पिछले दिनों अमेरिका में आयोजित भारत और पाकिस्तान की आज़ादी के अवसर पर आयोजित मुशायरा और कवी सम्मलेन में प्रस्तुत की रचना:
एक ही फूल की पंखुरी हम औ’ तुम
गन्ध तुम में वही, गंध हममें, वही
तुमने अल्फ़ाज़ में जो कहा हमसुखन
बात शब्दों में हमने वही है कही
है तुम्हें जो चमन ,वो हमें वाटिका
तुम इबादत करो,हम करें अर्चना
सर तुम्हारा झुके सजदा करते हुए
शीश अपना झुका हम करें वन्दन्बा
तुमने रोजे रखे, हमको उपवास हैं
तुमको माहताब,हमको वही चन्द्रमा
ख्वाब-सपने कहो कुछ सभी एक हैं
तुम करो आरज़ू, हम करें कामना
नाम से अर्थ कोई बदलता नहीं
इस धरा को जमीं तुम कहो,हम मही
जाविये देखने के अलग हौं भले
एक तस्वीर का एक ही आचरण
फ़र्क लिखने में चाहे जुदा ही लगे
एक अपनी जुबाँ एक ही व्याकरण
आईना तुम अगर, एक परछाईं हम
हम इबारत,लिखी जिसपे तुम वो सफ़ा
तुम उठे हाथ मौला के दरबार में
हम लरजती लबों पे मुकद्दस दुआ
एक ही जिस्म की दो भुजा हम औ’ तुम
हर गलत प्रश्न का हम हैं उत्तर सही
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6 comments:
राकेश जी ..एक छोटी सी कविता में एक भावपूर्ण अंतर समझा दिया आपने..हिन्दी और उर्दू दोनों का बेजोड़ समन्वय जो कविता को एक आकर्षण देती है...हमें तो बहुत अच्छी लगी...बढ़िया कविता के लिए हार्दिक बधाई
बड़ी सुन्दर रचना। तब भेद क्यों?
एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !
बहुत सुन्दर रचना ....
कितने अद्वितीय ढंग से बात रखी आपने....वाह !!!
अनमोल भाव..अतिसुन्दर रचना...
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