कभी चल दिए साथ

कभी चल दिए साथ पकड़ कर उंगली जो जीवन के पथ पर
वो कुछ ऐसे सपने थे  जो संवरे नहीं नयन में आकर

गति के अनुष्ठान से लेकर पथ पर बिखर रहे मीलो में
पाथेयों के उद्गम से ले बिछी नीड तक की झीलों में
अरुणाचल से आराम्भित हो किरण किरण के अस्ताचल तक
दोपहरी के प्रखर सूर्य 
सी , जली रात की कंदीलों में


परछाई बन कभी चल दिए साथ निरंतर जो घटनाक्रम
कोई ऐसा ना था
 आया हो जो कोई निमंत्रण पाकर


कभी तान बांसुरिया की तो कभी चुनी अलगोजे की धुन
कभी रागिनी थी सितार की, कभी लिया इकतारे को चुन
रहे खोजते इक सरगम को तार तार में संतूरों के
कैद किये थी पायल उसको अपने इक घुँघरू में 
​बुन  बुन ​


कभी चल दिए साथ फिसल कर साजों के तारों से जो सुर
उनमें कोई एक नहीं था, वाणी जो दुहराये गाकर

बचपन की गलियों में या फिर अल्हड़ता के नए मोड़ पर
यौवन के पथ पर बंधन के सभी दायरे बंधे तोड़ कर
रंगभूमि में दायित्वों की, हर निश्चय का साथ 
निभाते 
जीवन पथ पर साथ रहे है संकल्पों का शाल ओढ़कर


कभी चल दिए साथ थाम कर साँसो के धागे जो रिश्ते
संभव नहीं व्यक्त कर पाना उन्हें शब्द के 
वस्त्र उढ़ाकर 

बदले ना विधना का लेखा

रही कोशिशें असफल।बदले ना विधना का लेखा

नईै सुबह परिवर्तन अपने संभव है कल
लेकर आये
आस सजी थी संध्या से ही
छाई हुई तिमिर की बदली छँट जायेगी
उगती हुई
धूप की थिरकन छूते से ही

मगर भोर पर इतिहासों ने खींची लक्ष्मण रेखा


परिणति कब बदली है तपती हुई जेठिया
दोपहरी में
संचित रखे तुहिन कणो की
सदियों से दोहराती जाती रही व्यवस्था
कब संभव है
रहे पाहुनी चार घडी ही

इसी सत्य ने फिर से खुद को आईने में देखा


रहे उगाते अंगनाई के टूटे हुए कुम्भ गमलों में
ताजमहल नित
 सुबह शाम सपनो के
रहे ढूंढते घिर कर रहते हुए कुहासों की छाया में
इंद्रधनुष बन जाए
जिनमें रंग रहे  अपनों के

टूटे बिम्बो में निकालते रहे मीन और मेखा

किसो अधर पर नहीं

किसो अधर पर नहीं जड़ा पिघले सावन का चुम्बन
सूने पनघट पर क्या करती पायलिया की रुनझुन


एक बार फिर लौटी नजरे, खाली हाथ डगर से
दिन गुजरे बैठा न कोई पाखी आ कर छत पे
रोता रहा पपीहे का स्वर भटका हुआ हवा में
लौटा गया दिवस आशाएं तोड़ तोड़ संध्या  में


किसी अधर पर नहीं रुका पल को आकर भी स्पंदन
सूने पनघट पर क्या करती पायलिया की रुनझुन 


दिशाहीन भटके संदेशों के कपोत सब नभ में
 रहा बदलता एक प्रतीक्षा का पल भी परवत में
मन की सिकता बिछी रही बन नदियातट की रेती
जिस पर आकर बांसुरिया की धुन ना कोई लेटी


किसी अधर पर मढ़ा नहीं सांसों ने आ चन्दन वन
सूने पनघट पर क्या करती पायलिया की रुनझुन 


रही फडकती किसी परस को तरसी हुईभुजाये
थमी न पल भर रही दौड़ती 
नस ​नस में शम्पाये
सुलगा करी तले तरुवर के जन्मांतर की कसमें
विधना पर दोषारोपण ही रह पाया बस , बस में



किसी अधर  पर नहीं गिरी अमृत कलसी की छलकन
सूने पनघट को क्या कहती पायलिया की रुनझुन

चौराहों पर लिए प्रतीक्षा बीती सुबह शाम

जीवन के इस महानगर में
दोपहरी बीती दफ्तर म
चौराहों पर लिए प्रतीक्षा
बीती सुबह शाम

कहने को भी पल या दो पल
अपने नही मिले
बोते रहे फूल गमलों में
लेकिन नहीं खिले
करे नियंत्रित र
खेघड़ी की
दो सुइयां अविराम


यौवन चढ़े निशा पर लेकिन
सजे नहीं सपना
परछाई ने रह रह पूछा
है परिचय अपना
कोई 
मिलता नहीं राह में
​करने 
दुआ सलाम


प्रगति पंथ के मोड़ मोड़ पर
विस्तृत डायवर्जन
प्राप्ति और अभिलाषाओं के
मध्य ठनी अनबन
साँसों ने धड़कन ने माँगा
है जीने का दाम

कहना होगा तुम हो पत्थर

थी हमें पिलाई गई यहाँ घुट्टी में घोल कई बातें
जिनको दोहराते बीते दिन, बीती अब तक सारी रातें
इस जगती की हर हलचल का है एक नियंत्रक बस सत्वर
हर घटना का है आदि अंत बस एक उसी की मर्जी पर

पाले बस यही मान्यताएं नतमस्तक थे मंदिर जाकर
आराधे सुबहो शाम सदा प्रतिमा में ढले हुए पत्थर

गीता ने हमको बतलाया, वह ही फल का उत्तरदायी
कर्तव्य हमारे बस में है, परिणाम सुखद सब होता है
उसने संबोधित होने को, मध्यस्थ न आवश्यक कोई
जो भी उससे बातें करता, वो सारी बातें सुनता है

तो आज हजारो प्रश्न लिए आया हूँ द्वार तुम्हारे पर
यदि उत्तर नहीं मिले तो फिर, कहना होगा तुम हो पत्थर


तुमने जब सृष्टि रची थी तब क्या सोचा था बतलाओ तो
क्यों धर्म रचा जो आज हुआ मानवता का कट्टर दुश्मन
क्यों ऐसे बीज बनाये थे जो अंकुर हों जिस क्यारी में
उसक्यारी में ही आयातित करते है अनबन के मौसम


वसुधैवकुटुंबम शिलालेख जो बतलाती संस्कृतियोंका
उस एक सभ्यता को सचमुच कहना होगा अब तो​ पत्थर


जो स्वार्थ घृणा और अहाँकर की नींवों पर निर्मित होता
उस एक भवन की प्रतिमा में कब प्राण प्रतिष्ठितहोते हैं 
तुम इन प्रासादों के वासी,  जो चाकर चुने हुए तुमने
वे श्रद्धा और आस्था की बेशर्म तिजारत करते है



तुम निस्पृह होकर के विदेह हो चित्रलिखित बस खड़े हुए
तो मन क्यों माने ईश् तुम्हें, कहना होग हो पत्थर

एकाकियत

कैप्सूलों गोलियों की एक अलमारी

उम्र की इतनी घनी दूुश्वारियों में
आ बढ़ा
कितना अकेलापन
धुंध बन कर आँख में फिर से तिरा
बीते दिनों का
वो खिलंदड़पन
सांझ की बैसाखियों पर बोझ है भारी

स्वप्न जाकत ताक पर था टंग गया
ठुकरा निमंत्रण
लौट न आया
रह गया परछाइयों की भीड़ में
गुमनाम होकर
साथ का साया
रात गिनती गिनतियों को आज फिर हारी



जुड़ गया रिकलाइनर से और टीवी के
रिमोटों से
अटूटा एक अपनापन
बढ़ गई थी फोने के सरगम सुरों से
एक दिन जो
आज भी सुलझी नहीं अनबन
भोर संध्या रात पर एकाकीयत तारी

किसके किसके नाम



संदेशे हर रोज मिले है भोर दुपहरी शाम
लाता रहा रोज ही मौसम किसके किसके नाम

मन की शुष्क वाटिका में पर अब न फूल खिले
जितने भी सन्देश मिले पतझर के नाम मिले
एक कटोरी भरी धूप की देकर गई दुपहरी
बीन ले गई संध्या आकर् जब द्वारे पर उतरी

शेष रह गई चुटकी भर कर बस सिन्दूरी घाम
और रहे आते सन्देशे जाने किसके नाम​

कटते रहे दिवस जीवन के बन कर के अभिशाप
सपनों की परछाईं की भी बची नहीं कुछ आस
रहे गूँजते सांसों में बस सन्नाटे के गीत
एकाकीपन रहा जोड़ता मन से अपनी प्रीत

एक कील पर अटक गये सब दिन के प्रहर तमाम
और पातियाँ थी मौसम की किसके किसके नाम

तिरते रहे हवाओं में टूटी शपथों के बोल
बिकी भावना  बाज़ारोा में बस कौड़ी के मोल
नयनो की सीपी पल पल पर स्वाति बूँद को तरसी
फिर से घिरी घटा अंगनाई से गुजरी बि​न बरसी

विरही  मन के मेघदूत को मिला न पी का गाँव
थका  खोजते  लिखे मिले थे और किसी के नाम​

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके

वे सारे सन्देश जिन्हें तुम लिख न सके व्यस्तताओं में​
आज महकती पुरबाई ने वे सब मुझको सुना दिए हैं

मुझे विदित है मन के आँगन में होती भावो की हलचल
और चाहना होगी लिख दो मुझको अपने मन की बाते
लेकिन उलझे हुए समय की पल पल पर बढ़ती मांगो में
जाता होगा दिन चुटकी म बीती होंगी पल में रातें

उगती हुई भोर की किरणों ने पाखी के पर रंग करके
वे सारे सन्देश स्वर्ण में लिख कर जैसे सजा दिए हैं

शब्द कहाँ आवश्यक होते मन की बातें बतलाने को
​औरकहाँ सरगम के सुर भी व्यक्त कर सके इन्हें कदाचित
लेकिन नयनों की चितवन जब होती है आतुर कहने को
निमिष मात्र में हो जाते हैं अनगिन महाग्रंथ संप्रेषित

बोझिल पलकों से छितराती हुई सांझ सी  सुरमाई ने
नभ के कैनवास को रंग कर वे सब मुझकोदिखा दिए है

वैसे ही सन्देश लिखे थे जो रति ने अनंग को इक दिन
और शची ने जिनसे सुरभित करी पुरंदर की अंगनाई
दमयंती के और लवंगी के नल जगन्नाथ  तक पहुंचे
जिनसे बाजीराव पेशवा के मन में गूंजी शहनाई 

कलासाधिके! आज हिना के और अलक्तक के रंगों ने

अनचीन्हे सन्देश सभी वे चित्रित कर के बता दिए हैं

मेघों के कन्धों पर

कालिदास की अमर  कल्पना​
को फिर से दोहराया मैंने
मेघों के कांधों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैने

कितनी बार शिकायत के स्वर
मेरे कानों से टकराये
कितने बीत गये दिन, कोई
तुम सन्देशा भेज न पाये
भेजे तो थे सन्देशे पर
रूठा मौसम का हरकारा
इसीलिये तो सन्देसों को
मिला नहीं था द्वार तुम्हारा

मौसम  की हठधरमी वाली
गुत्थी को सुलझाया मैने
मेघों के कन्धों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैने

श्याम घटाओं से लिख कर के
अम्बर के नीले कागज़ पर
रिमझिम पायल की रुनझुन की
सरगम वाली मुहर लगाकर
सावन की मदमाती ऋतु से
कुछ नूतन सम्बन्ध बनाये
ताकिं कोई भी झोंका फिर से
इनको पथ से भटका पाये

अनुनय और विनय कर करके
मौसम को समझाया मैंने
मेघों के कन्धों पर रखकर
यह सन्देश पठाया मैंने

​जितने भाव दामिनी द्युति से  
कौंधे मन की अँगनाई में
उन सबको सज्जित कर भेजा 
है बरखा की शहनाई में​

दिया की लहरों पर खिलते
बून्दों के कोमल पुष्पों से
कर श्रुन्गार, सजाया भेजा
सन्देशा मैने गन्धों से

डूब प्रेम में उसे सुनाये
मौसम को उकसाया मैने
मेघों के कंधों पर रख कर
यह सन्देश पठाया मैने

भर लें होठों से झरी चांदनी

मन के पन्नो पर अंकित है जितने भी स्मृति लेख आज, कल
सम्भव है उनको धो डालें उगे सूर्य की प्रखर रश्मियां
और पास में रह जाए बस धुले हुए बादल के टुकड़े
जिन पर गिरे दामिनी आकर​ और रचे कुछ नई पंक्तियाँ

तो फिर क्यों  न आज बैठ कर साथ बिताएँ हम कुछ घड़ियां
और सांझ के प्याले में भर लें होठों से झरी चांदनी

शेष रहा संचय में कितना, कटी उमर ने दिन दिन जोड़ा
वर्तमान ठुकराया, जीते भग्नावशेष विगत के लेकर
या आगत के दिवास्वप्न के सायों को बांहो में जकड़े
और भुलाकर आज दे रहा था जो अमृत आंजु​रि भर कर


तो फिर क्यों न आज, बंद कर हर इक खिड़की के पल्ले को
बैठे पास और सुन ले ​जो सरगम छेड़े मधुर रागिनी  


मुड़ कर पीछे छूट गए पदचिह्न देखने से क्या हासिल
यौवन की वयःसंधि तलक ही मानचित्र बस राह दिखाते
चौराहे पर पहुँच किया जाता जो निर्णय अपना होता
चुननी होती राह स्वयं ही जिस पर पग फिर चलते जाते

तो फिर क्यों न आज चुने हम उन गलियारों की राहों को
जहां ज़िन्दगी नहीं नियंत्रित करती कोई समय सारिणी


कटी पतंगों की डोरी में सादा पन क्या और मांझा क्या
वापिस नहीं जोड़ती उन को थमी हुई चरखी हाथों में
थापों में हो चुकी खर्च धड़कन प्राणों की वंसी के संग
निधि बन कर फिर शेष कहाँ रह पाती है संचित साँसों में

तो फिर क्यों न आज, आज के साथ गले मिल गा लें जी लें
ताकि न कल, कल की गोखो से पड़े आज की धूल ताकनी

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...