आप-एक और चित्र

व्योम के पत्र पर चाँदनी की किरन, रात भर एक जो नाम लिखती रही
वर्तनी से उसी की पिघलते हुये, पाटलों पर सुधा थी बरसती रही
चाँद छूकर उसे और उजला हुआ, रोशनी भी सितारों की बढ़ने लगी
आपका नाम था, छू पवन झालरी गंध बन वाटिका में विचरती रही
 
बादलों ने उमड़ते हुये लिख दिया ,व्योम पर से जिसे बूँद में ढाल कर
टाँकती है जिसे गंध पीकर हवा, मन के लहरा रहे श्वेत रूमाल पर
एक सतरंग धनु की प्रत्यंचा बना जो दिशाओं पे संधान करता रहा
आपका नाम है जगमगाता हुआ नित्य अंकित हुआ है दिवस भाल पर

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

अहा, बहुत सुन्दर..

आशा जोगळेकर said...

बादलों ने उमड़ते हुये लिख दिया ,व्योम पर से जिसे बूँद में ढाल कर
टाँकती है जिसे गंध पीकर हवा, मन के लहरा रहे श्वेत रूमाल पर

अति सुंदर ।

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