रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है

शब्द जिसने क्रोंच पक्षी के रुदन से प्रेरणा पा
काव्य का अद्भुत गहन सागर बहाया
शब्द जिसने पी मिलन आतुर ह्रदय,उपलंभ देकर
राम मानस का नया अध्याय जीवन को सुनाया
शब्द जिसने एक भ्रम में डूब कर विचलित हुए को
मंत्र बन कर ज्ञान गीता का दिया है
शब्द जिसने अनवरत गाथाऒं की झड़िया लगाकत
लेखनी को कर गजानन के थमाया

आज वह ही शब्द हो असहाय मुझसे कह रहा है
रूप का वर्णन तुम्हारे कर सके क्षमता नहीं है

हाँ कभी कर थाम दिनकर के सुनाई उर्वशी की थी कहानी
और कालिदास के श्लोक में शाकुन्तली गाथा बखानी
संगेमरमर में पिघल कर दास्तान-ए-हुस्न भी मैने लिखी है
और दुहराई गई तपभंग की कारण कथा मेरी जुबानी

किन्तु मैं स्वीकारता असमर्थता हूँ आज अपनी, चुक गया हूँ
देख तुमको कोई भी स्वर होंठ पर चढ़ता नहीं है

जब नदी की धार करती नॄत्य बन कर इक मयूरी
जल तरंगें चूम कर तट बून्द बन शहनाई रागिनियाँ जगायें
जेठ के भुजपाश में सावन मचल अंगड़ाई ले जब
तितलियों के पंख पर जब गंध आ आ कर नये बूटे बनायें

और ये सब एक प्रतिमा में सिमट कर सामने आ जब रुके तो
रंग का भी रंग उड़ता, चित्र में भरता नहीं है

गात कलियों के, सहज कोमल परस से नेह में भर चूमती सी
वादियों में चल रही हो पंख बन कर पंछियों के जो हवा सी
कसमसाती सिहरनों को गंध के पाजेब पहना कर मचलती
रागिनी की देह चन्दन में धुली हो ओढ़ कर पय की घटा सी

इस अनूठे शिल्प का आधार भी जब कल्पनाओं से परे है
तो सुघड़ शिल्पी बिचारा हार जाता, कोई बस चलता नहीं है

6 comments:

मीनाक्षी said...

जब नदी की धार करती नॄत्य बन कर इक मयूरी
जल तरंगें चूम कर तट बून्द बन शहनाई रागिनियाँ जगायें
--भाषा का शिल्प सौन्दर्य देख कर तो हम मुग्ध हो गए.

मीत said...

सच कहा मीनाक्षी जी आप ने. राकेश जी की भाषा पर मैं भी मुग्ध हूँ .... जब से इन्हें पढ़ रह हूँ तब से. कमाल की रचना है भाई.

जोशिम said...

बहुत ही सुंदर - मनीष

Dr.Bhawna said...

बहुत सुन्दर रचना पढ‌़ने को मिली है काफी समय बाद... बहुत-बहुत मुबारक राकेश जी...

मथुरा कलौनी said...

अभिव्‍यक्‍ति मन को छू गई

मथुरा कलौनी

सुनीता शानू said...

हाँ कभी कर थाम दिनकर के सुनाई उर्वशी की थी कहानी
और कालिदास के श्लोक में शाकुन्तली गाथा बखानी
संगेमरमर में पिघल कर दास्तान-ए-हुस्न भी मैने लिखी है
और दुहराई गई तपभंग की कारण कथा मेरी जुबानी

बहुत खूब! बहुत सुन्दर लिखा है आपने...

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...