दृष्टि की अपनी कलम से लिख दिया तुमने
गीत जो मेरे नयन पर ओ कमल नयने
मैं अधर की थिरकनों में बाँध कर अपने
बस उसी इक गीत को दिन रात गाता हूँ
कुछ अबोले शब्द में जो बाँध कर भेजा
था हजारों पुस्तकों में बन्द सन्देस
धर्म ग्रन्थों में समाहित, लोक गाथायें
स्वर्णमंडित बात में नव रीत उपमायें
साज के बिन जो बिखेरी रागिनी तुमन
साथ उसके पायलों सा झनझनाता हूँ
उंगलियों के पोर ने जो होंठ से लेक
शब्द ढाले भाव की रसगन्ध ले लेकर
अक्षरों के मध्य में सन्देश दुबकाक
बिन सुरों के जो सुनाया है मुझे गाकर
मैं उसी से जो सुवासित हो गये झोंके
का परस करके स्वयं में महक जाता हूँ
नैन के पाटल बनाकर कैनवस तुमने
खींच डाले इन्द्रधनुषी रंग के सपन
जागती अँगड़ाईयों की चाह में भीगे
आ गये बादल उतर कर पास अवनी क
मैं उन्हीं की श्वास को मलयज बना कर के
मन्द गति से साथ उनके थरथराता हूँ
मैं किरन से गीत लिखता
भोर की पहली किरन को ढाल लेता हूँ कलम में
और संध्या तक लहरते आंचलों पर गीत लिखता
सुरमई, ऊदे, सिन्दूरी, रंग मिलते हैं नये नित
कुछ धुंआसे और कुछ भीगे हुए टपकी सुधा में
कोई आँचल है बिखरते स्वप्न की किरचें समेटे
और कोई सामने आया मगर डूबा व्यथा में
मैं उमड़ती कल्पना के स्वर्ण पल का रंग लेकर
तूलिका से कोशिशें करता नये फिर रंग भरता
पाटलों के छोर से उड़ती हुई रसगंध थाम
खींचता हूँ चित्र मैं मधुमय हवा की डालियों पर
इन्द्रधनुषी रंग से उनका सजाता हूँ निरन्तर
कांच के टुकड़े रखे मैं पत्तियों की जालियों पर
बादलों के आंचलों से ले छुअन अहसास वाली
मैं सुधी के दर्पणों में बिम्ब बन बन कर के उभरता
बीज बोता हूँ सपन के मैं नयन की क्यारियों में
और अधरों पर उगाता रत्न जड़ कर मुस्कुराह
रोशनी के कुमकुमों से चीर देता हूँ तिमिर को
सौंपता हूँ थक गये पग को गति की कुलबुलाहट
मैं धरा के पत्र पर लिखता नये अक्षर कथा के
जिस घड़ी भी शाख पर से एक सूखा पात झरता
और संध्या तक लहरते आंचलों पर गीत लिखता
सुरमई, ऊदे, सिन्दूरी, रंग मिलते हैं नये नित
कुछ धुंआसे और कुछ भीगे हुए टपकी सुधा में
कोई आँचल है बिखरते स्वप्न की किरचें समेटे
और कोई सामने आया मगर डूबा व्यथा में
मैं उमड़ती कल्पना के स्वर्ण पल का रंग लेकर
तूलिका से कोशिशें करता नये फिर रंग भरता
पाटलों के छोर से उड़ती हुई रसगंध थाम
खींचता हूँ चित्र मैं मधुमय हवा की डालियों पर
इन्द्रधनुषी रंग से उनका सजाता हूँ निरन्तर
कांच के टुकड़े रखे मैं पत्तियों की जालियों पर
बादलों के आंचलों से ले छुअन अहसास वाली
मैं सुधी के दर्पणों में बिम्ब बन बन कर के उभरता
बीज बोता हूँ सपन के मैं नयन की क्यारियों में
और अधरों पर उगाता रत्न जड़ कर मुस्कुराह
रोशनी के कुमकुमों से चीर देता हूँ तिमिर को
सौंपता हूँ थक गये पग को गति की कुलबुलाहट
मैं धरा के पत्र पर लिखता नये अक्षर कथा के
जिस घड़ी भी शाख पर से एक सूखा पात झरता
ज़िन्दगी
ज़िन्दगी ये न ईमेल कविताओं की
पढ़ लिया हो जिसे गुनगुनाते हुए
छन्द ये है नहीं प्रीत का लिख गया
कोई मन पर जिसे गुदगुदाते हुए
चित्र भी वो नहीं,भोर की रश्मियाँ
कूचियाँ ले दिवस में सजाती रहें
ज़िन्दगी अश्रु मुस्कान के पल रँगे
चन्द आते हुए चन्द जाते हुए
----------------------
ज़िन्दगी को निहारा सभी ने मगर
दृष्टि मेरी अलग कोण से है पड़ी
मुझको देकर गई भिन्न अनुभूतियाँ
आपसे,हो दिवस की निशा की घड़ी
सांझ ने सन्धि करते हुए यामिनी
से किये जितने अनुबन्ध, मैने पढ़े
मैं तलाशा किया उद्गमों के सिरे
दृष्टि जब दूसरी,फ़ुनगियों पे चढ़ी
------------------------
ज़िन्दगी एक चादर मिली श्वेत सी
बूटियाँ नित नई काढ़ते हम रहे
छोर को एक,छूकर चली जो हवा
साथ उसके किनारी चढ़े हम बहे
फूल पाये न जब टाँकने के लिये
हम बटोरा किये पत्र सूखे हुए
सांझ को फिर सजाते रहे स्वप्न वे
भोर के साथ जो नित्य ही थे ढहे
पढ़ लिया हो जिसे गुनगुनाते हुए
छन्द ये है नहीं प्रीत का लिख गया
कोई मन पर जिसे गुदगुदाते हुए
चित्र भी वो नहीं,भोर की रश्मियाँ
कूचियाँ ले दिवस में सजाती रहें
ज़िन्दगी अश्रु मुस्कान के पल रँगे
चन्द आते हुए चन्द जाते हुए
----------------------
ज़िन्दगी को निहारा सभी ने मगर
दृष्टि मेरी अलग कोण से है पड़ी
मुझको देकर गई भिन्न अनुभूतियाँ
आपसे,हो दिवस की निशा की घड़ी
सांझ ने सन्धि करते हुए यामिनी
से किये जितने अनुबन्ध, मैने पढ़े
मैं तलाशा किया उद्गमों के सिरे
दृष्टि जब दूसरी,फ़ुनगियों पे चढ़ी
------------------------
ज़िन्दगी एक चादर मिली श्वेत सी
बूटियाँ नित नई काढ़ते हम रहे
छोर को एक,छूकर चली जो हवा
साथ उसके किनारी चढ़े हम बहे
फूल पाये न जब टाँकने के लिये
हम बटोरा किये पत्र सूखे हुए
सांझ को फिर सजाते रहे स्वप्न वे
भोर के साथ जो नित्य ही थे ढहे
प्रीत का आराध्य देखो आ गया है द्वार चल कर
ओस की बून्दें अचानक शबनमी कुछ और हो लीं
जाग कर हर इक कली ने मुस्कुराकर आँख खोली
वॄक्ष पर पत्ते हुए पुरबाईयों के साथ नर्तित
फागुनी मौसम हुआ है, झूम कर मल्हार बोली
दो विदाई आज विरहा के अतिथि को तुम ह्रदय से
प्रीत का आराध्य देखो आ गया है द्वार चल कर
स्वप्न के मोती चुने थे रात में हर यामिनी ने
बैठ कर जागी हुई आकाशगंगा के किनारे
साधना के दीप की लौ बन रहे थे प्रज्ज्वलित हो
नैन की बीनाईयों में आस के जलते सितारे
आहटों की कामना में कान की सूनी प्रतीक्षा
पल्लवित थी हो रही हर एक होते द्रवित पल में
अर्चना की थी बड़ी होती अपेक्षायें निरन्तर
कोई कंकर आ गिरे मन झील के इस शांत जल में
शुक्ल पक्षी हो गया बैसाख का, सामीप्य का पल
लग गया बहने खड़ा एकाकियत की शैल गल कर
सावनों के सोम से ले निर्जला एकादशी तक
के व्रतों के सब मनोरथ लग गए हैं पूर्ण होने
संशयों के जो कुहासे थे खड़े बदरंग होकर
धूप का पा स्पर्श अपना लग गए अस्तित्व खोने
कोटरों में जा छुपी थीं जो कपोतों सी उमंगें
हो रहीं स्वच्छंद भरने लग रहीं नभ में उडानें
दूर तक फैले मरुस्थल, बांस के वन हो गए हैं
घोलते बहती हवा में बांसुरी की मुग्ध तानें
शाख से कैलेंडरों की झर रहे दिनमान सूखे
हो गए रंगीन फिर से, वेशभूषाएं बदल कर
सांझ तुलसी पर उषा में था जलहरी पर चढ़ाया
एक आंजुर नीर शिव के केश की धारा बना है
सूत बाँधा शाख पर जो एक वट की, कुमकुमी कर
वह सँवर आकाश के तारों जड़ा मंडप तना है
अर्चना के मंत्र मिल कर प्रार्थना की वाणियों में
बन गये हैं सुर मनोहर गूँजती शहनाईयों के
हो गई अलकापुरी की वीथियों सी हर डगर अब
पारिजातों के गले लग कर चली पुरबाईयों से
छँट गये असमंजसों के घिर रहे थे जो कुहासे
प्रश्न लाये हैं स्वयं को आज अपने आप हल कर
जाग कर हर इक कली ने मुस्कुराकर आँख खोली
वॄक्ष पर पत्ते हुए पुरबाईयों के साथ नर्तित
फागुनी मौसम हुआ है, झूम कर मल्हार बोली
दो विदाई आज विरहा के अतिथि को तुम ह्रदय से
प्रीत का आराध्य देखो आ गया है द्वार चल कर
स्वप्न के मोती चुने थे रात में हर यामिनी ने
बैठ कर जागी हुई आकाशगंगा के किनारे
साधना के दीप की लौ बन रहे थे प्रज्ज्वलित हो
नैन की बीनाईयों में आस के जलते सितारे
आहटों की कामना में कान की सूनी प्रतीक्षा
पल्लवित थी हो रही हर एक होते द्रवित पल में
अर्चना की थी बड़ी होती अपेक्षायें निरन्तर
कोई कंकर आ गिरे मन झील के इस शांत जल में
शुक्ल पक्षी हो गया बैसाख का, सामीप्य का पल
लग गया बहने खड़ा एकाकियत की शैल गल कर
सावनों के सोम से ले निर्जला एकादशी तक
के व्रतों के सब मनोरथ लग गए हैं पूर्ण होने
संशयों के जो कुहासे थे खड़े बदरंग होकर
धूप का पा स्पर्श अपना लग गए अस्तित्व खोने
कोटरों में जा छुपी थीं जो कपोतों सी उमंगें
हो रहीं स्वच्छंद भरने लग रहीं नभ में उडानें
दूर तक फैले मरुस्थल, बांस के वन हो गए हैं
घोलते बहती हवा में बांसुरी की मुग्ध तानें
शाख से कैलेंडरों की झर रहे दिनमान सूखे
हो गए रंगीन फिर से, वेशभूषाएं बदल कर
सांझ तुलसी पर उषा में था जलहरी पर चढ़ाया
एक आंजुर नीर शिव के केश की धारा बना है
सूत बाँधा शाख पर जो एक वट की, कुमकुमी कर
वह सँवर आकाश के तारों जड़ा मंडप तना है
अर्चना के मंत्र मिल कर प्रार्थना की वाणियों में
बन गये हैं सुर मनोहर गूँजती शहनाईयों के
हो गई अलकापुरी की वीथियों सी हर डगर अब
पारिजातों के गले लग कर चली पुरबाईयों से
छँट गये असमंजसों के घिर रहे थे जो कुहासे
प्रश्न लाये हैं स्वयं को आज अपने आप हल कर
एक अगन सी रोम रोम में
तुम कुछ पल को मिले और फिर बने अपरिचित विलग हो गये
तब से जलने लगी निरन्तर एक अगन सी रोम रोम में
सुलग रहा अधरों पर मेरे स्पर्श एक पल का अधरों का
भुजपाशों में रह रह करके आलिंगन के घाव सिसकते
दॄष्टिपात वह प्रथम शूल सा गड़ा हुआ मेरे सीने में
काँप काँप जाता है तन मन उन निमिषों की यादें करते
ग्रसता है विरहा का राहू आशाओं का खिला चन्द्रमा
जब जब भी पूनम की निशि को निकला है वह ह्रदय व्योम में
आंखों में उमड़ी बदली में धुंधला गये चित्र सब सँवरे
ज्वालामुखियों के विस्फ़ोटों सी फूटीं मन में पीड़ायें
बरसी हुई सुधा की बून्दें सहसा हुईं हलाहल जैसे
कड़ी धूप मरुथल की होकर लगी छिटकने चन्द्र विभायें
दिन वनवासी हुए धधकते यज्ञ कुंड सी हुईं निशायें
आहुति होती है सपनों की एक एक हो रहे होम में
चढ़े हुए सूली पर वे पल जो बीते थे साथ तुम्हारे
बिखरे हैं हजार किरचों में चेहरे सब संचित अतीत के
प्रतिपादित कीं तुमने नूतन परिभाषायें भाव शब्द की
मैने जैसे सोचे न थे निकलेंगे यों अर्थ प्रीत के
अर्थ भावनाओं के जितने वर्णित थे मन की पुस्तक में
एक एक कर सन्मुख आये, आये पर ढल कर विलोम में
तब से जलने लगी निरन्तर एक अगन सी रोम रोम में
सुलग रहा अधरों पर मेरे स्पर्श एक पल का अधरों का
भुजपाशों में रह रह करके आलिंगन के घाव सिसकते
दॄष्टिपात वह प्रथम शूल सा गड़ा हुआ मेरे सीने में
काँप काँप जाता है तन मन उन निमिषों की यादें करते
ग्रसता है विरहा का राहू आशाओं का खिला चन्द्रमा
जब जब भी पूनम की निशि को निकला है वह ह्रदय व्योम में
आंखों में उमड़ी बदली में धुंधला गये चित्र सब सँवरे
ज्वालामुखियों के विस्फ़ोटों सी फूटीं मन में पीड़ायें
बरसी हुई सुधा की बून्दें सहसा हुईं हलाहल जैसे
कड़ी धूप मरुथल की होकर लगी छिटकने चन्द्र विभायें
दिन वनवासी हुए धधकते यज्ञ कुंड सी हुईं निशायें
आहुति होती है सपनों की एक एक हो रहे होम में
चढ़े हुए सूली पर वे पल जो बीते थे साथ तुम्हारे
बिखरे हैं हजार किरचों में चेहरे सब संचित अतीत के
प्रतिपादित कीं तुमने नूतन परिभाषायें भाव शब्द की
मैने जैसे सोचे न थे निकलेंगे यों अर्थ प्रीत के
अर्थ भावनाओं के जितने वर्णित थे मन की पुस्तक में
एक एक कर सन्मुख आये, आये पर ढल कर विलोम में
दीपक एक नहीं जल पाया
शब्दों के ताने बाने बुन लिख तो लिये गीत अनगिनती
सूखे अधरों पर आकर के एक नहीं लेकिन सज पाया
उगी भोर ने सन्नाटे के सुर में अपना राग सँवारा
दोपहरी ने उठा हुआ हर एक प्रश्न हर बार नकारा
संध्या बीती टूटी हुई आस्थाओं के टुकड़े चुनते
रातें व्यस्त रहीं सपनों के अवशेषों के धागे बुनते
जीवन की इस दौड़ धूप में, उठा पटक में उलझे सब पल
अब अंतिम भी विलय हो रहा,किन्तु न दीप एक जल पाया
जब भी मुड़ कर करना चाहा है परछाईं का अवलोकन
उठी हुई आंधी आकर के गई धूल से भर दो लोचन
हैं सपाट राहें, पांवों का चिह्न एक भी कहीं न दिखता
रही गज़ल हर बार अधूरी, दुविधा ग्रस्त ह्रदय क्या लिखता
संचित थे जो रंग तूलिका करती रही खर्च बिन चाहे
श्वेत-श्याम बस शेष तभी तो इन्द्रधनुष अब बन न पाया
बिछे हुए नयनों के आगे सीमाहीन अँधेरे आकर
लहर लहर उद्वेलित होता, सांसों का उथला रत्नाकर
टूटी हुई कमानी लेकर कितनी देर घड़ी चल पाये
आड़ी चौताली धड़कन पर कैसे कोई सुर सध पाये
सरगम के सातों सुर योंतो चिर परिचित से लगे सदा ही
नित्य बुलाया, कोई लेकिन आकर स्वर के साथ न गाया
सूखे अधरों पर आकर के एक नहीं लेकिन सज पाया
उगी भोर ने सन्नाटे के सुर में अपना राग सँवारा
दोपहरी ने उठा हुआ हर एक प्रश्न हर बार नकारा
संध्या बीती टूटी हुई आस्थाओं के टुकड़े चुनते
रातें व्यस्त रहीं सपनों के अवशेषों के धागे बुनते
जीवन की इस दौड़ धूप में, उठा पटक में उलझे सब पल
अब अंतिम भी विलय हो रहा,किन्तु न दीप एक जल पाया
जब भी मुड़ कर करना चाहा है परछाईं का अवलोकन
उठी हुई आंधी आकर के गई धूल से भर दो लोचन
हैं सपाट राहें, पांवों का चिह्न एक भी कहीं न दिखता
रही गज़ल हर बार अधूरी, दुविधा ग्रस्त ह्रदय क्या लिखता
संचित थे जो रंग तूलिका करती रही खर्च बिन चाहे
श्वेत-श्याम बस शेष तभी तो इन्द्रधनुष अब बन न पाया
बिछे हुए नयनों के आगे सीमाहीन अँधेरे आकर
लहर लहर उद्वेलित होता, सांसों का उथला रत्नाकर
टूटी हुई कमानी लेकर कितनी देर घड़ी चल पाये
आड़ी चौताली धड़कन पर कैसे कोई सुर सध पाये
सरगम के सातों सुर योंतो चिर परिचित से लगे सदा ही
नित्य बुलाया, कोई लेकिन आकर स्वर के साथ न गाया
बात बस इतनी सी थी
उठे प्रश्न अनगिन नयनों में,जबकि बात बस इतनी सी थी
मेरे होंठ गई थी छूकर,हवा चूमने अधर तुम्हारे
हुईं चकित जो नजरें सहसा,उनको यह था ज्ञात नहीं
मेरा और तुम्हारा नाता कल परसौं की बात नहीं
संस्कृतियों के आदिकाल से नवदिन के सोपानों तक
एक निमिष भी विलग अभी तक हुआ हमारा साथ नहीं
असमंजस उग आये हजारों,जबकि बात बस इतनी सी थी
मेरे पग के चिह्न वहीं पर बने,जहाँ थे कदम तुम्हारे
निशियों का तम ले सत्यापित करे समय संबंधों को
अपने हस्ताक्षर अंकित कर,पूनम के उजियारों पर
एक हमारी घुलती सांसों से गति पाकर बहे सदा
पुरबायें, अठखेली सी करती नदिया के धारों पर
उठे हजारों आंधी अंधड़,जबकि बात बस इतनी सी थी
धराशायी हो गयी दृष्टि पल भर थे चूमे नयन तुम्हारे
जो रह जाता दूर प्राप्ति की सीमा से,वह मात्र कल्पना
इसी भ्रान्ति में जीते हैं वे जो बस प्रश्न उठाया करते
पूर्ण समर्पण के भावों में मानस जिस पल ढल जाता है
सीमायें भी खींचा करतीं सीमा रेखा डरते डरते
सांझ सिंदूरी रह न पाई,जबकि बात बस इतनी सी थी
नयन सुरमई हुए स्वयं ही, द्वार आ गये सपन तुम्हारे
मेरे होंठ गई थी छूकर,हवा चूमने अधर तुम्हारे
हुईं चकित जो नजरें सहसा,उनको यह था ज्ञात नहीं
मेरा और तुम्हारा नाता कल परसौं की बात नहीं
संस्कृतियों के आदिकाल से नवदिन के सोपानों तक
एक निमिष भी विलग अभी तक हुआ हमारा साथ नहीं
असमंजस उग आये हजारों,जबकि बात बस इतनी सी थी
मेरे पग के चिह्न वहीं पर बने,जहाँ थे कदम तुम्हारे
निशियों का तम ले सत्यापित करे समय संबंधों को
अपने हस्ताक्षर अंकित कर,पूनम के उजियारों पर
एक हमारी घुलती सांसों से गति पाकर बहे सदा
पुरबायें, अठखेली सी करती नदिया के धारों पर
उठे हजारों आंधी अंधड़,जबकि बात बस इतनी सी थी
धराशायी हो गयी दृष्टि पल भर थे चूमे नयन तुम्हारे
जो रह जाता दूर प्राप्ति की सीमा से,वह मात्र कल्पना
इसी भ्रान्ति में जीते हैं वे जो बस प्रश्न उठाया करते
पूर्ण समर्पण के भावों में मानस जिस पल ढल जाता है
सीमायें भी खींचा करतीं सीमा रेखा डरते डरते
सांझ सिंदूरी रह न पाई,जबकि बात बस इतनी सी थी
नयन सुरमई हुए स्वयं ही, द्वार आ गये सपन तुम्हारे
सरगम की तलाश में कोई
उगी भोर से ढली सांझ तक आवारा मन भटका करता
सरगम की तलाश में कोई गीत नहीं पर गा पाता है
खुले हुए दालानों में आ कुर्सी पर थी हवा बैठती
अँगनाई में एक दरेंता दलता रहता था दालों को
छत पर बनते रहे कुरैरी, पापड़, टूटा करती बड़ियाँ
अलसाई दोपहरी आकर सुलझाती उलझे बालों को
लगता है अजनबी हो गया वह इक धुंधला चित्र ह्रदय का
किन्तु सुलगती शामों में वह गहरा गहरा हो जाता है
तिरते दॄश्य दीर्घाओं में नयनों की कुआ पूजन के
थिरक रहे कदमों का लेना फ़ेरे गिर्द चाक के अविरल
छत से लटके पलड़े पर से गिरी चाशनी बने बताशे
करघे का गायन रह रह कर करता हुआ रुई को कोमल
उन गलियों को जाने वाली राहें बीन ले गया अंधड़
आस उधर फिर भी जाने की मन ये छोड़ नहीं पाता है
गलियों के नुक्कड़ पर गाते ठन ठन पीतल,घन घन लोहा
हलवाई की भट्टी पर से आती खुशबू की बौछारें
रह रह पास बुलाती गूंजें मंदिर में होती आरति की
बन आशीषें बरसा करतीं दादी नानी की मनुहारें
इतिहासों में बंद हो गए पढी हुई पुस्तक के पन्ने
लेकिन झोंका एक हवा का,इन्हें सांझ छितरा जाता है
सरगम की तलाश में कोई गीत नहीं पर गा पाता है
खुले हुए दालानों में आ कुर्सी पर थी हवा बैठती
अँगनाई में एक दरेंता दलता रहता था दालों को
छत पर बनते रहे कुरैरी, पापड़, टूटा करती बड़ियाँ
अलसाई दोपहरी आकर सुलझाती उलझे बालों को
लगता है अजनबी हो गया वह इक धुंधला चित्र ह्रदय का
किन्तु सुलगती शामों में वह गहरा गहरा हो जाता है
तिरते दॄश्य दीर्घाओं में नयनों की कुआ पूजन के
थिरक रहे कदमों का लेना फ़ेरे गिर्द चाक के अविरल
छत से लटके पलड़े पर से गिरी चाशनी बने बताशे
करघे का गायन रह रह कर करता हुआ रुई को कोमल
उन गलियों को जाने वाली राहें बीन ले गया अंधड़
आस उधर फिर भी जाने की मन ये छोड़ नहीं पाता है
गलियों के नुक्कड़ पर गाते ठन ठन पीतल,घन घन लोहा
हलवाई की भट्टी पर से आती खुशबू की बौछारें
रह रह पास बुलाती गूंजें मंदिर में होती आरति की
बन आशीषें बरसा करतीं दादी नानी की मनुहारें
इतिहासों में बंद हो गए पढी हुई पुस्तक के पन्ने
लेकिन झोंका एक हवा का,इन्हें सांझ छितरा जाता है
धुन अविराम बजाता जाउँ
इससे पहले माना जाऊं मैं अपराधी चुप रहने का
तुमको अपने मन की बातें चलो आज बतलाता जाऊं
भावों का सावन शब्दों की गागरिया में भरा सहेजा
अश्रु स्रोत पर रखी सांत्वना स्वप्न पुष्प में सजा सजा कर
गंधों की झालरी हवा में बुनी एक मनमोहक सरगम
और निरंतर छेड़ा उसको अभिलाषा में बजा बजा कर
लेकिन अब तक मिली नहीं है एक अनूठी वही रागिनी
उतर आये उंगली पर जिसको मैं अविराम बजाता जाऊं
गज़लें आकर लहराई हैं सुबह शाम अधरों पर मेरे
कतओं ने नज्मों ने मन के द्वारे आकर दी है दस्तक
दोहे मुक्तक और सवैये लिए पालकी नवगीतों की
कविताओं का एक सिलसिला रहा होंठ से मेरे मन तक
लेकिन ऐसा एक गीत वह आकर संवरा नहीं स्वयं ही
जो अधरों का साथ न छोड़े और जिसे मैं गाता जाऊं
हाथों में आ कलम शब्द के चित्र नये कुछ रँग देती है
नये रंग में घोल भावना रच देती है एक कहानी
लिखते निंदिया के झुरमुट में उगते हुए स्वप्न के जुगनू
खिलती हुई उमंगों कहतीं सुधियों में फ़ैली वीरानी
लेकिन कोई एक कहानी पूरी नहीं कलम कर पाती
जिसको चौपालों पर जाकर मैं हर शाम सुनाता जाऊँ
कलाकार को रहा अपेक्षित कोई करे प्रशंसा उसकी
और बोध के निर्देशन से दिशा पूर्णता की दिखलाये
संशय की धुंधों में डूबी हुई मनस्थितियों में आकर
दिनकर की किरणों से खोले पट को औ’ प्रकाश छितराये
कभी योग्यता का भ्रम होता, तो आईना कह देता है
पहले पूण स्वयं को कर लूँ, फिर कमियां जतलाता जाऊँ
तुमको अपने मन की बातें चलो आज बतलाता जाऊं
भावों का सावन शब्दों की गागरिया में भरा सहेजा
अश्रु स्रोत पर रखी सांत्वना स्वप्न पुष्प में सजा सजा कर
गंधों की झालरी हवा में बुनी एक मनमोहक सरगम
और निरंतर छेड़ा उसको अभिलाषा में बजा बजा कर
लेकिन अब तक मिली नहीं है एक अनूठी वही रागिनी
उतर आये उंगली पर जिसको मैं अविराम बजाता जाऊं
गज़लें आकर लहराई हैं सुबह शाम अधरों पर मेरे
कतओं ने नज्मों ने मन के द्वारे आकर दी है दस्तक
दोहे मुक्तक और सवैये लिए पालकी नवगीतों की
कविताओं का एक सिलसिला रहा होंठ से मेरे मन तक
लेकिन ऐसा एक गीत वह आकर संवरा नहीं स्वयं ही
जो अधरों का साथ न छोड़े और जिसे मैं गाता जाऊं
हाथों में आ कलम शब्द के चित्र नये कुछ रँग देती है
नये रंग में घोल भावना रच देती है एक कहानी
लिखते निंदिया के झुरमुट में उगते हुए स्वप्न के जुगनू
खिलती हुई उमंगों कहतीं सुधियों में फ़ैली वीरानी
लेकिन कोई एक कहानी पूरी नहीं कलम कर पाती
जिसको चौपालों पर जाकर मैं हर शाम सुनाता जाऊँ
कलाकार को रहा अपेक्षित कोई करे प्रशंसा उसकी
और बोध के निर्देशन से दिशा पूर्णता की दिखलाये
संशय की धुंधों में डूबी हुई मनस्थितियों में आकर
दिनकर की किरणों से खोले पट को औ’ प्रकाश छितराये
कभी योग्यता का भ्रम होता, तो आईना कह देता है
पहले पूण स्वयं को कर लूँ, फिर कमियां जतलाता जाऊँ
एक वही है कविता मेरी
एक वही है मेरी कविता, मेरी कल्पना मेरी प्रेरणा
जिसके चित्र नयन के परदे पर आ प्रतिपल लहराते हैं
इन्द्रधनुष की परछाईं में उसको प्रथम बार देखा था
शरद पूर्णिमा की रंगत में गढ़ी हुई प्रतिमा चन्दन की
उसके अधरों के कंपन से जागे हुए सुरों को छूकर
प्राण पा गई ध्वनि, गूँजी बन मंत्र अर्चना में वंदन की
अनुरागी सुधियों के मेरे कोष राजसी में वह संचित
उसका पाकर स्पर्श रत्न भी और रत्नमय हो जाते हैं
बासन्ती चुम्बन से सिहरी हुई कली की निद्रित पलकें
जब खुलती हैं तब उसके ही चित्र संवरते हैं पाटल पर
गंधों की बांसुरिया बजती तान उसी के तन से लेकर
और नाम उसका ही मिलता लिखा बहारों के आँचल पर
शतरूपी वह रोम रोम में संचारित है निशा दिवस में
तार ज़िन्दगी की वीणा के, जिससे झंकारॆं पाते है
जिसके कुन्तल लहराते ही रँगीं अजन्तायें अनगिनती
गढ़ जाता खजुराहो पाकर नयनों का केवल इक इंगित
जुड़े हुए कर जिसके बनते एक गोपुरम पूजाघर का
जिसकी छवि से हो जाते हैं ताजमहल हर युग में शिल्पित
मनमोहन वह हुई प्रवाहित सदा लेखनी पर आ आकर
और शब्द उसके प्रभाव से स्वत: गीत बनते जाते हैं
जिसके चित्र नयन के परदे पर आ प्रतिपल लहराते हैं
इन्द्रधनुष की परछाईं में उसको प्रथम बार देखा था
शरद पूर्णिमा की रंगत में गढ़ी हुई प्रतिमा चन्दन की
उसके अधरों के कंपन से जागे हुए सुरों को छूकर
प्राण पा गई ध्वनि, गूँजी बन मंत्र अर्चना में वंदन की
अनुरागी सुधियों के मेरे कोष राजसी में वह संचित
उसका पाकर स्पर्श रत्न भी और रत्नमय हो जाते हैं
बासन्ती चुम्बन से सिहरी हुई कली की निद्रित पलकें
जब खुलती हैं तब उसके ही चित्र संवरते हैं पाटल पर
गंधों की बांसुरिया बजती तान उसी के तन से लेकर
और नाम उसका ही मिलता लिखा बहारों के आँचल पर
शतरूपी वह रोम रोम में संचारित है निशा दिवस में
तार ज़िन्दगी की वीणा के, जिससे झंकारॆं पाते है
जिसके कुन्तल लहराते ही रँगीं अजन्तायें अनगिनती
गढ़ जाता खजुराहो पाकर नयनों का केवल इक इंगित
जुड़े हुए कर जिसके बनते एक गोपुरम पूजाघर का
जिसकी छवि से हो जाते हैं ताजमहल हर युग में शिल्पित
मनमोहन वह हुई प्रवाहित सदा लेखनी पर आ आकर
और शब्द उसके प्रभाव से स्वत: गीत बनते जाते हैं
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नव वर्ष २०२४
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