काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं
छंद आकर स्वयं ही संवरते गये
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की
प्रीत का गीत बन गुनगुनाने लगा, शब्द ने छू लिये आपके जो अधर रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.
7 comments:
बहुत खूब!
बहुत उम्दा.
SARAS...SUNDAR
sundar !
बहुत बढिया.
very nice sir !!
waah
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