होली का रंग

लजाती ओढ़ कर चूनर सुनहरी, खेत में बाली
डिठौना बन गई सरसों, बहारों की जवानी का
बिरज ने टेसुओं का है नया पीताम्बर ओढ़ा
कथानक लिख रही जमुना उमंगों की कहानी का


हरे नीले गुलाबी रंग, सूखे और हैं गीले
चमकते कत्थई भी बैंगनी भी और हैं पीले
अधर के रंग, आँखों के, कपोलों पर खिंचे जो भी
बुलावा दे रहे हैं आज सुधि को भूल कर जी ले


चुहल अँगड़ाईयाँ लेती सजी है आज आँगन में
शहद मे डूब कर मलयज थिरकती झूम कानन में
रँगा है रंग होली के भ्रमित सा हो गया मौसम
घुली मल्हार सावन की लगा है आज फ़ागुन में

2 comments:

रंजू said...

रँगा है रंग होली के भ्रमित सा हो गया मौसम
घुली मल्हार सावन की लगा है आज फ़ागुन में

राकेश जी होली की बधाई ..बहुत ही सुंदर रचना लगी आपकी यह ..होली के रंग सी :)

रवीन्द्र प्रभात said...

बढिया है , आपको होली की कोटिश: बधाईयाँ !

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...