कौन सकेत देता रहा

कौन सकेत देता रहा प्रीत के
उम्र की 
​रा​
ह पर 
​दूर 
से ही मुझे
जानता हूँ ये में जानता हूँ उसे
किन्तु लगता आपरिचित है वह आज भी

एक वयःसंधि की फिसलनी पर कहीं
पांव ठोकर बिना लडखडाये जरा
शापग्रस्ता हुई लौ जले दीप की
और गहरा तिमिर सामने था खड़ा
​कोई संकेत धुँधुआय भ्रम में मुझे
एक निश्चित दिशाबोध देते हुए
मंज़िलों की डगर पर बना प्रेरणा 
निश्चयों को नया वेग देता रहा 

सामने भी रहा पर अगोचर रहा
दूर  था हर घड़ी पर रहा साथ भी

कितने संकेत मिलते रहे आज तक
और कितने है संकेत बन कर मिले
हर कदम पर रहे उँगलियाँ  थाम कर
आज तक ज़िन्दगी में यही सिलसिले
द्वार जब भी मिले सामने बन्द हो
कौन नूतन डगर सौंपता था मुझर
यह तिलिसमो में डूबे हुए भेद है
उम्र बीती मगर अब तलक न खुले

मौन  ने जब कभी आके छेड़ा मुझे
कौन झंकारता  था मधुर साज भी

जब भी घेरे भ्रमों के दिवास्वप्न आ
सत्य के कौन संकेत देता रहा
जब प्रपातों को उन्मुख हुई नाव तो
मांझियों के बिना कौन खेता रहा
उम्र बीती इन्हीं गुत्थियों में उलझ
कोई हल आज तक भी नहीं मिल सका
में चला हर घड़ी ओढ़ एकाकियात
जाने है कौन संकेत देता रहा

अनसुलझ ये परिस्थिति रही आज तक
कोई बदलाव दिखता नहीं आज भी

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