दोपहर ने साथ मेरे छल किया है

आ गए अंगनाई में फिर से उतर कोहरे घनेरे
आज फिर से दोपहर ने साथ मेरे छल किया है
 
भोर के पट जा किरण ने रोज ही थे थपथपाये
नींद से जागे, सुनहरी रूप आ अपना दिखाये
और प्राची से निरन्तर जोड़ते सामंजसों को
स्वर प्रभाती के नये कुछ छेड़ स्वर अपना मिलाये
 
किन्तु जागी भोर जब आई उतर कर देहरी पर
तो लगा जैसे किसी ने तिमिर मुख पर मल दिया है
 
रोशनी को ढूँढ़ते पथ में दिवस आ लड़खड़ाता
बायें दायें पृष्ठ जाता और फिर पथ भूल जाता
सोख बैठी है सियाही बाग झरने फूल पर्वत
एक सन्नाटा घिरा चहुँ ओर केवल झनझनाता
 
फ़ैलता विस्तार तम का हो गया निस्सीम जैसे
एक ही आकार जिसने घोल नभ में थल दिया है
 
खो चुकी सारी दिशायें, क्या कहाँ है क्या यहाँ है
और जो भी पास होने का भरम, जाने कहाँ है
मुट्ठियों ने क्या समेटा क्या फ़िसल कर बह गया है
जो अपेक्षित है , नजर जाती नहीं है बस वहाँ है
 
वह सुनहरा स्वप्न जिसके बीज बोये नित नयन ने
रात की पगडंडियों पर पार जाने चल दिया है

पाँचसौवीं प्रस्तुति---केवल हैं आभास तुम्हारे

जाते  जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया और दरवाजे के एक ओर होकर अक्तूबर को अन्दर आने का निमंत्रण देते हुये बाहर निकल गया. ऊहापोह में डूबा मैं उसके इस व्यवहार को समझने की कोशिश कर ही रहा था तभी अक्तूबर ने अपनी एक उंगली उठा कर याद दिलाया कि गीत कलश पर माँ शारदा के आशीष के शब्द सुमन प्रस्तुत करने हैं और यह पंखुरियाँ इस क्रम में पाँचसौवीं होंगी. कुछ विशेष नहीं है. वही शब्दों के फूल जो सदा माँ सरस्वती के चरणोंमें चढ़ते है. वही शब्द सुमन एक बार फिर सादर समर्पित माँ भारती के श्री चरणों में :-


निखरी है कोई परछाई जब जब भी धरती पर पड़कर
मृतिका सहज बना देती है प्रतिमा उसकी पल में गढ़ कर
अनायास वो सज जाती है छवियाँ लेकर मीत तुम्हारी
रख लेता है भावसिक्त मन उसको दीवारों पर जड़कर
 
 
परछाईं तो परछाईं है, बोध कहे कितना भी चाहे
दृष्टि ढूँढती हर परछाईं में केवल आभास तुम्हारे
 
 
जिन सोचों में डूबा हूँ मैं, शायद तुम भी उनमें खोये
जो सपने देखे हैं मैंने,तुमने भी आँखों में बोये
यादों के जिन मणिपुष्पों की  माला तुमने पहन  रखी है
मैंने भी तो उस माला में एक एक कर मोती पोये   
 
 
दूर क्षितिज के पार कहीं तुम ज्ञात मुझे है ये अनुरागी
लेकिन मन का पाखी रह रह उड़ जाता है पास तुम्हारे
 
 
प्राची की शाखा पर बुनते चादर बही हवा के धागे
उनसे छनती हुई धूप को पी पी कर के उषा जागे
उसकीअँगड़ाई नदिया की लहरों पर जो चित्र उकेरे
उनमें पाकर छाँव तुम्हारी लगन तुम्हीं से फिर फिर लागे
 
 
यायावरी पगों की भटकन जब जब भी पाथेय सजाती
पते नीड़ के तब तब होकर आते हैं बस दास तुम्हारे
 
 
अस्ताचल के पथ में आकर गाता है जब कोई पाखी
यादों की मदिरा छलकाती रह रह कर सुधियों की साकी
नाम तुम्हारा गूंजा करता, स्वप्न तुम्हारे बनें नयन में
रंगमयी होने लग जाती है मेरी संध्या एकाकी
 
 
जब भी कोई गीत सजाया है मैने अपने अधरों पर
बस बनते हैं छन्द सँजोकर अलंकार अनुप्रास तुम्हारे

रचें नयन में आ राँगोली

दीवाली के जले दियों की किरन किरन में तुम प्रतिबिम्बित
रंग तुम्हारी अँगड़ाई से पाकर के सजती है होली

तुम तो तुम हो तुलनाओं के लिये नहीं है कुछ भी संभव
कचनारों में चैरी फूलों में, चम्पा में आभा तुमसे
घटा साँवरी,पल सिन्दूरी, खिली धूप का उजियारापन
अपना भाग्य सराहा करते पाकर के छायायें तुमसे
 
 
उगे दिवस की वाणी हो या हो थक कर बैठी पगडंडी
जब भी बोली शब्द कोई तो नाम तुम्हारा ही बस बोली
 
 
फ़िसली हुई पान के पत्तों की नोकों से जल की बूँदें
करती हैं जिस पल प्रतिमा के चरणों का जाकर प्रक्षालन
उस पल मन की साधें सहसा घुल जाया करतीं रोली में
और भावनायें हो जातीं कल्पित तुमको कर के चन्दन
 
 
अविश्वास का पल हो चाहे या दृढ़ गहरी हुई आस्था
अर्पित तुमको भरी आँजुरी, करे अपेक्षा रीती झोली

आवश्क यह नहीं सदा ही खिलें डालियों पर गुलमोहर
आवश्यक यह नहीं हवा के झोंके सदा गंध ही लाये
यह भी निश्चित नहीं साधना पा जाये हर बार अभीप्सित
यह भी तय कब रहा अधर पर गीत प्रीत के ही आ पाय
 
 
लेकिन इतना तय है प्रियतम, जब भी रजनी थपके पलकें
तब तब स्वप्न तुम्हारे ही बस रचें नयन में आ राँगोली

आप-एक बार फिर


नैन की वीथियों में संवरता रहा
हर निशा में वही सात रंगी सपन
छू गई थी जिसे आपकी दृष्टि की
एक दिन जगमगाती सुनहरी किरण
आगतों के पलों में घुले हैं हुये
पल विगत के रहे जो निकट आपके
आपकी ही छवी से लगा जुड़ गई
ज़िंदगी की मेरी ये चिरंतर लगन
धूप जब भी खिली याद आने लगा आपकी ओढ़नी का मुझे वो सिरा
गुलमुहर की लिए रंगतें,गंध बन जो मलय की सदा वाटिका में तिरा
कोर की फुन्दानियों से छिटकती हुई जगमगाहट दिवस को सजाती हुई
शीश के स्पर्श से ले मुदित प्रेरणा, व्योम में सावनी मेघ आकर घिरा

आप-एक और चित्र

व्योम के पत्र पर चाँदनी की किरन, रात भर एक जो नाम लिखती रही
वर्तनी से उसी की पिघलते हुये, पाटलों पर सुधा थी बरसती रही
चाँद छूकर उसे और उजला हुआ, रोशनी भी सितारों की बढ़ने लगी
आपका नाम था, छू पवन झालरी गंध बन वाटिका में विचरती रही
 
बादलों ने उमड़ते हुये लिख दिया ,व्योम पर से जिसे बूँद में ढाल कर
टाँकती है जिसे गंध पीकर हवा, मन के लहरा रहे श्वेत रूमाल पर
एक सतरंग धनु की प्रत्यंचा बना जो दिशाओं पे संधान करता रहा
आपका नाम है जगमगाता हुआ नित्य अंकित हुआ है दिवस भाल पर

आप--सितम्बर

ट्रेन की सीट पर थे बिखर कर पड़े,कल के अखबार की सुर्खियों में छिपा
शब्द हर एक था कर रहा मंत्रणा,इसलिये नाम बस आपका ही दिखा
जो समाचार थे वे सभी आपकी गुनगुनाती हुई मुस्कुराहट भरे
और विज्ञापनों में सजा चित्र जो वो मुझे एक बस आपका ही लगा
 
 
शोर ट्रेफ़िक का सारा पिघलते हुये, यूँ लगा ढल गया एक ही नाम में
भोर आफ़िस को जाते हुये थी लगा,और यूँ ही लगा लौटते शाम में
पट्ट चौरास्तों पर लगे थे हुये, चित्र जिनमें बने थे कई रंग के
चित्र सारे मुझे आपके ही लगे, मन रँगा यूँ रहा आपके ध्यान में

आप-क्रम

रात की खिड़कियों पे खड़े सब रहे, स्वप्न उतरा नहीं कोई आकर नयन
नैन के दीप जलते प्रतीक्षा लिये, कोई तो एक आकर करेगा चयन
चाँदनी की किरन में पिरोती रही, नींद तारों के मनके लिये रात भर
आप जब से गये, कक्ष सूना हुआ, सेज भी अब तो करती नहीं है शयन

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गुनगुनाने लगीं चारदीवारियाँ, नृत्यमय अलगनी पे टँगी ओढ़नी
देहरी हस्तस्पर्शी प्रतीक्षा लिये, है प्रफ़ुल्लित हो सावन में ज्यों मोरनी
थिरकनें घुँघरुओं की सँवरने लगीं, थाप तबला भी खुद पे लगाने लगा
आपके पग हुये अग्रसर इस तरफ़, धूप की इक किरन छू कहे बोरनी

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भोर आई जो प्राची की उंगली पकड़ , याद आया मुझे नाम तब आपका
ओढ़नी लाल संध्या ने ओढ़ी जरा, चित्र बनने लगा नैन में आपका
दोपहर की गली से गुजरते हुये, बात जब पत्तियों से हवा ने करी
चाँदनी के सितारों पे बजता हुआ, याद आया मुझे कंठस्वर आपका

आप--अगस्त २०१२

आपके होंठ से जो फ़िसल कर गिरी
मुस्कुराहट कली बन महकने लगी
रंगतों ने कपोलों की जो छू लिया
तो पलाशों सरीखी दहकने लगी
स्वप्न की क्यारियाँ, पतझरी चादरें
ओढ़ कर मौन सोई हुईं थीं सभी
आपकी गंध ने आ जो चूमा इन्हें
पाखियों की तरह से चहकने लगी<
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सूर्य को अर्घ्य थे आप देते हुये
अपने हाथों में जल का कलश इक लिये
मंत्र का स्वर उमड़ता हुआ होंठ पर
एक धारा के अभिनव परस के लिये
बन्द पलकों पे उषा की पहली किरन
गाल पर लालिमा का छुअन झिलमिली
दृष्टि हर भोर अपनी उगाती रही
बस उसी एक पल के दरस के लिएय.

उन्हें आज ही कहना अच्छा

ठहरे हुआ नीर जब दर्पण बनता, तो धुंधला ही बनता
गतियाँ भले रहें मंथर ही, पर उसका है बहना अच्छा
 
भिन्न दिखाते आकृतियों के आकारों को सुधि के टुकड़े
प्रतिपल बदले अनुपातों के रह रह रहे बदलते क्रम में
अपने ही बिम्बों से डोरी बँधी हुई परिचय की टूटे
खींचे हुए स्वयं के अपने ही मिथ्या व्यूहों के भ्रम में
 
कुछ सन्दर्भ बदल देये हैं स्थापित हर इक परिभाषा को
इसीलिये जो शब्द पास हैं, उन्हें आज ही कहना अच्छा
 
हुई दृष्टि संकुचित दायरों की सीमाओं में जब बन्दी
तब मरीचिकाओं के संभ्रम आकर छा जाते वितान पर
किन्तु उतरती हुई कलई की खुलती हैं जब झीनी परतें
प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं,सम्बन्धों की हर उड़ान पर
 
हुआ प्रशंसा से अनुमोदित गर्व चढ़ा जिन कंगूरों पर
उन आधारहीन कंगूरों का सचमुच है ढहना अच्छा
 
प्रसवित अनुमानों से होते,हुए संचयित निष्कर्षों में
खो देती हैं पंथ स्वयं का सत्य बोध की सीधी रेखा
नयनों के दरवाजे पर तब दस्तक देते थके रोशनी
और दृश्य हर एक स्वयं को रह जाता करके अनदेखा
 
क्षणिक सांत्वना के स्पर्शों से जो अनुभूति बने दुखदायी
मन को अपने उसका होकर एकाकी ही सहना अच्छा

पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं

आके सावन गली से गुजरता रहा
पर घटा कोई भी द्वार आई नहीं
 
धूप ने जिन पथों को प्रकाशित किया
वे सदा दूर मेरे पगों से रहे
कोई ऐसी किरण ना मिली आज तक
एक पल के लिये बाँह आकर गहे
एक टूटे सितारे की किस्मत लिये
व्योम की शून्यता में विचरता रहा
और मौसम की सूखी हुई डाल से
नित्य दिनमान पत्ते सा झरता रहा
 
एक मुट्ठी खुली,आँजुरी ना बनी
नीर की बूँद हाथों में आई नहीं
 
इक मयुरी करुण टेर उठती हुई
तीर नदिया के आ लड़खड़ाती रही
प्यास चातक की उलझी हुई कंठ से
आई बाहर नहीं, छटपटाती रही
पी कहां स्वर भटकता हुआ खो गया
फ़िर ना लौटाई कोई क्षितिज ने नजर
ठोकरें खाते,गिरते संभलते हुये
क्रम में बँध रह गया ज़िन्दगी का सफ़र.
 
तार झंकारते थक गईं उंगलियां
एक पाजेब पर झनझनाई नहीं
 
आईना बिम्ब कोई ना दिखला सका
दूर परछाईयाँ देह से हो गईं
अजनबी गंध की झालरें टाँक कर
रिक्त इक पालकी ही हवा ढो गई
एक रेखा दिशाओं में ढलती रही
एक ही वृत्त के व्यास को बांध कर
रात ठगिनी हुई साथ में ले गईं
नींद की गठरियाँ पीठ पर लाद कर
 
दूर जाते हुये रोशनी कह गई
सांझ तक की शपथ थी उठाई नहीं

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...