इस नये वर्ष की नव उदित चाँदनी, आपके नैन में स्वप्न आँजे नये
उद्यमों की उगी भोर अँगनाई में आ भरे आपकी, स्वर्ण से अल्पना
दिन ढले सांझ श्रून्गार करती हुई,, बन के शामे अवध मुस्कुराती रहे
यह नया वर्ष पूरी करे कामना, आपने जिन की की हो कभी कल्पना.

सारी धरा ही आज प्यासी



घिर रहे आश्वासनों के मेघ  अम्बर में निरंतर
कल सुबह आ जाएगी फलती हुई आशाएं लेकर
ये अँधेरे बस घड़ी भर के लिए मेहमान है अब
कल उगेगा दिन सुनहरी धुप के संग में चमक कर

दे नहीं पाती दिलासा  बात अब  कोई ज़रा भी
प्राण से  अतृप्त है, सारी धरा ही आज प्यासी

वायदों के सिंधु आकर रोज ही तट पर उमड़ते
और बहती जाह्नवी में हाथ भी कितने पखरते
रेत  के पगचिह्न जैसी प्राप्ति की सीमाएं सारी
शंख के या सीपियों के शेष बस अवशेष मिलते

ज़िंदगी इस व्यूह में घिर हो गई रह कर धुँआ सी
एक कण मांगे   सुध , सारी धरा ही आज प्यासी

घेरते अभिमन्युओं को, जयद्रथों के व्यूह निशिदिन 
पार्थसारथि  हो भ्रमित खुद ढूंढता है राह के चिह्न 
हाथ हैं अक्षम उठा पाएं तनिक गांडीव अपना 
आर  ढलता  सूर्य  मांगे प्रतिज्ञाओं   से बंधा ऋण 

आज का यह दौर लगता गल्प की फिर से कथा सी
बूँद की आशा लिए सारी धारा ही आज प्यासी 

पास आये हैं सुखद पल तो सदा यायावरों से 
पीर जन्मों से पसारे पाँव , ना जाती घरों से 
जो किये बंदी बहारों की खिली हर मुस्कराहट 
मांगती अँगनाई पुषिप्त छाँह केवल पतझरों से 
 
किन्तु हर अनुनय विवशता से घिरी लौटी पिपासी
प्यास योन बढ़ने लगी, सारी धारा है आज प्यासी 

प्रभु अनुग्रह अपना दिखलाओ


जीवन के पथ पर जब जब भी ट्रेफ़िक लगता जाम हो गया
तब तब तुमने अधिकारी बन राहों के अवरोध मिटाये
गर्मी में जब कंस बन गया बिजलीघर का हर इक कर्मी
तुमने तब तब इनवर्टर बन झरे पसीने सभी सुखाये

प्रभुवर तुम दर्शन देते हो, शुक्रवार को चैक रूप में
अर्जी स्वीकारो मेरी तुम वही रूप धर प्रतिदिन आओ

पांव ्तुम्हारे  पल पल पूजें, तुम ही इक साकार ब्रह्म हो
 महिमा ओ आराध्य हमारे, कौन बखाने किसकी क्षमता
निशा दिवस अनुकूल जहाँ तुम हो कर चलते अन्तर्यामी
वहाँ  तुम्हारी कृपा किये है पाँच गुना वेतन से भत्ता

एक वर्ष में चार प्रमोशन मिल जायें लल्लो चप्पो कर
ओ त्रिपुरारी अपनी माया से कुछ ऐसा चक्र चलाओ

जहाँ तुम्हारा अनुग्रह होता वहाँ देवसलिलायें बहतीं
उद्गम हो स्काटलेंड का या पटियाले का बहाव हो
उसकी संध्यायें सजती है वेगासी कैसीनो जैसी
संभव नहीं कभी संचय में उसके थोड़ा भी अभाव हो

करते हैं दिन रात स्तवन हम, ओ रोलेटटेबल के स्वामी
नहीं चाह है निन्निनवें की, बस छत्तीस  गुणित करवाओ

निकला कितना दूर

कोई दे आवाज़ पार्श्व से 
साध यही  बस एक थाम के 
 निकला कितना दूर 

स्वप्नलोक में जीते जीते गुजरे कितने दिन
हुई अपरिचित मुस्कानें,नयनों की हर चितवन 
लगता है बरबस जैसे  हो
कांधों पर बोझा ढोते हो 
जीने को मज़बूर  

परिचय के धागों में उलझे अजनबियत के बीज 
चढ़ते दिन के साथ उगी सुरसा मुख बन कर खीज 
कोशिश की किरचों को चुनते 
दोपहरी में सपने बुनते 
तन मन  थक कर चूर 

स्वर्णकलश  के लिए ढूंढते इन्द्रधनुष का छोर 
भटकन में ही दिवस गुजारे क्या संध्या क्या भोर 
बीती हुई याद में जीते 
संचित करते घट में रीते 
पछतावे  भरपूर 

अब शब्द में अमरत्व देदें


गीत ये कहने लगा है आज कुछ ऐसा लिखें हम
लीक से हट कर ज़रा तो गीत को नव अर्थ दे दें

आज लिख दें दीप  के मन की व्यथा  जो प्राण देकर
दूर कर पाया नहीं था तम बसा उसकी तली  में
और पीड़ा फूल की जो देव के सर तो चढ़ा पर 
गंध का छिड़काव कर पाया नहीं अपनी गली में

कर रही हैं वर्तिकाएँ नित्य ही   बलिदान प्रतिपल
क्यों नहीं उनको पिरो अब शब्द में अमरत्व देदें 

प्रवृत्ति हम आसुरी  पर रह गए उंगली उठाये 
किंतु प्रेरित हो नहीं पाये करें हम नाश उनका 
आज लिख कर चेतना जो सो गई झकझोर दें हम
और परिवतन  बुलाएं  सही मानों में खुशी का 

तीर की हिचकोलियों में जो उलझ कर रह गई है 
आज हम उस नाव को मंझधार का अपनत्व दे   दें 

लिख रहे हैं जो समय के पृष्ठ पर विध्वंस के स्वर
कृष्ण बन संहार कर दें तोड़ कर अपनी प्रतिज्ञा
इक महाभारत सुनिश्चित वक्त की अंगड़ाइयां में
पूर्ण कर दें पार्थ बन कर द्रोण की पूरी अपेक्षा

कर चुकी श्रृंगार कितना  लेखनी कहने लगी है
अब शिराओं के रूधिर को युद्ध का कटु सत्य  दे दे

पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

तुम तो बसी हुई सांसों में सहचर हो धड़कन की मेरी
शतरूपे फ़िर सपनों की पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं

एक प्रतीक्षा पलक बिछाये रहती है लम्बी राहों पर 
चरण पुष्प की खिली पांखुरी हौले से आकर के छू ले
कनक तुली काया से झरते गन्धों के झरने में भीगे
मादकता से ओत प्रोत झोंकों में लेते पैंगे झूले

गिरती हुई ओस सी पग की आहट के मद्दम सुर लेकर
राग तुम्हारा मिले तभी फिर गीत बना कर गाऊँ मैं

नभ में उड़ते पाखी लाते सन्देसे केवक वे ही जो
पाकर  के आभास तुम्हारा अनायास ही संवर गये हैं
मेघदूत कलसी में भरकर ढुलकाता है सुधा कणों को
जोकि तुम्हारे कुन्तल की अलगनियों पर से बिखर गये हैं

तन की द्युतियाँ, मन की गतियाँ बन्दी होकर रहीं तुम्हारी
कलासाधिके , पृष्ठ खोल दो तो संभव पढ़ पाऊँ मैं

करवट लेकर आंख खोलती प्राची  के आंगन में किरणें
और पखारें अपने मुख को ढलती हुई ज्योत्सनाओं में
उगता हैं तब चित्र तुम्हारा बिछे क्षितिज के कैनवास पर
साँझ  आँजने लग जाती हैं , तब से मीत तुम्हारे सपने

इन्द्रधनुष के रंग तुम्हारे  इक  इंगित के अनुयायी है 
बंधी हथेली तनिक खुले   तो चित्र कोई रंग पाऊँ  मैं 

जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी

नव ग्रहों ने किया आज गठजोड़ यूँ
सब के सब आज नौ  वर्ष में ढल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजी
उसमें आकर सभी एक संग  मिल  गए

फिर से इतिहास के पृष्ठ कुछ खुल गए
याद में सात रंगी उमंगें घिरी
फिर से जीवंत होने लगे वे निमिष
जब खुली थी प्रथम, होंठ की पाँखुरी
दृष्टी की रश्मियाँ थी रिसी ओट से
पार करते हुए कुछ अवनिकाओं को
तंत्रियों में बजी सरगमों की धुनें
साज करते हुए मन की धाराओं को

वह घड़ी जब हृदय से हृदय के सिरे
बिन प्रयासों के सहसा गले मिल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए

एक वह मोड़ जिस पर भटकती हुई
वीथियां दो अचानक निकट आ गई 
एक वह पल कि जिसमें समाहित हुई
प्रेम गाथाएं खुद को थी दुहरा गई
जो शची से पुरंदर का नाता रहा
उर्वशी से पुरू का था सम्बन्ध जो
एक पल में नया रूप धरते हुए 
सामने आ खड़ा अवतरित हो के वो 

झोंके बहती हवा के लिए गंध को
तन को मन को भिगोने को ज्यों तुल  गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए

अग्नि के साक्ष्य में जो हुए थे ध्वनित 
मन्त्र के स्वर लगे आज फिर गूंजने 
शिल्प का एक, श्रृंगार आकर किया 
रूप की चमचमाती हुई धूप  ने 
स्वस्ति चिह्नित भरे जलकलश सामने 
एक चादर बना व्योम तारों भरी 
मन ने दुहराई फिर आज अनुबंध के
सत्य सौगंध की इक नै पंखुरी 

इक नए वर्ष की सज रही राह में 
कामना के सुमन और कुछ खिल गए
इक रजत पर्व की जो थी प्रतिमा सजीं
आज उसमें बरस पूर्ण  नौ  मिल गए  

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुये गन्ध के राही


पंक्ति बना कर शब्द अनगिनत होठों पर आ बस तो जाते
मन ये माने नहीं गीत हैं, सुर चाहे सज कर गाते हैं
 
सन्ध्या आ लिखने लगती है बीते दिन के इतिहासों को
दीप हजारों जल जाते हैं अर्जित पीड़ा की बाती के
अवरोघों के अवगुंठन में उलझ आह के सिसकी के सुर
सन्नाटे की प्रतिध्वनियों के रह जाते हैं साथी बन के
 
सीढ़ी पर धर पांव उतरती रजनी के पग की आहट पा
सोई हुई पीर के पाखी फ़िर से पंख फ़ड़फ़ड़ाते हैं
 
फ़ैली हुई हथेली असफ़ल रह जाती कुछ संचय कर ले
खुलती नहीं दृष्टि द्वारे पर लटकी आगल और साँकलें
अभिलाषा के वातायन पर जड़ी हुईं अनगिनत सलाखें
कर देती हैं पूर्ण असंभव नील गगन में जरा झाँक लें

खुली हवा की पगडंडी पर चलते हुए गंध के राही
कभी कभी तो जानबूझ कर अपनी गठरी खो जाते हैं

गीला करता आंजुरि को आ जब जब नव संकल्पों का जल
तब तब विधना की कलमों से रच जाते हैं नूतन अक्षर
आशाओं के चन्द्रमहल सब, सिन्धु तीर पर बालू वाले
एक घरोंदे जैसे पाकर परस लहर का रहे बिखर  कर

उलझी हुई हाथ की रेखाओं से नक्षत्रों के रिश्ते
जोड़ घटाने, भाग गुणित करने पर सुलझ नहीं पाते हैं

दीप दीपावली के सजें न सजें

दीप दीपावली के सजें न सजें
ये अंधेरे नहीं शेष रह पायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अँगनाई में खुद ही जल जायेंगे

भोर नित ही उगाती रही सूर्य को
सांझ ढलते अंधेरा मगर आ घिरे
अनवरत चल रहे चक्र के आज तक
कोई भी थाम पाया नहीं है सिरे
आओ अब इक नई रीत को जन्म दें
फ़िर न रह पाये मावस अंधेरी यहाँ
मुस्कुराती रहे चाँदनी से सजी
दोपहर सी गली हो सजे नित जहाँ

नागिनी नृत्य से ये निशा के चिकुर
चाँद की रश्मियाँ बन सँवर जायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

रोशनी की किरन एक पल न थकी
तम की सत्ताओं से युद्ध करते हुये
तम कुचलता हुआ सिर उठाता रहा
आदि से आज तक यूँ ही चलते हुये
आज रच लें नई नीतियां कर जतन 
जो अंधेरे का बाकी नहीं शेष हो
एक क्षण के लिये भी नहीं रुक सके
शंख से  गूँजकर अब जो जयघोष हो

ये तुम्हारे ही इंगित से संभव प्रिये
पृष्ठ इतिहास के सब बदल जायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

कार्तिकी एक तिथि की प्रतीक्षा बिना
दीप के पर्व हर रोज मनता रहे
भोर दीपक जलाये जो कल आ यहाँ
काल के अंत तक यूँ ही जलता रहे
शब्दकोशों से मिट कर तिमिर अब रहे
आओ ऐसे प्रयासों को मिल कर करें
मिट्टियों के नहीं ज्ञान के दीप हम
देहरी पर हर इक ज़िन्दगी की धरें

आंजुरि में सजे आज  संकल्प तो
कुछ असंभव नहीं शेष रह पायेंगे
तुम जरा मुस्कुरा दो प्रिये एक पल
दीप अंगनाई में खुद ही जल जायेंगे

इक गीत नया होने को है

अलसाई सांझ ओढ़ लेती इन दिनों नया ही इक घूँघट
झरते पत्तों में धीमे से बोता रागिनियाँ वंशीवट
अभिसारित अभिलाषायें ले कह उठता है शरदीला पल
ये रात कहाँ सोने को है
इक गीत कोई होने को है.

आता है दूर कहीं गिरती बर्फीली फुहियों का ये  सुर 
सीढ़ी से नीचे उतर रही, पुरबाई के पग के नूपुर 
इनको लेकर के साथ चला आवारा मौसम का पटुवा 
सरगम लगता पोने को है
 इक गीत नया होने को है 

दिन सिकुड़ा सकुचा सिमटा सा ,निशि यौवन की ले अंगड़ाई 
शिंजिनियाँ घोल शिरा में दे, भुजपाशों की ये गरमाई 
पुष्पित शर लिए खड़ा धन्वा , इक  लक्ष्य भेद संधाने है 
अब ध्यान भंग होने को है 
इक गीत नया होने को है 

चंदियाई गोटे का जोड़ा, पहने रजनी की नवल वधू
हाथों की मेहँदी के बूटे, महकाते संदलिया खुशबू
नजरें उठ्ती हैं बार बार वापिस आती हैं पथ को छू
आतुर अपने गौने को है
------------------फ़िर कलम किस तरह मौन रहे
इक नया गीत होने को है.

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...