प्रीत का आराध्य देखो आ गया है द्वार चल कर

ओस की बून्दें अचानक शबनमी कुछ और हो लीं
जाग कर हर इक कली ने मुस्कुराकर आँख खोली
वॄक्ष पर पत्ते हुए पुरबाईयों के साथ नर्तित
फागुनी मौसम हुआ है, झूम कर मल्हार बोली

दो विदाई आज विरहा के अतिथि को तुम ह्रदय से
प्रीत का आराध्य देखो आ गया है द्वार चल कर

स्वप्न के मोती चुने थे रात में हर यामिनी ने
बैठ कर जागी हुई आकाशगंगा के किनारे
साधना के दीप की लौ बन रहे थे प्रज्ज्वलित हो
नैन की बीनाईयों में आस के जलते सितारे
आहटों की कामना में कान की सूनी प्रतीक्षा
पल्लवित थी हो रही हर एक होते द्रवित पल में
अर्चना की थी बड़ी होती अपेक्षायें निरन्तर
कोई कंकर आ गिरे मन झील के इस शांत जल में

शुक्ल पक्षी हो गया बैसाख का, सामीप्य का पल
लग गया बहने खड़ा एकाकियत की शैल गल कर

सावनों के सोम से ले निर्जला एकादशी तक
के व्रतों के सब मनोरथ लग गए हैं पूर्ण होने
संशयों के जो कुहासे थे खड़े बदरंग होकर
धूप का पा स्पर्श अपना लग गए अस्तित्व खोने
कोटरों में जा छुपी थीं जो कपोतों सी उमंगें
हो रहीं स्वच्छंद भरने लग रहीं नभ में उडानें
दूर तक फैले मरुस्थल, बांस के वन हो गए हैं
घोलते बहती हवा में बांसुरी की मुग्ध तानें

शाख से कैलेंडरों की झर रहे दिनमान सूखे
हो गए रंगीन फिर से, वेशभूषाएं बदल कर

सांझ तुलसी पर उषा में था जलहरी पर चढ़ाया
एक आंजुर नीर शिव के केश की धारा बना है
सूत बाँधा शाख पर जो एक वट की, कुमकुमी कर
वह सँवर आकाश के तारों जड़ा मंडप तना है
अर्चना के मंत्र मिल कर प्रार्थना की वाणियों में
बन गये हैं सुर मनोहर गूँजती शहनाईयों के
हो गई अलकापुरी की वीथियों सी हर डगर अब
पारिजातों के गले लग कर चली पुरबाईयों से

छँट गये असमंजसों के घिर रहे थे जो कुहासे
प्रश्न लाये हैं स्वयं को आज अपने आप हल कर

4 comments:

Shar said...

:) :)

प्रवीण पाण्डेय said...

मधुरता का अनुभव तो पढ़ने से ही हो जाता है।

Shardula said...
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रंजना said...

एक तो आपकी कविता और उसपर शार्दूला जी की टिप्पणी .....अब हम क्या कहें......

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