आंधी चीखे, बादल गरजे, कदम कदम पर बढ़ें अंधेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे
यह संकल्प लिया जब हमने अनुष्ठान हमको करना है
तो आड़े आने वाली बाधाओं से फिर क्यों डरना है
मंत्रों के स्वर हमने साधे जिनमें वह अपना ही स्वर है
जो मंतवय हमारा है वह बाकी पूजा से ऊपर है
साक्षी समय, तपस्याओं में आते हैं अवरोध घनेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे
पंथ सही हो, स्वयं लक्ष्य फिर चल कर राही तक आता है
ताल सही हो तो फिर सुर भी स्वत: उमड़ता है गाता है
भ्रम के जालों को किरणों की कैंची सदा छाँट देती है
असमंजस का कोई भी पल ज्यादा देर न रुक पाता है
एक दीप की लौ बोती है, रोज निशा में नये सवेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे
ओ हमराही उठो और नव संकल्पों से आंजुर भर लो
जो कर चुके समर्पण, उनके स्वर को भी अपना स्वर कर लो
देनी है आवाज़, क्षितिज के पार छुपे सूरज को तुमने
थक कर पथ में नहीं रुकोगे,चलो आज यह नूतन प्रण लो
साथ तुम्हारा रहे, कूचियां मेरे भी कुछ चित्र उकेरे
कलम वही जो हर मौसम में, बस शब्दों के फूल बिखेरे
उनकी मात नहीं होती है
कोई साथ नहीं चलने को, लेकिन जब संकल्प लिया है
थक कर कहीं बैठ जाना तो अच्छी बात नहीं होती है
हाँ मीलों के पत्थर अक्सर ही उपहास उड़ाया करते
कभी कभी संशय होता है क्यों आगे को यह पग बढ़ते
लेकिन गति तो चेतनता है, उससे कहां विलग होना है
छलना के पल आ राहों को सही दिशा से वंचित करते
लेकिन शाह जिन्होंने तोड़ी हैं चौखानों की सीमायें
शह लगती हों चाहे जितनी, उनकी मात नहीं होती है
दो मुट्ठी में, दो पाथेय सजा कर चलना तो अच्छा है
और किया जो निश्चय वह भी, अनुमोदन करता सच्चाहै
पर यह पथ है बिना नीड़ के, चलते रहें अनवरत निश्चित
तो दो पल थम जाने का निर्णय भी हो जाता कच्चा है
मैं भी दीप जला कर पथ में इसीलिये हूँ साथ तुम्हारे
जिसकी सुबह नहीं हो कोई ऐसी रात नहीं होती है.
ओ राही ! पथ की विस्तॄतता देती है तुमको आवाज़ें
अंबर का आँगन आमंत्रित करता उठ कर लो परवाज़ें
रामचरितमानस ही रचकर रुकती कहाँ कलम तुलसी की
उतनी चमक और बढ़ती है जितना ज्यादा इसको माँजें
अवरोधों की झंझाओं से, बुझती नहीं ज्योति निश्चय की
यह वड़ की जड़ है, पतझड़ का सूखा पात नहीं होती है
थक कर कहीं बैठ जाना तो अच्छी बात नहीं होती है
हाँ मीलों के पत्थर अक्सर ही उपहास उड़ाया करते
कभी कभी संशय होता है क्यों आगे को यह पग बढ़ते
लेकिन गति तो चेतनता है, उससे कहां विलग होना है
छलना के पल आ राहों को सही दिशा से वंचित करते
लेकिन शाह जिन्होंने तोड़ी हैं चौखानों की सीमायें
शह लगती हों चाहे जितनी, उनकी मात नहीं होती है
दो मुट्ठी में, दो पाथेय सजा कर चलना तो अच्छा है
और किया जो निश्चय वह भी, अनुमोदन करता सच्चाहै
पर यह पथ है बिना नीड़ के, चलते रहें अनवरत निश्चित
तो दो पल थम जाने का निर्णय भी हो जाता कच्चा है
मैं भी दीप जला कर पथ में इसीलिये हूँ साथ तुम्हारे
जिसकी सुबह नहीं हो कोई ऐसी रात नहीं होती है.
ओ राही ! पथ की विस्तॄतता देती है तुमको आवाज़ें
अंबर का आँगन आमंत्रित करता उठ कर लो परवाज़ें
रामचरितमानस ही रचकर रुकती कहाँ कलम तुलसी की
उतनी चमक और बढ़ती है जितना ज्यादा इसको माँजें
अवरोधों की झंझाओं से, बुझती नहीं ज्योति निश्चय की
यह वड़ की जड़ है, पतझड़ का सूखा पात नहीं होती है
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की
प्रीत का गीत बन गुनगुनाने लगा, शब्द ने छू लिये आपके जो अधर
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर
कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई
पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर
कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई
पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.
गीत करके लिखूँ
चाँदनी, फूल की गंध, पुरबाईयाँ; सोचता मैं रहा, प्रीत करके लिखूँ
पैंजनी और लहरों की अँगड़ाईयाँ, बांसुरी का मैं संगीत करके लिखूँ
रूक गई पर कलम आपके नाम पर, पॄष्ठ पर मैने प्रारंभ में जो लिखा
आपके नाम में सब समाहित हुआ,शेष क्या? फिर जिसे गीत करके लिखूँ
पैंजनी और लहरों की अँगड़ाईयाँ, बांसुरी का मैं संगीत करके लिखूँ
रूक गई पर कलम आपके नाम पर, पॄष्ठ पर मैने प्रारंभ में जो लिखा
आपके नाम में सब समाहित हुआ,शेष क्या? फिर जिसे गीत करके लिखूँ
अनुभूतियां शब्द बनने लगीं
आँख की वादियों में फ़िसल कह गये
बात मन की, दो आँसू लरजते हुए
शब्द थे लड़खड़ाते हुए रह गये
होठ की पपड़ियों पर अटकते हुए
साथ, तय कर लिया सुर ने देना नहीं
इसलिये गूँज पाई नहीं सिसकियां
कुछ लगा है गले में रुका रह गया
फिर भी आ न सकीं एक दो हिचकियां
जो न चाहा कहें, वो उजागर हुआ
सारी अनुभूतियां शब्द बनने लगीं
मन की संदूकची में रखे थे हुए
भाव सहसा निकल इस तरह से बहे
कोई भाषा की उंगली को पकड़े बिना
बोल बिन, थरथराते अधर ने कहे
एक पल में समाहित सभी कुछ हुआ
नभ का विस्तार, सारी चराचर धरा
एक ही अर्थ में सब निहित हो गया
शून्य की मुट्ठियाँ, थाल मोती भरा
स्वप्न सी आँख में पल रही हर घड़ी
आज बीता हुआ वक्त बनने लगी
पंथ में जो उठे थे कदम वे सभी
लौट कर भोर की आये दहलीज पर
नीड़ पाथेय की पोटली को उठा
ले गया था सहज आँख को मींच कर
राह थक सो गयी ओढ़ कर चादरें
और गंतव्य ने अर्थ बदले सभी
जो अभी है, नहीं वो कभी था हुआ
और शायद न हो पाये आगे कभी
भोर, आते हुए सूर्य से हो विमुख
सांझ बनती हुई आज ढलने लगी
बात मन की, दो आँसू लरजते हुए
शब्द थे लड़खड़ाते हुए रह गये
होठ की पपड़ियों पर अटकते हुए
साथ, तय कर लिया सुर ने देना नहीं
इसलिये गूँज पाई नहीं सिसकियां
कुछ लगा है गले में रुका रह गया
फिर भी आ न सकीं एक दो हिचकियां
जो न चाहा कहें, वो उजागर हुआ
सारी अनुभूतियां शब्द बनने लगीं
मन की संदूकची में रखे थे हुए
भाव सहसा निकल इस तरह से बहे
कोई भाषा की उंगली को पकड़े बिना
बोल बिन, थरथराते अधर ने कहे
एक पल में समाहित सभी कुछ हुआ
नभ का विस्तार, सारी चराचर धरा
एक ही अर्थ में सब निहित हो गया
शून्य की मुट्ठियाँ, थाल मोती भरा
स्वप्न सी आँख में पल रही हर घड़ी
आज बीता हुआ वक्त बनने लगी
पंथ में जो उठे थे कदम वे सभी
लौट कर भोर की आये दहलीज पर
नीड़ पाथेय की पोटली को उठा
ले गया था सहज आँख को मींच कर
राह थक सो गयी ओढ़ कर चादरें
और गंतव्य ने अर्थ बदले सभी
जो अभी है, नहीं वो कभी था हुआ
और शायद न हो पाये आगे कभी
भोर, आते हुए सूर्य से हो विमुख
सांझ बनती हुई आज ढलने लगी
ज़िन्दगी मोम बन कर पिघलती रही
पास रह न सकी बून्द भर रोशनी
ज़िन्दगी मोम बन कर पिघलती रही
दिन उगा पर झपकते पलक ढल गया
रात को नींद आकर चुरा ले गई
दोपहर थी पतंगें कटी डोर से
सांझ आने से पहले कहीं खो गई
हाथ की , मेज की और दीवार की,
हर घड़ी ये लगा शत्रुता कर गई
छोड़ मुझको अकेला खड़ा राह में
और द्रुत हो गईं, पंथ में बढ़ गईं
हर निमिष बन मरुस्थल बिखरता रहा
कंठ में और बस प्यास उगती रही
बिम्ब धुंधले दिखाता रहा आईना
प्रश्न करता रहा वक्त आठों पहर
आस की क्यारियों को निगलता रहा
चाहतों का उमड़ता हुआ इक शहर
पूर्णिमा रुक गई जा तिमिर की गली
स्वप्न आये नहीं नैन के गांव में
गीत सावन के सारे प्रतीक्षित रहे
झूले डाले नहीं नीम की छांह ने
और उमड़ी घटा की लहरिया, गगन
के किसी कोण पर जा अटकती रही
पांव ने जिस डगर को बनाया सखा
वो बदलती रही नित्य अपनी दिशा
कौन सा पथ सही, कौन सा है गलत
आज तक इसका चल न सका है पता
चल रहे हैं निरन्तर कदम राह में
कोई गंतव्य लेकिन नहीं सामने
होते बोझिल पगों को न विश्राम का
एक भी पल दिया है किसी याम ने
नीड़ की एक परछाईं बस दूर से
मन में उगती हुई आस छलती रही
उम्र की वाटिका में खिले फूल की
गंध हर एक होकर अपरिचित रही
एक पुरबाई, जिसको निमंत्रण दिया
वो बही, किन्तु प्रतिकूल; होकर बही
आंजुरि में संजोई हुई पांखुरी
आंधिया आईं आकर उड़ा ले गई
हो सका न समन्वय निमिष मात्र भी
शब्द से भावना हो विलग रह गई
कल्पना दायरों में सिमटती हुई
एक परवाज़ की राह तकती रही
ज़िन्दगी मोम बन कर पिघलती रही
दिन उगा पर झपकते पलक ढल गया
रात को नींद आकर चुरा ले गई
दोपहर थी पतंगें कटी डोर से
सांझ आने से पहले कहीं खो गई
हाथ की , मेज की और दीवार की,
हर घड़ी ये लगा शत्रुता कर गई
छोड़ मुझको अकेला खड़ा राह में
और द्रुत हो गईं, पंथ में बढ़ गईं
हर निमिष बन मरुस्थल बिखरता रहा
कंठ में और बस प्यास उगती रही
बिम्ब धुंधले दिखाता रहा आईना
प्रश्न करता रहा वक्त आठों पहर
आस की क्यारियों को निगलता रहा
चाहतों का उमड़ता हुआ इक शहर
पूर्णिमा रुक गई जा तिमिर की गली
स्वप्न आये नहीं नैन के गांव में
गीत सावन के सारे प्रतीक्षित रहे
झूले डाले नहीं नीम की छांह ने
और उमड़ी घटा की लहरिया, गगन
के किसी कोण पर जा अटकती रही
पांव ने जिस डगर को बनाया सखा
वो बदलती रही नित्य अपनी दिशा
कौन सा पथ सही, कौन सा है गलत
आज तक इसका चल न सका है पता
चल रहे हैं निरन्तर कदम राह में
कोई गंतव्य लेकिन नहीं सामने
होते बोझिल पगों को न विश्राम का
एक भी पल दिया है किसी याम ने
नीड़ की एक परछाईं बस दूर से
मन में उगती हुई आस छलती रही
उम्र की वाटिका में खिले फूल की
गंध हर एक होकर अपरिचित रही
एक पुरबाई, जिसको निमंत्रण दिया
वो बही, किन्तु प्रतिकूल; होकर बही
आंजुरि में संजोई हुई पांखुरी
आंधिया आईं आकर उड़ा ले गई
हो सका न समन्वय निमिष मात्र भी
शब्द से भावना हो विलग रह गई
कल्पना दायरों में सिमटती हुई
एक परवाज़ की राह तकती रही
रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है
शब्द जिसने क्रोंच पक्षी के रुदन से प्रेरणा पा
काव्य का अद्भुत गहन सागर बहाया
शब्द जिसने पी मिलन आतुर ह्रदय,उपलंभ देकर
राम मानस का नया अध्याय जीवन को सुनाया
शब्द जिसने एक भ्रम में डूब कर विचलित हुए को
मंत्र बन कर ज्ञान गीता का दिया है
शब्द जिसने अनवरत गाथाऒं की झड़िया लगाकत
लेखनी को कर गजानन के थमाया
आज वह ही शब्द हो असहाय मुझसे कह रहा है
रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है
हाँ कभी कर थाम दिनकर के सुनाई उर्वशी की थी कहानी
और कालिदास के श्लोक में शाकुन्तली गाथा बखानी
संगेमरमर में पिघल कर दास्तान-ए-हुस्न भी मैने लिखी है
और दुहराई गई तपभंग की कारण कथा मेरी जुबानी
किन्तु मैं स्वीकारता असमर्थता हूँ आज अपनी, चुक गया हूँ
देख तुमको कोई भी स्वर होंठ पर चढ़ता नहीं है
जब नदी की धार करती नॄत्य बन कर इक मयूरी
जल तरंगें चूम कर तट बून्द बन शहनाई रागिनियाँ जगायें
जेठ के भुजपाश में सावन मचल अंगड़ाई ले जब
तितलियों के पंख पर जब गंध आ आ कर नये बूटे बनायें
और ये सब एक प्रतिमा में सिमट कर सामने आ जब रुके तो
रंग का भी रंग उड़ता, चित्र में भरता नहीं है
गात कलियों के, सहज कोमल परस से नेह में भर चूमती सी
वादियों में चल रही हो पंख बन कर पंछियों के जो हवा सी
कसमसाती सिहरनों को गंध के पाजेब पहना कर मचलती
रागिनी की देह चन्दन में धुली हो ओढ़ कर पय की घटा सी
इस अनूठे शिल्प का आधार भी जब कल्पनाओं से परे है
तो सुघड़ शिल्पी बिचारा हार जाता, कोई बस चलता नहीं है
काव्य का अद्भुत गहन सागर बहाया
शब्द जिसने पी मिलन आतुर ह्रदय,उपलंभ देकर
राम मानस का नया अध्याय जीवन को सुनाया
शब्द जिसने एक भ्रम में डूब कर विचलित हुए को
मंत्र बन कर ज्ञान गीता का दिया है
शब्द जिसने अनवरत गाथाऒं की झड़िया लगाकत
लेखनी को कर गजानन के थमाया
आज वह ही शब्द हो असहाय मुझसे कह रहा है
रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है
हाँ कभी कर थाम दिनकर के सुनाई उर्वशी की थी कहानी
और कालिदास के श्लोक में शाकुन्तली गाथा बखानी
संगेमरमर में पिघल कर दास्तान-ए-हुस्न भी मैने लिखी है
और दुहराई गई तपभंग की कारण कथा मेरी जुबानी
किन्तु मैं स्वीकारता असमर्थता हूँ आज अपनी, चुक गया हूँ
देख तुमको कोई भी स्वर होंठ पर चढ़ता नहीं है
जब नदी की धार करती नॄत्य बन कर इक मयूरी
जल तरंगें चूम कर तट बून्द बन शहनाई रागिनियाँ जगायें
जेठ के भुजपाश में सावन मचल अंगड़ाई ले जब
तितलियों के पंख पर जब गंध आ आ कर नये बूटे बनायें
और ये सब एक प्रतिमा में सिमट कर सामने आ जब रुके तो
रंग का भी रंग उड़ता, चित्र में भरता नहीं है
गात कलियों के, सहज कोमल परस से नेह में भर चूमती सी
वादियों में चल रही हो पंख बन कर पंछियों के जो हवा सी
कसमसाती सिहरनों को गंध के पाजेब पहना कर मचलती
रागिनी की देह चन्दन में धुली हो ओढ़ कर पय की घटा सी
इस अनूठे शिल्प का आधार भी जब कल्पनाओं से परे है
तो सुघड़ शिल्पी बिचारा हार जाता, कोई बस चलता नहीं है
होली का रंग
लजाती ओढ़ कर चूनर सुनहरी, खेत में बाली
डिठौना बन गई सरसों, बहारों की जवानी का
बिरज ने टेसुओं का है नया पीताम्बर ओढ़ा
कथानक लिख रही जमुना उमंगों की कहानी का
हरे नीले गुलाबी रंग, सूखे और हैं गीले
चमकते कत्थई भी बैंगनी भी और हैं पीले
अधर के रंग, आँखों के, कपोलों पर खिंचे जो भी
बुलावा दे रहे हैं आज सुधि को भूल कर जी ले
चुहल अँगड़ाईयाँ लेती सजी है आज आँगन में
शहद मे डूब कर मलयज थिरकती झूम कानन में
रँगा है रंग होली के भ्रमित सा हो गया मौसम
घुली मल्हार सावन की लगा है आज फ़ागुन में
डिठौना बन गई सरसों, बहारों की जवानी का
बिरज ने टेसुओं का है नया पीताम्बर ओढ़ा
कथानक लिख रही जमुना उमंगों की कहानी का
हरे नीले गुलाबी रंग, सूखे और हैं गीले
चमकते कत्थई भी बैंगनी भी और हैं पीले
अधर के रंग, आँखों के, कपोलों पर खिंचे जो भी
बुलावा दे रहे हैं आज सुधि को भूल कर जी ले
चुहल अँगड़ाईयाँ लेती सजी है आज आँगन में
शहद मे डूब कर मलयज थिरकती झूम कानन में
रँगा है रंग होली के भ्रमित सा हो गया मौसम
घुली मल्हार सावन की लगा है आज फ़ागुन में
शब्द छिन गये
शब्द छिन गये
आज समय ने चलते चलते कुछ ऐसे करवट बदली है
खेल रहे थे जो अधरों पर मेरे, सारे शब्द छिन गये
इन्द्र धनुष पर बैठ खींचता रहता है जो नित तस्वीरें
बुनता वह रेशम के धागे, वही नाता है जंज़ीरें
अपने इंगित से करता है संयम काल चक्र की गति का
कभी रंग भरता निर्जन में, कभी मिटाता खिंची लकीरें
साहूकार! लिये बैठा है खुली बही की पुस्तक अपनी
और सभी बारी बारी से उसे चुकाते हुए रिन गये
कब कहार निर्धारित करता कितनी दूर चले ले डोली
कब देहरी या आंगन रँगते खुद ही द्वारे पर रांगोली
कठपुतली की हर थिरकन का होता कोई और नियंत्रक
कब याचक को पता रहेगी रिक्त, या भरे उसकी झोली
जो बटोर लेता था अक्सर तिनके खंडित अभिलाषा के
वही धैर्य अब प्रश्न पूछता रहता मुझसे हर पल छिन है
यों लगता है चित्रकथायें आज हुई सारी संजीवित
अंधियारों ने बिखर बिखर कर, सारे पंथ किये हैं दीपित
कलतक जो विस्तार कल्पना का नभ के भी पार हुआ था
कटु यथार्थ से मिला आज तो, हुआ एक मुट्ठी में सीमित
कल तक जो असंख्य पल अपने थ सागर तट की सिकता से
बँधे हाथ में आज नियति के, एक एक कर सभी गिन गये
खेल रहे थे जो अधरों पर मेरे, सारे शब्द छिन गये
इन्द्र धनुष पर बैठ खींचता रहता है जो नित तस्वीरें
बुनता वह रेशम के धागे, वही नाता है जंज़ीरें
अपने इंगित से करता है संयम काल चक्र की गति का
कभी रंग भरता निर्जन में, कभी मिटाता खिंची लकीरें
साहूकार! लिये बैठा है खुली बही की पुस्तक अपनी
और सभी बारी बारी से उसे चुकाते हुए रिन गये
कब कहार निर्धारित करता कितनी दूर चले ले डोली
कब देहरी या आंगन रँगते खुद ही द्वारे पर रांगोली
कठपुतली की हर थिरकन का होता कोई और नियंत्रक
कब याचक को पता रहेगी रिक्त, या भरे उसकी झोली
जो बटोर लेता था अक्सर तिनके खंडित अभिलाषा के
वही धैर्य अब प्रश्न पूछता रहता मुझसे हर पल छिन है
यों लगता है चित्रकथायें आज हुई सारी संजीवित
अंधियारों ने बिखर बिखर कर, सारे पंथ किये हैं दीपित
कलतक जो विस्तार कल्पना का नभ के भी पार हुआ था
कटु यथार्थ से मिला आज तो, हुआ एक मुट्ठी में सीमित
कल तक जो असंख्य पल अपने थ सागर तट की सिकता से
बँधे हाथ में आज नियति के, एक एक कर सभी गिन गये
दीप दोनों में रख कर बहाते रहे
प्रार्थना की सभा में लगा हाजिरी, ढोल चिमटे,मजीरे बजाते रहे
फूलमाला,प्रसादी की थाली लिये,परिक्रमा मन्दिरों की लगाते रहे
किन्तु पत्थर न कोई पसीजा कभी, चाल नक्षत्र अपनी बदल न सके
और हम भाग्य को दोष देते हुए, दीप दोनों में रख कर बहाते राहे
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
ज्योतिषी ने कहा था हमें एक दिन, हाथ की रेख कहती बनेगा धनी
हाथ पर हाथ रख बैठ हम फिर गये ,खुद चली आयेंगी पास हीरक मणी
आये मौसम,गये, वर्ष बीते बहुत, एक सूखा हुआ फूल भी न मिला
और हम अब भी बैठे प्रतीक्षा लिये,खुद ही खुल जायेगे भाग्य की चटकनी
फूलमाला,प्रसादी की थाली लिये,परिक्रमा मन्दिरों की लगाते रहे
किन्तु पत्थर न कोई पसीजा कभी, चाल नक्षत्र अपनी बदल न सके
और हम भाग्य को दोष देते हुए, दीप दोनों में रख कर बहाते राहे
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
ज्योतिषी ने कहा था हमें एक दिन, हाथ की रेख कहती बनेगा धनी
हाथ पर हाथ रख बैठ हम फिर गये ,खुद चली आयेंगी पास हीरक मणी
आये मौसम,गये, वर्ष बीते बहुत, एक सूखा हुआ फूल भी न मिला
और हम अब भी बैठे प्रतीक्षा लिये,खुद ही खुल जायेगे भाग्य की चटकनी
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