तुमको पत्र लिकूँ

बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

लिखूँ यहाँ मैं स्वस्थ और सानन्द मित्र रहता हूँ
आशा करता हूँ तुम सब भी कुशल क्षेम से होगे
मनभावन ॠतुओं का मेला होगा घर आंगन में
सराबोर तुम सम्बन्धों के मधुर प्रेम से होगे

कीर्ति पुष्प की फुलवारी होगी सर्वत्र लिखूँ

लिखूँ शांति के पंछी उड़ते हर पल यहां गगन पर
चन्द्र कलाऒं जैसा पल पल बढ़ता भाई चारा
राम और गौतम के बन कर रहते सब अनुयायी
स्नेह-सुधा से सिक्त यहां हर गली गांव चौबारा

आज हुए अनुकूल सभी, हम पर नक्षत्र लिखूँ

लिखूँ विक्रमादित्य अनुसरण करते सत्ताधारी
न्यायपालिका जहाँगीर के पदचिन्हों पर चलती
दीपक के आवाहन पर सूरज चल कर आता है
प्रतिनिधि से जनता की दूरी, पल पल यहाँ सिमटती

नई लिये उपलब्धि, शुरू होता नव सत्र लिखूँ

किन्तु न लिखती कलम, आंख ने जो देखे हैं सपने
और दॄश्य को शब्द न देती है कोई भी लिखकर
शायद आने वाला कोई कल सच ही सच लिख दे
और न युग का सपना कोई सपना ही हो सत्वर

तना शीश पर रहे सभी के यश का छत्र लिखूं

बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

राकेश भाई
बहुत खूब. एक एक शब्द बार बार पढने योग्य है.विलक्षण रचना.
नीरज

Parul said...

बहुत सुंदर भाव--नीरज जी,आप सही कह रहे हैं कितनी बार तो मै ही दोहरा चुकी हूँ - आभार रकेश जी

रंजू said...

शायद आने वाला कोई कल सच ही सच लिख दे
और न युग का सपना कोई सपना ही हो सत्वर


तना शीश पर रहे सभी के यश का छत्र लिखूं
बहुत दिनों से सोच रहा हूँ तुमको पत्र लिखूँ

राकेश जी बहुत सही और दिल के करीब लगी आपकी यह पंक्तियाँ... बेहद खूबसूरत रचना है !!

कंचन सिंह चौहान said...

शायद आने वाला कोई कल सच ही सच लिख दे
और न युग का सपना कोई सपना ही हो सत्वर

hamesha ki bha.nti sunder

mamta said...

सुन्दर शब्द और बहुत ही सुन्दर रचना।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...