फ़िर से दीप जला आना है

गये हुए कल की परछाई आज आज फिर बन आई है
और सान्झ के ढलते ढलते इसको फिल कल बन जाना है
 
बदले तो परिधान, मूर्ति की रंगत नहीं बदलती लेकिन
नये मुखौटों के पीछे छुप रहते वही पुराने पल छिन
रँगे सियारों की रंगत की लम्बी उम्र नहीं है होती
कच्चे धब्बों को बारिश की पहली बून्द बरस कर धोती
 
 
कभी नयापन कुछ कुछ, उगती नई भोर के सँग आयेगा
यद्यपि है आधारहीन आशा, पर मन को बहलाना है
 
दृष्टि छली जाती है हर दिन नये नये शीशे दिखलाकर
फ़िर फ़िर बर्फ़ जामाई जाती, है जम चुकी बर्फ़ पिघलाकर
कोल्हू के पथ से जुड़ लर ही रहीं यात्रायें सारी अब
बीती उम्र प्रतीक्षाओं की फिर फिर कर दोहराते ये सब
 
कुछ भी नहीं छुपा परदे में सारा सत्य नजर के आगे
लेकिन फिर भी छुपा कहीं कुछ कह कर मन को समझाना है
 
नित प्रपंच विश्वासघात में र्स्क्र उल्स्झ क्स्र कोमल मन को
फिर फिर आशावसन मिलतेन है नया मुलम्मा ओढ ओढ कर
मंडी में जाने पर सारी आशायें बिखरा जाती हैं
जब होता है ज~झात सभी हैं खोटे सिक्के, रखे जोड़ कर
 
पीपल का पत्ता पल भर को पूजा मेम सज तो जात अहै
लेकिन उसको कल आते ही मिट्ती में ही मिल जान अहै
 
टीके के सँग अक्षत का दाना सज कर होता है गर्वित
बाद निमिष के हो जाता है नीचे गिर कर धूल धूसरित
भ्रमित कसौटी रह जाती अनभिज्ञ खरे खोटे सोने से
परिणामित उपलब्धि कहाँ उताम होती कुछ न होने से
 
यद्यपि ज्ञात नहीं है बाकी पूजाघर में कोई प्रतिमा
लेकिन आदत की कमजोरी, फ़िर से दीप जला आना है

आती तो है याद


आती तो है याद चहलकदमी करती इक गौरेय्या सी
किन्तु देख कर बाज व्यस्तताओं के चुपके छुप जाती है


धड़कन की तालें लगतीं हैं दस्तक मन के दरवाजे पर
सांसों में घुल कर आती है गंध किसी भीने से पल की
बरगद की छाया मे लिपटी चन्द सुहानी मधुमय घड़ियां
खींचा करती है नयनों में छवि इक लहराते आँचल की


तोड़ दिया करता है लेकिन तन्द्रा को आ कोई तकाजा
और स्वप्न की डोली उस पल आते आते रुक जाती है


यों लगता है मंत्र पढ़े थे एक दिवस जो सम्मोहन ने
घुलकर कंठ स्वरों से लिपटी हुई एक सारंगी पर आ
उनके शब्द ,तान लय सब कुछ जुड़ जाते दिन के चिह्नों से
बतियाने लगते हैं मेरे बँटे हुए निमिषों में आ गा


असमंजस की भूलभुलैय्या सी खिंच जाती है पल छिन में
और अचानक स्म्ध्या आकर धुंधुआसी हो झुक जाती है


अर्थ बदल कर खो जाते हैं संचित सारे सन्देशों के
चाहत होती और दूसरे सन्देशे ले आयें कबूतर
बहती हुई हवा की पायल में जो खनक रहीं झंकारे
उनको बादल का टुकड़ा अम्बर से आ लिख जाये भू पर


उगती है हर बार अपेक्षा सावन में खरपतवारों सी
आशाओं की रीती गागर बार बार फिर चुक जाती है

बना अंतरा एक गीत का

मन के कोरे पृष्ठों को जब हस्ताक्षर मिल गया तुम्हारा
बिखरी हुई कहानी बँध कर ग्रन्थ बन गई एक प्रीत का
 
टुकड़े टुकड़े अंश अंश में वाक्य अधूरे आधे ही थे
कोई बिन्दु नहीं था ना ही चिह्न कोई भी था विराम का
कल के वासी अखबारों में छपे हुए मौसम का विवरण
जैसा था अधलिखा कथानक, नहीं किसी के किसी काम का
 
जब से छूकर गई तुम्हारी दृष्टि अधूरी पड़ी इबारत
अनायास ही लय में बँध कर बना अंतरा एक गीत का
 
मुद्राओं के बिन वटवे सा था छाया मन में खालीपन
सन्नाटे घेरे रहते थे परिचय के सारे तारों को
भटक भटक कर अभिलाषायें लौटीं थकी शून्य सँग लेकर
जिसके बस में नहीं जगाये सुप्त नींद में, झंकारों को
 
पर जब मेरा नाम तुम्हारे स्वर में रँग अधरों से फ़िसला
वह कारण बन गया सहज ही, खामोशी की बातचीत का
 
जिनसे रही अपरिचित अनुभव की अब तक की अर्जित पूँजी
वह अनुभूति तरंगें बन कर लगी दौड़ने आ नस नस में
सँवरी पुष्पवाटिकायें अनगिनती इक सूनी क्यारी में
मधुरस पूरित गंध घुल गई जीवन के हर पल नीरस में
 
मौसम की मुस्कान सजीली अँजी दिवस के नयनों में आ
निशिगंधा ने दिन में खिल कर किया चलन इक नई रीत का-

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में

छंद गीतों के संवरते हैं नहीं अब सुर में
कोई मिसरा-ए-ग़ज़ल होंठ पे नहीं आता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए गाता अगर क्या गाता
 
खँडहर होती मुंडेरों पे चढ़े बैठे जो
देखते जो हैं नहीं किरणें उभरते दिन की
अपनी मुरझाई हुई सोच में उलझे उलझे
सोचते ज़िन्दगी मोहताज है उनके ऋण की
उनके कहने पे दिवस उगता है रातें ढलती
कौम के होके खुदा गफलतों में रहते हैं
अपने कमरे से परे झाँक नहीं देखा कभी
कान को अच्छी लगे बात वही सुनते हैं
 
कब्र में पांव मगर छोड़ते नहीं कुर्सी
कितना लालच है समझ में ये नहीं आ पाता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता
 
वक्त बदला न बदल पाए नजर के भ्रम पर
अपने दर्पण में ही देखा हैं किये अपने को
मरुथली हिरना के सांचे में ढले बैठे हैं
मान कर एक हकीकत बिखरते सपने को
चीरते मानवियत आज भी शमशीरों से
रक्त की प्यास नहीं बुझती वरस बीत गये
उनके साये में धुली साँस आंसुओं में सदा
आंख के घट भी लगे अब तो सभी रीत गये
 
एक चादर को चढ़ाये हैं रखे करघे पर
सूत पर एक भी बालिश्त भर नहीं काता
आपका मुझसे तकाजा कि नया गीत रचूं
शब्द गूंगे हैं हुए कुछ भी कहा न जाता
 
अब न बादल में छुपा रहने सकेगा सूरज
एक ही रश्मि हटा देती अंधेरा गहरा
एक चिंगारी भड़कती है बने दावानल
बाढ़ का पानी कहां एक जगह पर ठहरा
कोई घर हो कि सल्तनत हो या कोई शासन
रेत की नींव पे टिक पाता नहीं देर तलक
बीज को रोक सका कौन कभी उगने से
स्वप्न से सत्य की दूरी है महज एक पलक
 
उग रही धूप ने झाड़ू से बुहारा उनको
जोड़ बैठे हुए थे जो कि तिमिर से नाता
अब तो गीतों को संवरना है स्वयं होठों पर
जिनका पा पा के पर्स सत्य हर उभर आता

झालरी कोई हवा की लग रहा कुछ कह रही है

कल्पना के चित्र पर ज्यों पड़ गई इंचों बरफ सी
रह गईं आतुर निगाहें एक अनचीन्हे दरस की
फिर किरण की डोर पकडे बादलों के झुण्ड उमड़े
कसमसाने लग गईं बाहें कसक लेकर परस की
 
शून्य में घुलते क्षितिज की रेख पर से आ फिसलती
झालरी कोई हवा की लग रहा कुछ कह रही है
 
आ रही लगता कही से कोई स्वर लहरी उमड़ कर
किन्तु सुनने की सभी ही कोशिशें असमर्थ लगतीं
दृष्टि की धुँधलाहटों से जागती झुंझलाहटों मे
कोई भी तस्वीर खाकों से परे अव्यक्त लगती
 
उम्र की पगली भिखारिन, साँस का थामे कटोरा
धड़कनों के द्वार पर बस झिड़कियाँ ही सह रही है
 
खींचती है कोई प्रतिध्वनि उद्गमों के छोर पर से
व्योम के वातायनों में कोई रखता नाम लिख कर
मौसमों की टोलियों को पंथ का निर्देश देता
कोई हँसता है हथेली में नई फिर राह भर कर
 
लड़खड़ाते पांव लेकर मानचित्रों में भटकती
प्राप्ति की हर साध ढलती सांझ के सँग ढह रही है
 
यूँ लगे,हैं फ़ड़फ़ड़ाते पृष्ठ कुछ खुलकर विगत के
बह गये इतिहास बन कर शब्द पर सारे लिखे ही
ढेरियां हैं मंडियों में सब पुरानी याद वाली
और हर सम्बन्ध का बर्तन रहा है बिन बिके ही
 
उंगलियों पर गिनतियों के अंक की सीमाओं में बँध
याद की दुल्हन दिवस की पालकी में रह रही है
सुनो सुनयने ! शब्द नहीं अब लिखते गीत तुम्हारा कोई
इसीलिये रख दी है मैने आज ताक पर कलम उठा कर

मिलते जितने शब्द आजकल मुझे राह में चलते चलते
सब के सब क्षतिग्रस्त और हैं पहने हुये पीर के गहने
कातरता के उमड़े बादल रहते सदा नयन के नभ पर
तार तार हो चुकी भावनाओं के केवल चिथड़े पहने

भाव सभी लुट चुके मार्ग में इस जंगल में चलते चलते
शायद यही नियति है रहते बार बार खुद को समझाकर

टूटी हुई मात्राओं की बैसाखी पर बोझ टिका कर
चलना दूभर, चार प्रहर अब खड़े नहीं होने पाते हैं
ठोकर खा गिर पड़े स्वरों का उठना संभव हुआ नहीं है
सभी अनसुने रहे गीत वे मौन सुरों में जो गाते हैं

मरुथल से उठ रहे चक्रवातों की गति में उलझा सा मन
बार बार लौटा करता है परिधियों पर चक्कर खा कर

बदले हुये समय ने बदला शब्दों के सारे अर्थों को
उपमायें सब व्यर्थ हो गईं अलंकार बिखरे नदिया तट
काजल,कुमकुम और अलक्तक चूड़ी,कँगना,तगड़ी,पायल
शेष नहीं है शब्दकोश में ना तो पनघट ना वंशीवट

बिसराये सब पेड़ नीम के, पीपल के , वे इमली वाले
जिनकी छाँव सुला देती थी एक दुपहरी को थपका कर

बेसुर इक हो चुकी बाँसुरी के छिद्रों से बही हवा का
परिचय कितना हो पाता है सारंगी के भटके सुर से
दीवारें खिंच गईं गली के मोड़ों पर जो अनचाहे ही
उनसे टकराया करते हैं अकुलाहट में वे भर भर के

गिर जाते हर बार फ़िसल कर तारों की करवट छूते ही
कितनी बार कोशिशें की हैं बोल सकें कुछ तो अकुलाकर

ये कलम गीत में आप ही ढल सके

गीत लिखते हुये ये कलम थक गई
एक भी तुम मगर गुनगुनाये नहीं
गीत के शब्द में खुद कलम ढल सके
इस तरह से कभी मुस्कुराये नहीं

छन्द के बन्द में कुन्तलों की लटें
बाँधती तो रही ये मचलती हुई
रागिनी की लहर पे रिराती रही
रूप की ज्योत्सनायें छिटकती हुई
राग की सीढियों पर सजाये हुये
थिरकनें बन अधर की तरंगें बही
कर अलंकार जड़ती रहीं शब्द में
बोलियाँ कंठ्स्वर बन उभरती हुईं

नृत्य करने लगे आप ही यह कलम
स्वर के घुँघरू कभी झनझनाये नहीं

रात को नित सजा कर नयन कोर पर
रूप की धूप से दिन उगाते हुये
झुकती उठती हुई दृष्टि की पालकी
से उमंगों की क्यारी सजाते हुये
अल्पना में हिनाई हथेली सजा
कंगनों की खनक से सजा झालरी
गात से उड़ रही सन्दली गंध से
वाटिकायें नई नित बनाते हुये

नित्य बुनती रही कुछ कशीदे नये
तुमने लेकिन इधर पग बढ़ाये नहीं

चाल को ढाल चौपाईयां कर दिया
रख पिरो दीं सवैयों में अंगड़ाईयां
मुक्तकों में बुने यष्टि के मोड़ फिर
कर अलक्तक,कवित्तों की शहनाअईयाँ
करके अतुकांत असमंजसों को रखा
नज़्म में रँग दिये कामना के सिरे
और गज़लें बिछाते रहे पंथ में
चूमने के लिये चन्द परछाईयाँ

कोई मुखड़ा नये गीत का बन सके
शब्द तुमने कभी वो सजाये नहीं
ये कलम गीत में आप ही ढल सके
ऐसे संकेत इस ओर आये नहीं

शब्द बोले बिना हों जिसे कह गये

पुस्तकों के पलटते हुये पृष्ठ हम
प्यार के गीत को ढूँढ़ते रह गये
भावना के बुने अक्षरों में ढले
शब्द बोले बिना हों जिसे कह गये
 
जानते खोज होगी निरर्थक यहाँ
कोई अनुभूतियाँ ढाल पाता नहीं
चाहतों में उलझ कर सतह पर रहा
डूब गहराईयाँ कोई पाता नहीं
तालियों कीअपेक्षा में बन्दी हुई
भावना होंठ की कोर छूती नहीं
सिर्फ़ नक्कारखाना बनीं महफ़िलें
मौन पीते हुये बैठ तूती रही
 
पीढियों से लगाई हुई आस के
जितने सम्बन्ध थे, वे सभी ढह गये
 
छन्द से नित्य बढ़ती रहीं दूरियाँ
शब्द की,भाव की और फ़िर अर्थ की
सरगमों की कतारें भटकती रही
पर दिशा एक भी तो नहीं पा सकीं
आस पंचम पे नजरें टिकाये रही
सीढियाँ छू नहीं पाई आरोह की
कोर पर से फ़िसलती रही पृष्ठ की
दृष्टि पल के लिये हाशिये न टँकी
 
शब्द अध्याय की बंदिशों में बँधे
एक के बाद इक टूट कर बह गये
 
जो रहे सामने वे उच्छृंखल रहे
कोई अनुशासनों के गले ना लगा
कोई परिचय की गलियों में आया नहीं
नाम चेहरे पे चिपका हुआ रह गया
शब्द के झुंड थे, स्वर बहा ना सके
ठोकरें खाते खाते गिरे भूमि पर
और दुहराई फ़िर से कहानी यही
दूसरे पृष्ठ ने खुद ही खुद झूम कर
 
जोकि अनुभूति की मौन पीड़ाओं को
बन्द अव्यक्तता में करे रह गये
 
चाँद खुश्बू नदी पेड़ सारंगियाँ
तारकी -नभ तले जुगनुओं की चमक
अरुणिमा भोर की लालिमा सांझ की
अल्पना में ढला आ क्षितिज पर धनक
वादियाँ,नाव,कोयल,मयूरी हवा
गंध पीकर विचरती हुईं बदलियाँ
प्यार के गीत में ढल ना पाये तनिक
फूल,कलियाँ,मधुप,चाँद और तितलियाँ
 
अर्थ सारे गँवा शब्द आ सामने
एक परछाईं का चित्र बन रह गए

--
राकेश खंडेलवाललिखी गज़ल गीतों ने जब छन्दों की भाषामें
नये पृष्ठ जुड़ गये कई मन की अभिलाषा में

नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ

नैन की बीनाईयों पर धूल की परतें जमें जब
बादलों के चन्द टुकड़े केश में आकर घुलें जब
हाथ, शाखा इक तराशी का न पल भर हाथ छोड़ें
कोई रह रह भूलता सा याद में आने लगे जब
तब सुनो, यह मौन शब्दों में समय बतला रहा है
प्रीत की कविता नहीं अब नीति के कुछ गीत गाओ
गाओ वह जो एकतारे से कहे मीरा दिवानी
गाओ वह जो कुंज में वृन्दावनी हो सांझ गाये
छेड़ दो वह रागिनी जो सूर के स्वर में घुली है
गाऒ वह सुन कर जिसे खुद रागिनी भी गुनगुनाये
और यदि अक्षम तुम्हारा स्वर न गाने में सफ़ल हो
तो किनारे पर खड़े हो,धार के सपने सजाओ
प्रीत की अनुभूतियों को और कितने शब्द दोगे
और कितने दिन सपन के बीज बो निज को छलोगे
पीटते कब तक रहोगे जा चुके पग की लकीरें
कब तलक इक वृत्त में तुम बन्द कर पलकें चलोगे
ज़िन्दगी के पंथ के इस आखिरी विश्राम-स्थल पर
कुछ नई अभिव्यक्तियों की भूमिकायें अब बनाओ
हो गया ओझल नजर से उस दिवस में खोये क्यों तुम
शाख को क्या देखते हो, हो चुके नि:शेष विद्रुम
एक भ्रम की हो गईं धुन्धली घनी परछाईयों में
और कितनी देर तक तुम हो रहोगे इस तरह गुम
अब नये इक साज के निर्माण का आधार बन कर
सरगमों को इक नया ध्याय दे देकर सजाऒ

यह मुझको अनुमान नहीं था

सपनों की पगडंडी पर बस एक बार देखा था तुमको
बस जायेगा चित्र तुम्हारा आंखों में, अनुमान नहीं था
 
जीवन वन में रहा विचरता मर्यादा की ओढ़ दुशाला
संस्क्रुतियों के दीप जला कर किया पंथ में शुभ्र उजाला
गुरुकुल के सिद्धांत ईश का वचन मान कर शीष चढ़ाये
लेकर कच की परम्परायें, सम्बन्धों का अर्थ निकाला
 
लेकिन बरसों के प्रतिपादित नियम, निमिष में ढह जाते हैं
पुष्प शरों की सीमा कितनी है ये मुझको ज्ञान नहीं था
 
नारद का प्रण, तप की गरिमा, बन्धन सभी उम्र के टूटे
एक दॄश्य ही सत्य रह गया,बाकी चित्र हुए सब झूठे
याम,घड़ी पल, प्रहर समय की परिभाषायें शून्य हो गई
पलकें पत्थर हुईं,दृश्य जो एक बार बन गये, न टूटे
 
रात सौंप कर गई स्वप्न की जो इक स्वर्णिम रंगी चुनरिया
उसे छीन ले जाये ऐसा कोई भी दिनमान नहीं था
 
जाने क्यों परिचय अपना ही लगा अधूरा मुझको लगने
न जाने क्या आस संजोये, होंठ लगे रह रह कर कँपने
खुली हुई बाँहें अधीर हो उठीं पाश में भर लें कुछ तो
दूरी के मानक जितने थे सभी लगे मुट्ठी में बँधने
 
कब मरीचिकायें हो जाती हैं साकार इसे बतलाता
किसी कोश में किसी ग्रंथ में कोई भी प्रतिमान नहीं था

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...