रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की

प्रीत का गीत बन गुनगुनाने लगा, शब्द ने छू लिये आपके जो अधर
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर
कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई
पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.

7 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा.

Parul said...

SARAS...SUNDAR

अभिषेक ओझा said...

sundar !

अतुल said...

बहुत बढिया.

अमिताभ फौजदार said...

very nice sir !!

कंचन सिंह चौहान said...

waah

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...