उत्तर आ बोझ तनिक जाए हल्का कर 
 

रोयें हम या मुस्कुराएँ

ज़िंदगी में हैं हजारों एक तो पहले व्यथाएं    
आपकी फिर बात सुन कर रोयें हम या मुस्कुराएँ 
 
भावना के प्रकरणों की पूर्व निर्धारित समस्या 
एक मन को छू रखें औ दूसरे से बच  निकलते 
एक के घर पर छिटकती चांदनी सी चंद  किरणें 
दूसरे को अग्नि देते दीप जब भी जल पिघलते 
हो नहीं पातीं सभी की एक जैसी मान्यताएं
 रोयें हम या मुस्कुराएँ 
 
कल्पना की जब उड़ानें बाँधती पूर्वाग्रही पर 
तो सहज विस्तार उनका एक मुट्ठी में सिमटता 
दृष्टि के ही कोण पर निर्भर रहा है दृश्य सारे
कौन उसको किस तरह से देखता है या समझता 
 
कौन से आकाश में हम पंख अपने फ़डफ़डाये 
रोयें हम या मुस्कुरायें
 
शब्दकोशों में नहीं सीमित रहा है ज्ञान केवल
माँगता है चेतना की सार्थकतायें निरन्तर
जो विनय सिखला नहीं सकती हुई विद्या निरर्थक
प्राण में पाषाण में करता यही बस एक अन्तर
 
शोर में इक भीड़ के सारंगियाँ कब तक बजायें
रोयें हम या मुस्कुरायें

भोर की अलगनी पे टँका रह गया

भोर की अलगनी पे टँका रह गया
कल उगा था दिवस सांझ के गाँव में
रात फिर से सफ़र में रुकी रहगयी
गिनते गिनते जो छाले पड़े पाँव में
 
चांदनी ने प्रहर ताकते रह गए 
उंगलियाँ थामने के लिए हाथ में 
दृश्य की सब दिशाएँ बदल चल पडी 
रुष्ट होते हुए बात ही बात में 
 
नभ की मंदाकिनी के परे गा रही
 एक नीहारिका लोरियां अनवरत 
पर किसी और धुन पे थिरकता हुआ 
आज को भूल कर दिन हुआ था विगत 

अधर की रंगत लेकर उगें सवेरे

हवा चाहती है आरक्त कपोलों को रह रह कर चूमे
अभिलाषित है उषा अधर की रंगत लेकर उगें सवेरे
दोपहरी आतुरा ओढ़ ले छिटकी हुई धूप चूनर से
लालायित है निशा तुम्हारे चिकुरों से ले सके अँधेरे
 
प्रतिपादित सब नियम भौतिकी के चाहें खुद टूट बिखरना
द्वार तुम्हारे रहना चाहे छोड़ गगन हर एक सितारा
 
उंगली की पोरों से बिखरी हुई हिना कचनार बन गई
प्रतिबिम्बित जब हुआ अलक्तक पग से तो गुलाब मुस्काये
पायल की रुनझुन से जागी बरखा लेले कर अँगड़ाई
वेणी थिरकी तो अम्बर में सावन के बादल घिर आये
 
खंजननयने, स्वयं प्रकृति भी चाहे तुमसे जुड़ कर रहना
पांव तुम्हारे छूना चाहे उमड़ी हुई नदी की धारा
 
कंगन जब करने लगता है हथफूलों से गुपचुप बातें
तब तब गूँजा करती जैसे सारंगी की धुन मतवाली
दृष्टि किरण किस समय तुम्हारी शिलाखंड को प्रतिमा कर दे
आतुरता से बाट निहारे ठिठकी हुई सांझ की लाली
 
ज्ञात तुम्हें हो दिशा दिशायें तुमसे ही पाने को आतुर
प्राची और प्रतीची ने तुमसे ही तो ले रूप सँवारा
 
गंधों को बोती क्यारी में धूप केसरी परिधानों की
चन्दन के वृक्षों पर जिससे आने लगती है तरुणाई
और हवाके नूपुर की खनकें जिससे उपजा करती हैं
शिल्पकार के स्वप्नों वाले तन की ही तो है परछाईं
 
कलासाधिके  ! देश काल की सीमाओं की रेख मिटाकर 
भाषाओं  के विविध चित्र को तुमने  ही है सदा उजारा 

भोज पत्र पर लिखी हुई सारी गाथायें

तुम्हें देख कर शब्द शब्द ने रह रह अपना किया  आकलन
लगे जोड़ने रूप तुम्हारे से वे अपनी परिभाषायें
 
रक्तिम अरुण पीत आभायें नतमस्तक हैं पास तुम्हारे
चिकुरों की रंगत से अपना मांग रहे परिचय अंधियारे
मंदिर में बजती घंटी में घुली हुई सारंगी की धुन
लालायित है मुखर कंठ का स्वर होकर के उन्हें संवारे
 
सदियों के दर्पण में अपने प्रतिबिम्बों को देख रही हैं
रूप प्रेम की भोज पत्र पर लिखी हुई सारी गाथायें
 
मृगी मीन नीरज की आशा दें प्रतिरूप तुम्हारे लोचन
मंथन से प्राकट्य मोहिनी तुमसे ही मांगे सम्मोहन
पारिजात कचनार  मोगरा जूही पुष्पराज सब सोचें
किसका भाग्य तुम्हारे तन को चूमे पाकर के अनुमोदन
 
स्वर्ण रजत के माणिक मुक्ता जड़े हुये सारे आभूषण
देह तुम्हारी आलिंगन में भर लेने की आस लगायें
 
पग की गति से बँधना चाहें सूरज चन्दा और सितारे
नक्षत्रों की दृष्टि तुम्हारी भॄकुटि भंगिमा को अनुसारे 
मौसम की थिरकन रहती है बँधकर चूनर के कोरों में
उडे झालरी तब ही वह भी करवट लेकर पाँव पसारे 
 
निशि वासर  संध्या, अरुणाई उषा  सब ही अभिलाषित हैं 
सामौ सारथी के कर से तुम हाथ बढ़ा  ले लो वल्गाएँ
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नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...