प्रीत का गीत बन गुनगुनाने लगा, शब्द ने छू लिये आपके जो अधर
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर
कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई
पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.
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नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
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मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे युद्ध तो थमता ...
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जाते जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया ...
7 comments:
बहुत खूब!
बहुत उम्दा.
SARAS...SUNDAR
sundar !
बहुत बढिया.
very nice sir !!
waah
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