भर लें होठों से झरी चांदनी

मन के पन्नो पर अंकित है जितने भी स्मृति लेख आज, कल
सम्भव है उनको धो डालें उगे सूर्य की प्रखर रश्मियां
और पास में रह जाए बस धुले हुए बादल के टुकड़े
जिन पर गिरे दामिनी आकर​ और रचे कुछ नई पंक्तियाँ

तो फिर क्यों  न आज बैठ कर साथ बिताएँ हम कुछ घड़ियां
और सांझ के प्याले में भर लें होठों से झरी चांदनी

शेष रहा संचय में कितना, कटी उमर ने दिन दिन जोड़ा
वर्तमान ठुकराया, जीते भग्नावशेष विगत के लेकर
या आगत के दिवास्वप्न के सायों को बांहो में जकड़े
और भुलाकर आज दे रहा था जो अमृत आंजु​रि भर कर


तो फिर क्यों न आज, बंद कर हर इक खिड़की के पल्ले को
बैठे पास और सुन ले ​जो सरगम छेड़े मधुर रागिनी  


मुड़ कर पीछे छूट गए पदचिह्न देखने से क्या हासिल
यौवन की वयःसंधि तलक ही मानचित्र बस राह दिखाते
चौराहे पर पहुँच किया जाता जो निर्णय अपना होता
चुननी होती राह स्वयं ही जिस पर पग फिर चलते जाते

तो फिर क्यों न आज चुने हम उन गलियारों की राहों को
जहां ज़िन्दगी नहीं नियंत्रित करती कोई समय सारिणी


कटी पतंगों की डोरी में सादा पन क्या और मांझा क्या
वापिस नहीं जोड़ती उन को थमी हुई चरखी हाथों में
थापों में हो चुकी खर्च धड़कन प्राणों की वंसी के संग
निधि बन कर फिर शेष कहाँ रह पाती है संचित साँसों में

तो फिर क्यों न आज, आज के साथ गले मिल गा लें जी लें
ताकि न कल, कल की गोखो से पड़े आज की धूल ताकनी

1 comment:

Udan Tashtari said...


तो फिर क्यों न आज चुने हम उन गलियारों की राहों को
जहां ज़िन्दगी नहीं नियंत्रित करती कोई समय सारिणी


-गज़ब!!

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