जीवन के इस संधि पत्र

जीवन के इस संधि पत्र पर,सांसों ने धड़कन से मिलकर
जो हस्ताक्षर किये हुए थे, वे धुंधले हो गये अचानक

नयनों की चौकी पर खींची गईं विराम की रेखायें थीं
समझौता था नहीं अतिक्रमण अश्रु-सैनिकों का अब होगा
मन की सीमाओं पर यादें कभी नहीं घुसपैठ करेंगीं
गुप्तचरी से कोई सपना आंखों में दाखिल न होगा

किन्तु न जाने किस ने करके उल्लंघन तोड़ी हैं शर्तें
नये ढंग से लिखा जा रहा इस विराम का आज कथानक

शान्ति-वार्ता के सारे ही आमंत्रण रह गये निरुत्तर
" पता नहीं मालूम" लिये है लौटा पत्र निमंत्रण वाला
किये फोन तो पता चला है नम्बर यह विच्छेद हो गया
रिश्तेदारों के दरवाजे पर लटका था भारी ताला

किसको भेजें इक विरोध का पत्र यही असमंजस भारी
सन्धि पत्र की धाराओं का जिसने लिखा हुआ है मानक

सौगन्धों की रक्षा परिषद ने सारे सम्बन्ध नकारे
शीत युद्ध में लीन मिले सब, सूखे फूल किताबों वाले
इतिहासों की गाथाओं ने चक्रव्यूह ही रचे निरन्तर
हुए समन्वय वाले सारे स्वर बिल्कुल आड़े-चौताले

उत्तरीय फिर से अनुबन्धन का कोई आ लहरा जाये
दीप्तिमान करता आशा को संध्या भोर निशा यह स्थानक

आठों याम अड़ी रहती है मन की कोई भावना हठ पर
और नियंत्रण बिन्दु कहां हो ? नहीं चेतना सहमति देती
सुधियाम तो बहाव की उंगली पकड़े चाह रही हैं चलना
पर यथार्थ की चली हवायें नौका को उल्टा ही खेतीं

पाठ शाम्ति के पढ़ा सके जो आज पुन: जीवन में आकर
आस बालती दीपक आये पार्थसारथि, गौतम, नानक

है माता अभिनन्दन तेरा

सभी माताओं को सादर नमन सहित मातॄ-दिवस २००८ पर
काव्य-पुष्पांजलि :-



शब्द ने शीश अपना झुका कर कहा, मैं हूँ अक्षम मुझे माफ़ कर दीजिये
जो है भाषा स्वयं, अक्षरा है स्वयं मेरी क्षमता कहाँ कुछ उसे कह सकूँ
भावना की वही एक प्रतिमूर्ति है, वो ही ममता है, करुणा है, है वो दया
कामना है यही उसके आशीश के एक कण का हूँ मैं पात्र, ये कह सकूँ


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धड़्कन धड़कन पल पल करती कोटि कोटि माँ वन्दन तेरा
साँस साँस में सुरभित मेरी, है माता अभिनन्दन तेरा

ज्ञान नहीं है, बुद्धि नहीं है जो तुझको वर्णित कर पाये
शब्दों ने क्षमता कब पाई तुझको संबोधित कर पाये
तू अनन्त है फिर भी केवल एक नाम में रहे समाहित
किन्तु असम्भव गीत एक भी तेरी महिमा को गा पाये

जीवन को महकाता है बस आशीषों का चन्दन तेर
माता है अभिनन्दन तेरा

तेरे आँचल के साये ने ज्ञान दिया है गौतम वाला
तूने ही कानों में घोला पहला मंत्र आस्था वाला
शब्द अधर को तूने सौंपे, बोईं कंठ सुरों की फ़सलें
जीवन ने तेरे ही कारण जीवन का है होश संभाला

उॠण न होगा कभी एक पल, मेरे उर का स्पंदन, तेरा
है माता अभिनन्दन तेरा

भोर निशा तुझको आराधूँ, मात्र एक दिन नहीं बरस में
नित्य शांति पाई है अविरल, तेरे कोमल एक परस में
देववन्दिता, सुर-मुनि पूजित,आद्य शक्ति तू सॄष्टा जग की
निराकार,साकार,चराचर, सब कुछ तेरे एक दरस में

मेरे पास न मेरा कुछ भी, जो भी है तन मन धन, तेरा
माता है अभिनन्दन तेरा.


राकेश खंडेलवाल
मातॄ-दिवस २००८

सांस की शाखाओं पर बैठा

सांस की शाखाओं पर बैठा हुआ यह वक्त का पाखी परों को तोलता है
और भी उलझा रहा, हर एक गुत्थी धड़कनों की लग रहा जो खोलता है

हाथ पर रख हाथ बैठा रह गया है हाथ का कंगन बिचारा
चल दिया उंगली छुड़ाकर, जो उसे झंकार दे ता वह सहारा
पैंजनी हतप्रभ न कुछ भी कह सकी है मौन होकर रह गई है
और टीके की चमक,धाराओं में बन कर किरण इक बह गई है

ठेस से पीड़ित कुंआरी साध का मन एक पत्ते के सरीखा डोलता है
एक है विश्वास जो आ फिर नये संकल्प के कुछ मंत्र मन में घोलता है

स्वप्न की किरचें उठा कर ताक पर रखते हुए उंगली छिली है
पोटली जो है फ़टी, वह प्रश्न करती, आज क्या भिक्षा मिली है
पांव कँपते हैं, हवा में अलगनी पर एक लटके वस्त्र जैसे
और राहें पूछती हैं, तय करोगे सामने लंबा बिछा यह पंथ कैसे

मंदिरों की घंटियों का शोर कुछ कहता नहींलगता मगर कुछ बोलता है
और नत जो हो चुका है शीश फिर उठता नहीं है झोलता है

स्वर्ण पारस के परस का, पतझरी बन रोष है बिखरा हवा में
और शाखों का सिरा हर एक नभ की ओर उठाता है दुआ में
छटपटाती आस फिर असमंजसों के दायरे में कैद हो कर रह गई है
तोड़ कर हर बाँध संयम का बनाया, एक नदिया बह गई है

आस्था के हर उमड़ते ज्वार को तट पर खड़ा नाविक ह्रदय फिर मोलता है
सांस की शाखाओं पर बैठा हुअ यह वक्त का पाखी परों को तोलता है

केवल एक दुपहरी से थोड़ी सी अनबन है

संध्या बतियाती रजनी भी भोर तलक मुझसे
केवल एक दुपहरी से थोड़ी सी अनबन है
ओढ़े धूप, फिरा मुँह बैठी रहती नीम तले
मेरा भी अब सिर्फ़ अकेले रहने का मन है


कहने को हम हुए अकेले लेकिन कब होते
संबन्धों के जालों से कब मिलता छुटकारा
अनुबन्धों की धारायें, मन सराबोर करतीं
संकल्पों को तथाकथित सूनापन उच्चारा
वैचारिक वैतरणी में मन नौका सा डोले
स्वप्न पालकी पलकों पर आ खाती हिचकोले
सुर के बिना गूँजता मन में संध्या भोर रहा
एकाकी होने का जो भ्रम था हर बार ढहा

रह रह कर खनका करती है आँगन में आकर
स्वप्न परी की पायलिया की कोमल रुनझन है
मेरा भी कुछ देर अकेले रहने का मन है

कितना चाहा है एकाकीपन पर नहीं मिला
यादों का मौसम रहता है सदा मुझे घेरे
बादल से किरणों की होती पले पल अठखेली
चित्र बनाती रहती आकर नयन क्षितिज मेरे
घुली हवा के झोंको में सौगंधें आ आकर
फिर से जीवित कर देती हैं बीते पल कल के
बिखरे हुए प्रेमपत्रों से उमड़ उमड़ अक्षर
सुधि के प्याले में मदिरा से बार बार छलके

सारंगी पर मनुहारों को छेड़ा करता है
जेठ मास में आकर बैठा लगता सावन है
इसीलिये कुछ देर अकेले रहने का मन है

मित्र न तुमने भी तो मेरा साथ कभी छोड़ा
छाया बन कर साथ चले तुम कदम कदम मेरे
सुख की घटा गमों की बदली जब जब भी छाई
एक तुम्हारा संबल मुझको सदा रहा घेरे
पग पग पर ठोकर खा खाकर गिरे और संभले
नहीं एक पल को भी मेरा यह रिश्ता टूटा
मन में अभिलाषा अँगड़ाई लेते हुए थकी
किन्तु डोर से साथ उंगलियों का पल न छूटा

चाहत तुमसे विलग एक अनुभव का स्पर्श मिले
मन के यज्ञकुंड में आकर सुलगा चंदन है
मेरा अब कुछ देर अकेले रहने का मन है

मौन मन के भाव सारे

लेखनी गुम सुम हुए हैं मौन मन के भाव सारे
सिर्फ़ सूनापन मुझे जो छोड़ कर जाता नहीं है

जानता हूँ लौट आयेंगी भटक कर अब निगाहें
और स्वर वह एक आयेगा नहीं उड़ कर हवा में
पंथ सुनने को तरसते ही रहेंगे चाप पग की
शेष स्मॄति में नाम होगा, भोर में संध्या निशा में

ज़िन्दगी का सत्य कटु है, जानत हूँ किन्तु पागल
है हठी मन, जो इसे स्वीकार कर पाता नहीं है

भोर में किरणें वही इक चित्र रँग देती क्षितिज पर
और कागज़ पर वही इक नाम रह रह कर उभरता
एक यह अहसास कोई हाथ काँधे पर रखे है
और बैठा सामने है मुस्कुराता बात करता

है विदित अनुभूति है यह सिर्फ़ मेरी कल्पना की
किन्तु छाई धुंध को मन काट यह पाता नहीं है

शब्द बेमानी लगा अब अर्थ सारे खो चुके हैं
रुद्ध स्वर आकर अधर पर थरथरात कापता है
चेतना दोहरा रही है ज्ञान गीता का निरन्तर
भाव में लिपटा हुअ कोमल ह्रदय कब मानता है

ज्ञात मुझको बात मन की हो प्रकाशित, है असंभव
और मुखरित गीत भी अब कोई हो पाता नहीं है

स्वर अधर की गली से परे

भावना के पखेरू बिना पंख के एक परवाज़ को फ़ड़फ़ड़ाते रहे
बाढ़ की ढेर संभावनायें लिये आये घन, श्याम नभ को बनाते रहे
अक्षरों से बढ़ीं शब्द की दूरियाँ, स्वर अधर की गली से परे रह गया
गीत जो कल हमारे लगे थे गले, आज नजरों को वो ही चुराते रहे

मौन लेखन ओढ़ता है

मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से
लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है

काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे
युद्ध तो थमता नहीं है एक पल, संध्या सकारे
चक्रवर्ती योद्धा के सामने होकर निहत्थे
हम समर्पण कर रहे हैं सारथी के ले सहारे

कर्म तो कर्तव्य है, अधिकार फल पर क्यों नहीं है
एक बस यह ख्याल आ रह रह ह्रदय झकझोरता है

हर दिशा ने तीर को संधान कर बाँधा निशाना
ढाल का परिचय रहा है हाथ से बिलकुल अजाना
अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित, द्वन्द को तत्पर खड़ा वह
आज तक सीखा नहीं है एक पग पीछे हटाना

नीर देकर हाथ में संकल्प जो करवा रहा है
एक वो ही है सभी निश्चय हमारे तोड़ता है

शान्त हो बैठी रही है गूँज जब मणिपुष्पकों की
व्यक्ति होता है परीक्षित और जय बस तक्षकों की
देवदत्तों ने लिखी है सन्धि की गाथायें केवल
टोलियाँ करती दिखी हैं जब पलायन, रक्षकों की

उस घड़ी जो आस्था की बून्द घुट्टी में मिली थी
का भरम विश्वास का आधार हर इक तोड़ता है

जीवन के इस रंगमंच पर

कितने तो अभिनीत हो गये,कितने अब भी अंक बकाये
जीवन के इस रंगमंच पर, निर्देशक क्या क्या दिखलाये

कभी एक किरदार दिखाता, कभी भूमिकायें बदली हैं
कभी धूप वाले रंगों में बो देता काली बदली है
कहां अवनिका पतन करेगा, कब हो पटाक्षेप दॄश्यों पर
क्या है सत्य,गल्प भी क्या है, क्या कॄत्रिम है क्या असली है

मुट्ठी में है लिये राग के आरोहों को अवरोहों को
न जाने किस सरगम को वो किस साजिन्दे से बजवाये

कभी दर्शकों में से चुन लेता है मुख्य मुख्य अभिनेता
कभी प्राथमिकता देता है फिर नेपथ्यों में रख देता
कभी मिलन की बांसुरिया को कर देता है रुदन विरह का
कभी डालता है भ्रम में तो कभी दिशायें नूतन देता

कथा,पटकथा या मध्यांतर सब पर पूर्ण नियंत्रण उसका
कलम उसी की.भाव उसी के कब जाने क्या क्या लिख जाये

अपने अपने पात्र निभाते रहना है सबकी मज़बूरी
किसे विदित सज्जा कक्षों से कितनी रही मंच की दूरी
किस चरित्र को किस सांचे में ढलना है ये वही जानता
किस को खारिज कर देना है, किसको दे देनी मंजूरी

शतरंजी इस रंगमंच पर शातिर बड़ा खिलाड़ी है वो
प्यादों को करता वज़ीर है, वह ही शाहों को पिटवाये

उत्तर गुमनाम रहे

एक प्रश्न जो ढलती निशा उछाल गई
उत्तर उसका ढूँढ़ सुबह से शाम रहे

थकन पंथ के अंतिम कदमों की, या हो
उगी भोर की अंगड़ाई में क्या अंतर
संकल्पों की भरी आंजुरी में संशय
या हो आहुतियों से रही आँजुरि भर
एक अकेला तारा नभ में उगा प्रथम
याकि आखिरी तारा, गगन अकेला हो
दॄष्टि साधना, प्रथम मिलन की आस लिये
दॄष्टि मिले जब घिरे विदा की बेला हो

हैं समान पल, लेकिन अर्थ विलग क्यों हैं
प्रश्न चिन्ह यह आकर उंगली थाम रहे

प्रश्नों के व्यूहों में उत्तर घिरे हुए
जाने कैसे स्वयं प्रश्न बन जाते हैं
उतनी और उलझती जाती है गुत्थी
जितना ज्यादा हम इसको सुलझाते हैं
सर्पीली हों पगडंडी, या हों कुन्तल
भूलभुलैय्या राह कहाँ बन पाती है
हो आषाढ़ी या हो चाहे सावन की
एक अकेली बदली क्या क्या गाती है

अपनी आंखों के दर्पण में छाया को
हम तलाशते हर पल आठों याम रहे

कोई अटका रहा वॄत्त में, व्यासों में
कोई उलझा बिन्दु परिधि के पर जाकर
कोई अर्धव्यास में सिमटा रहा सदा
कोई था समकोण बनाये रेखा पर
हम थे त्रिभुजी, किन्तु आयतों में उलझे
कोई जिनमें नहीं रहा सम-अंतर पर
सारे जोड़ गुणा बाकी के नियम थके
जीवन का इक समीकरण न सुलझा पर

अंकगणित से ज्यामितियों के बीच रहा
बीजगणित,जिसके उत्तर गुमनाम रहे

तुमको पत्र लिकूँ

बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

लिखूँ यहाँ मैं स्वस्थ और सानन्द मित्र रहता हूँ
आशा करता हूँ तुम सब भी कुशल क्षेम से होगे
मनभावन ॠतुओं का मेला होगा घर आंगन में
सराबोर तुम सम्बन्धों के मधुर प्रेम से होगे

कीर्ति पुष्प की फुलवारी होगी सर्वत्र लिखूँ

लिखूँ शांति के पंछी उड़ते हर पल यहां गगन पर
चन्द्र कलाऒं जैसा पल पल बढ़ता भाई चारा
राम और गौतम के बन कर रहते सब अनुयायी
स्नेह-सुधा से सिक्त यहां हर गली गांव चौबारा

आज हुए अनुकूल सभी, हम पर नक्षत्र लिखूँ

लिखूँ विक्रमादित्य अनुसरण करते सत्ताधारी
न्यायपालिका जहाँगीर के पदचिन्हों पर चलती
दीपक के आवाहन पर सूरज चल कर आता है
प्रतिनिधि से जनता की दूरी, पल पल यहाँ सिमटती

नई लिये उपलब्धि, शुरू होता नव सत्र लिखूँ

किन्तु न लिखती कलम, आंख ने जो देखे हैं सपने
और दॄश्य को शब्द न देती है कोई भी लिखकर
शायद आने वाला कोई कल सच ही सच लिख दे
और न युग का सपना कोई सपना ही हो सत्वर

तना शीश पर रहे सभी के यश का छत्र लिखूं

बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...