अश्रु बहाने से न कभी

अश्रु बहाने से न कभी मिल सकी किसी को भी मंज़िल
मुस्काते पथ के छालों के फूल खिले तब लक्ष्य मिला

हाथों की खिंचीी लकीरों में उलझाकर दिवस बिताना क्या
झंझावातों की भंगुरता कुछ पल है तो घबराना क्या
गालो पर खिंची आंसुओं की पगडण्डी पंथ नहीं बनती
जो भटका घर में ही उसको फिर दिशाबोश करवाना क्या

थक हार बैठने वाले के क़दमों को नहीं चूमता पथ
औ अश्रु बहाने से न कभी विजयी कर पाता कोई किला

हाथों में कैद परिश्रम के विधना का हर  जोखा लेखा
संकल्पों के इतिहासों ने था महाकाल झुकते देखा
निश्चय ने सदा बहाई है अलकापुर र से लाकर गंगा
विश्वास स्वयं पर औ निष्ठा बदले किस्मत की हर रेखा

हाँ अश्रु बहाने से न कभी सिंचित हो सकी कोई क्यारी
कितने प्रयास एकत्र हुए तब ही शाखा  पर फूल खिला

सामर्थ्यहीनता का द्योतक चुप रह कर अश्रु बहाना है
मानवजीवन सर्वोपरि है देवों ने भी यह माना है
विध्वंस हमें ऊर्जा देता हर बार नए निर्माणों की
हर बार नया उत्साह सजा आगे को कदम बढ़ाना है

मिल पाया किसे कहो वांछित बस बैठे अश्रु बहाने से
संघर्षित जो भी रहा उसे सागर से अमृत कलश मिला

मिले मुझे तुम मध्यान्तर में

इक नाटक के मंचन पर जब मिले मुझे तुम मध्यान्तर में
अकस्मात् ही घिर कर आये आँखों में यादों के बादल

वे पल मुख्य पात्र हम तुम थे मंचित जीवन के नाटक में
टिका हुआ था हम पर ही तो घटनाक्रम व् पूर्ण कथानक
निर्देशन भी अनुयायी संवाद संहिता का अपनी था
सूत्रधार भूला करता था हमें देख, निज कथ्य अचानक

बीते हुए पलों में जीना है स्वीकार नहीं मुझको,  पर
कुछ पल बस जाते नयनों में बन कर के सुधियों का काजल

प्रश्न उठे कुछ ले अंगड़ाई उस पल मन की अमराई में
क्या छेड़ा तुमको भी गुंजित इस अतीत की शहनाई ने
क्या हस्ताक्षर जड़े महकती भूली बिसरी यादों ने कुछ
क्या वे पल जीवंत हुए ?  जो बीते संध्या सुरमाई में

यद्यपि है अनुमान मुझे क्या होगा इन प्रश्नों का उत्तर
लेकिन उत्कण्ठा का असमंजस फिर भी करता है पागल।

बदले हुए मंच अब सन्मुख और कथानक भी है बदला
शब्द हुए सारे निर्धारित पृष्ठभूमि अब मुख्य पात्र है
दृश्य श्रव्य की डोर कहाँ से कौन खींचता है रहस्यमय
रंग सभी हो चुके तिरोहित पटाक्षेप ही  शेष मात्र है

खिंचे हुये परदे की हम तुम  लटकी हुई डोर के जैसे 
और कक्ष को आत्मसात करने को है कुहुसाता आँचल

पाषाण में भी प्राण

जानते पाषाण में भी प्राण हो जाते प्रतिष्ठित
सांस ले विश्वास की जब आस्था की ज्योति जागे

जब मचल लोबान की खुशबू लहरती है हवा में
तब मजारों की चिरंतन नींद खुल जाती अचानक
चादरों के छोर पर अंगड़ाई ले रंगीन धागे
शब्द में अंकित किये हैं एक श्रद्धा का कथानक

गहन अंधियारी गुफाओं में ह्रदय की दीप बनकर
निर्झरों में  ढल गए  विश्वास के सारे सहारे

है हमारी संस्कृति का साक्षी इतिहास कहता
पाँव की रज छु यहाँ पाषाण को भी प्राण मिलते
हो गई जीवंत निष्ठा साथ पा विश्वास का जब
उस घड़ी पाषाण स्तंभों से स्वयं ईश्वर निकलते

हो अगर संचेतना का केंद्र इक ही माध्यम तब
बाँध लाते तारको को सूत के कमजोर धागे

मान्यता का सूर्य चीरे गहनतम तम के कुहासे
शैलखंडों में नदी के जाग जाती चेतनाएं
प्राण तो पाषाण। की हर मूर्ती में होते पुजारी
जागते संकल्प कृत जब शीश को अपने झुकाएं

रुक गयी गति भी निरन्तर चल रहे रथ की समय के  
आस्थामय  जब ह्रदय संकल्पकृत हो मूल्य मांगे 

पालकी रात की रिक्त कर दी विदा

होंठ के गीत सारे उड़ा ले गईं जब हवा की इधर से गई पालकी
धूप आकर उन्हें सोख कर ले गई जितनी परछाईयां थीं रहीं ताल की
शब्द बस हिचकिचाते हुए रह गौए बोल पाये नहीं कोशिशें कीं बहुत
और नजरें उदासी लिये तक रहीं त्यौरियां थीं चढ़ीं काल के भाल की

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गीत के गांव में द्वार खुलते नहीं
उंगलियां खटखटाते हुए थक गईं
लेखनी के समन्दर लगा चुक गये
भावनायें उमड़ती हुई रुक गईं
और हम अनलिखा पृष्ठ थामे हुये
बस नजर को उसी पर गड़ाते रहे
 
केन्द्र पर चक्र के रह गये हम रुके
दिन परिधि थाम कर दूर जाता रहा
रश्मियां छटपटाती धुरी पर रहीं
पूर्व आने के पल दूर जाता रहा
आ प्रतीची भी प्राची में घुलने लगी
रोशनी के बदलने लगे अर्थ भी
बाँह में एक पल थामने के लिये
जितने उपक्रम किये,वे रहे व्यर्थ ही
 
सूर्य के अर्घ्य को जलकलश थे भरे
द्वार मावस के उनको चढ़ाते रहे
 
रात के पृष्ठ पर तारकों ने लिखी
जो कहानी समझ वो नहीं आ सकी
नीड़ को छोड़ कर, लौट आती हुई
राग गौरेय्या कोई नहीं गा सकी
चाँद ने डाल घूँघट छिपा चाँदनी 
पालकी रात की रिक्त कर दी विदा
किन्तु वह रुक गई भोर  के द्वार पर
सोचते रह गये सब, भला क्या हुआ
 
अंशुमाली स्वयं बीज बोये हुए
ज्योति के, क्यारियों से चुराते रहे
 
बादलों ने ढकी धूप की कोंपलें
आवरण को हटा मुस्कुराई नहीं
शाख ने पैंजनी बांध ली  ओस की
आतुरा रह गई, झनझनाई नहीं
पंथ ने कोई पाथेय बांधा नहीं
नीड़ खोले बिना द्वार सोता रहा
और तय था घटित जो भी होना रहा
हम अपरिचित रहे और होता रहा

और हम बारह खानों में अटके हुए 
अंक, बस जोड़ते औ घटाते रहे 

घूंघट से कुछ रंग चुरा कर

तुमने कहा नए ही ढंग से हम तुम अब के होली खेलें
इसीलिये लाया   उषा के घूंघट से कुछ रंग चुरा कर
कर गुलाल संध्या के पग में रचे अलक्तक की आभा की
दोपहरी के स्वर्ण थाल में रख कर लाया उन्हें सजा कर

जाते हुए शरद की हौले हौले उठती पगचापों में
टेसू के फूलों की टूटी पंखुरियों को घोला मैंने
देख बसंती चूनर को जो बजा रहा आवारा मौसम
उस सीटी में बाँसुरिया के खोये स्वर को खोजा मैंने

कालिंदी की परछाई को गई रात की सुरमाहट में
मिला रहा हूँ रखूँ तुम्हारे कुंतल जिससे रंग सजा कर

चलो कपोलो पर मल दूं मै तुलसी के विरवे की खुशबू
और भिगो दूं तन को लेकर सौगंधओं की मधुर चांदनी
भरूं घोल कर पिचकारी में कुछ मीठी मीठी मनुहारें
सराबोर कर दूं लेकर के बादल से झर रही रागिनी

पुरबाइ जो छेड़ रही है नन्ही कोपल की मुस्काने
सोच रहा हूँ उससे रंग दूं अंगराग में उसे मिला कर

युग बीते हैं वही पुराने नीले पीले रंग से रंगते
आओ हम इतिहास रचे नव, रंगे अधर को मुस्कानों से
तन को मन को नांद भरी अपनत्व भावना में डुबकी दे
गलियो को रंगीन बना दे प्रीत भरी रसमय तानो से

जीवन के इस महासिंधु में हैं अशेष रत्नों की गागर 
उसको स्नेह नीर से भर दें राग द्वेष सब आज भुला  कर 

बज रही है मौसम की बांसुरी कहीं जैसे


बादलो के टुकड़े आ होंठ पर ठहरते हैं
किसलयो से जैसे कुछ तुहिन कण फिसलते हैं
उंगलियां हवाओं की छू रही हैं गालों को
चांदनी के साये आ नैन में उतारते हैं
बात एक मीठी सी कान में घुली जैसे
हौले हौले बजती  हो बांसुरी कहीं जैसे

टेसुओं  के रंगों में भोर लेती अंगड़ाई
चुटकियाँ गुलालों की प्राची की अरुणाई
सरसों के फूलों का गदराता अल्हड़पन
चंगों की थापों पर फागों की शहनाई
आती हैं पनघट से कळसियां भरी ऐसे
हौले हौले बजती हो बांसुरी कहीं जैसे

उठती खलिहानों से पके धान की खुशबू
मस्ती में भर यौवन आता है नभ को छू +
गलियों में धाराएं रंग की उमंगों की..
होता है मन बैठे ठाले ही बेकाबू
बूटों की फली भुनी मुख में घुली ऐसे
हौले हौले बजती हो बांसुरी कहीं जैसे

लहराती खेतों में बासंती हो  चूनर
पांवों को थिरकाता सहसा ही आ घूमर
नथनी के मोती से बतियाते बतियाते
चुपके से गालों को चूमता हुआ झूमर
याद पी के चुम्बन की होंठ पर उगी ऐसे
हौले हौले बजती हो बांसुरी कहीं जैसे

फगुनाइ गंध हवा में है

बासंती चूनर लहराई फागुन का रंग हवा में है
मौसम की चाल निखर आई फगुनाइ गंध हवा में है

गुनगुनी हो गई घूप परस ले गर्म चाय की प्याली का
फेंका उतार कर श्वेत, लपेटे दूब रंग हरियाली का
महीनो के बाद बगीचे में आकर कोई पाखी बोला
घर भर ने ताजा साँसे ली कमरों ने खिड़की को खोला

ली भावों ने फिर अंगड़ाई, फगुनाइ गंध हवा में है
कोंपल ने आँखे खोल कहा फगुन का रंग   हवा में है

पारा तलघर से सीढ़ी चढ़ ऊपर की मंज़िल तक आया
फिर चंग कहीं पर बोल उठा,बम लहरी का स्वर लहराया
खलिहानों के प्रांगण  में अब सोनाहली चूनर लहराई
नदिया के बहते धारे ने तट पर आ छेड़ी शहनाई 

तितली फूलों पर मंडराए, फगुनाई  गंध हवा में है
बालें फ़सलों  की लहराई फ़ागुन का रंग  हवा में है 

तन लगा तोड़ने अंगड़ाई मचले  पग चहलकदमियों को
होलिका दहन की तैयारी के चिह्न सजाते गलियों को
टेसू के फूल लगे रंगने नव पीत रक्त रंगों में दिन
अम्बर यह बादल से बोला, अब घर जा आया है फागुन

गीतों ने नई गज़ल गाई फगुनाई गंध हवा में है
मौसम ने पायल थिरकाई फ़ागुन का रंग  हवा में है

कभी कभी यह मन यूं चाहे,

कभी कभी यह मन यूं चाहे,
आज तोड़ कर बन्धन सारे  
उड़े कहीं उन्मुक्त गगन में
कटी पतंगों सा आवारा

खोल सोच का अपनी पिंजरा
काटे संस्कृतियों के बन्धन
धरे ताक पर इतिहासों का
जीवन पर जकड़ा गठबन्धन
तथाकथित आदर्शों का भ्रम
जो थोपा सर पर समाज ने
काट गुत्थियां सीधा कर दे
पल भर में सारा अवगुंठन

रोके चलती हुई घड़ी के
दोनों के दोनों ही कांटे
और फिरे हर गैल डगर में
बिन सन्देश बना  हरकारा

दे उतार रिश्तों की ओढ़ी
हुई एक झीनी सी चादर
देखे सब कुछ अजनबियत की
ऐनक अपने नैन चढ़ाकर
इसका उसका मेरा तेरा
रख दे बाँध किसी गठरी में
और  बेतुकी रचना पढ़ ले
अपने पंचम सुर में गाकर

भरी दुपहरी में सूरज को
दीप जला कर पथ दिखलाये
पूनम की कंदील बनाकर
उजियारे आँगन चौबारा  
  
जीवन की आपा धापी को
दे दे जा नदिया में धक्का 
प्रश्न करे जो कोई, देखे
उसको होकर के भौचक्का
जब चाहे तब सुबह उगाये,
जब चाहे तब शाम ढाल दे
रहे देखता मनमौजी मन
हर कोई रह हक्का बक्का 

जब चाहे तब कही ग़ज़ल को 
दे दे नाम गीत का कोई 
और तोड़ कर बन्धन गाये
प्रेम गीत लेकर हुंकारा  

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन जीवन एक निमिष रह पाये
हर धड़कन, हर सांस और पल, कहीं किसी से बँधा हुआ है

पहली बार धड़कते दिल ने पह्ली बार आँख जब खोली
बांधे रही उसे उस पल से प्रीत भरी ममता के धागे
पहली बार प्रस्फ़ुटित स्वर ने सम्बोधन के रिश्ते जोड़े
तब ही से बन्धन अनगिनती ले ले कर अंगड़ाई जागे

कैसे भला तोड़ कर बन्धन पथे से कदम अग्रसर हो लें
उठने वाला एक एक पग, पथ पर ही तो सधा हुआ है

यौवन के वयसन्धि मोड़ पर दृष्टि साधना के सँवरे पल
उनकी अंगड़ाई ने जकड़ा तन को मन को सम्मोहित कर
कालचक्र के रुके हुये गतिक्रम में बन्दी हुई ज़िन्दगी
एक बिन्दु के होकर स्तंभित हुये समूचे निशि औ’ वासर

था मुमकिन यह नहीं तोड़ कर बन्धन ऐसे मोह पाश के
विमुख हो चले, क्योकि सृष्टिक्रम इस पर ही तो टिका हुआ है

जीवन की चढ़ती दोपहरी उलझी व्यवसायिक्ताओ में
रहा असंभव दामन कोई उससे दूर कभी रख पाये
एक राग था एक ताल में बंधी हुई थी पूरी सरगम
अवरोहो से पंचम तक सुर चाहे कितने खुल कर गाये

संभव नहीं तोड़ कर बंधन नव चरित्र अभीनीत कर सकें
निर्देशक ने पूर्ण कथानक निर्धारित कर रखा हुआ है
 

मैं कहानी गीतमय करने लगा हूँ

आपका ये तकाजा लिखूँ गीत मैं कुछ नई रीत के कुछ नये ढंग के
ज़िन्दगी की डगर में जो बिखरे पड़े, पर छुये ही नहीं जो गये रंग के
मैने केवल दिये शब्द हैं बस उन्हें सरगमों ने बिखेरा  जिन्हें ला इधर
कामना शारदा बीन को छोड़ कर राग छेड़े नये आज कुछ चंग पे
 
-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-o-

मैं कहानी गीतमय करने लगा हूँ 
 
था कहा तुमने मुझे यह ज़िन्दगी है इक कहानी
हर कड़ी जिसमें निरन्तर रह रही क्रम से अजानी
एक लेखक की कथानक के बिना चलती कलम सी
चार पल रुक, एक पल बहती नदी की बन रवानी
 
मैं तुम्हारे इस कथन की सत्यता स्वीकार करता
अनगढ़ी अपनी कहानी गीतमय करने लगा हूँ
 
चुन लिया अध्याय वह ही सामने जो आप आया
दे दिया स्वर बस उसी को, जो अधर ने गुनगुनाया
अक्षरों के शिल्प में बोकर समूची अस्मिता को
तुष्टि उसमें ढूँढ़ ली जो शब्द ने आ रूप पाया
 
जो टपकती है दुपहरी में पिघल कर व्योम पर से
या निशा में, मैं उसी से आँजुरी भरने लगा हूँ
 
रात की अंगड़ाईयां पुल बन गईं हैं जिन पलों का
आकलन करती रहीं आगत,विगत वाले कलों का
बुन रहे सपने धराशायी हुई हर कल्पना पर
हैं अपेक्षा जोड़ती ले बिम्ब चंचल बादलों का
 
ज्ञात होना अंकुरित नव पल्लवों का है जरूरी
इसलिये मैं आज पतझर की तरह झरने लगा हूँ
 
चेतना के अर्थ से क्या दूरियाँ अवचेतना की
मुस्कुराहट से रही कब दूरियाँ भी वेदना की
शाश्वतों से भंगुरों के मध्य में है भेद कितना
मौन से कितने परे हैं दूरियां संप्रेषणा की
 
देर तक छाया नहीं मिलती,  हवा की ओढ़नी से
मैं इसे स्वीकार करता धूप में तपने लगा हूँ- 

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...