तुम्हें देख मधुपों का गुंजन

तुम्हें देख बज उठे बांसुरी, और गूँजता है इकतारा
फुलवारी में तुम्हें देख कर होता मधुपों का गुंजन

हुई भोर आरुणी तुम्हारे चेहरे से पा कर अरुणाई
अधरों की खिलखिलाहटों से खिली धूप ने रंगी दुपहरी
संध्या हुई सुरमई छूकर नयनों की कजरारी रेखा
रंगत पा चिकुरों से रंगत हुई निशा की कुछ औ; गहरी

सॄष्टि प्रलय पलकों में, बन्दी समय तुम्हारी चितवन में
चुनरी से बँध साथ तुम्हारे चलते हैं भादों सावन

तुम चलती हो तो पग छूकर पथ ओढ़ा करते रांगोली
उड़ी धूल चन्दन हो जाती महकाती है बही हवायें
परछाईम को छू ढल जाते शिलाखंड खुद ही प्रतिमा में
और रूप धर आ जाती हैं भोजपत्र पर लिखी कथायें

तुम से पाकर रूप देवकन्यायें होती रह्ती गर्वित
तुम ही एक अप्सरायें करती हैं जिसका आराधन

रति-पति धनुष गगन में सँवरे जब तुम लेती हो अँगड़ाइ
दॄष्टि परस पाने को आतुर, पंक्ति बना हौं खड़े सितारे
प्राची और प्रतीची के क्षितिजों पर बिखराई जो रंगत
अपना अर्थ नया पाने को सुबह शाम बस तुम्हें निहारे

कलियों का खिलना हो या हो मस्ती भरे हवा के झोंके
पाते हैं गति तुमसे रहता मात्र तुम्हारा अनुशासन

छू करमेंहदी और अलक्तको हुई कल्पनाशील तूलिका
गिरि शॄंगों पर और वादियों में लग गई अजन्ता रँगने
जिन पत्रों को दृष्टि तुम्हारी निमिष मात्र को छू कर आई
उन पर नृत्य किया करते हैं सदा बहारों के ही सपने

अंकित महाकाव्य की भाषा, परिभाषा जीवन की पूरी
तेरे नयनों में देखा करता है जग अपना आनन

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सच में, महाकाव्य की प्रस्तावना रच दें ऐसे नयन।

शिवम् मिश्रा said...

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंगलवार 31 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

http://charchamanch.blogspot.com/

Shardula said...
This comment has been removed by the author.

सूर्य फिर करने लगा है

रंग अरुणाई हुआ है सुरमये प्राची क्षितिज का रोशनी की दस्तकें सुन रात के डूबे सितारे राह ने भेजा निमंत्रण इक नई मंज़िल बनाकर नीड तत्प...