आप-क्रम

रात की खिड़कियों पे खड़े सब रहे, स्वप्न उतरा नहीं कोई आकर नयन
नैन के दीप जलते प्रतीक्षा लिये, कोई तो एक आकर करेगा चयन
चाँदनी की किरन में पिरोती रही, नींद तारों के मनके लिये रात भर
आप जब से गये, कक्ष सूना हुआ, सेज भी अब तो करती नहीं है शयन

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गुनगुनाने लगीं चारदीवारियाँ, नृत्यमय अलगनी पे टँगी ओढ़नी
देहरी हस्तस्पर्शी प्रतीक्षा लिये, है प्रफ़ुल्लित हो सावन में ज्यों मोरनी
थिरकनें घुँघरुओं की सँवरने लगीं, थाप तबला भी खुद पे लगाने लगा
आपके पग हुये अग्रसर इस तरफ़, धूप की इक किरन छू कहे बोरनी

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भोर आई जो प्राची की उंगली पकड़ , याद आया मुझे नाम तब आपका
ओढ़नी लाल संध्या ने ओढ़ी जरा, चित्र बनने लगा नैन में आपका
दोपहर की गली से गुजरते हुये, बात जब पत्तियों से हवा ने करी
चाँदनी के सितारों पे बजता हुआ, याद आया मुझे कंठस्वर आपका

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

अहा, कोमल कल्पना के अनुपम उद्गार..

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...