पालकी रात की रिक्त कर दी विदा

होंठ के गीत सारे उड़ा ले गईं जब हवा की इधर से गई पालकी
धूप आकर उन्हें सोख कर ले गई जितनी परछाईयां थीं रहीं ताल की
शब्द बस हिचकिचाते हुए रह गौए बोल पाये नहीं कोशिशें कीं बहुत
और नजरें उदासी लिये तक रहीं त्यौरियां थीं चढ़ीं काल के भाल की

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गीत के गांव में द्वार खुलते नहीं
उंगलियां खटखटाते हुए थक गईं
लेखनी के समन्दर लगा चुक गये
भावनायें उमड़ती हुई रुक गईं
और हम अनलिखा पृष्ठ थामे हुये
बस नजर को उसी पर गड़ाते रहे
 
केन्द्र पर चक्र के रह गये हम रुके
दिन परिधि थाम कर दूर जाता रहा
रश्मियां छटपटाती धुरी पर रहीं
पूर्व आने के पल दूर जाता रहा
आ प्रतीची भी प्राची में घुलने लगी
रोशनी के बदलने लगे अर्थ भी
बाँह में एक पल थामने के लिये
जितने उपक्रम किये,वे रहे व्यर्थ ही
 
सूर्य के अर्घ्य को जलकलश थे भरे
द्वार मावस के उनको चढ़ाते रहे
 
रात के पृष्ठ पर तारकों ने लिखी
जो कहानी समझ वो नहीं आ सकी
नीड़ को छोड़ कर, लौट आती हुई
राग गौरेय्या कोई नहीं गा सकी
चाँद ने डाल घूँघट छिपा चाँदनी 
पालकी रात की रिक्त कर दी विदा
किन्तु वह रुक गई भोर  के द्वार पर
सोचते रह गये सब, भला क्या हुआ
 
अंशुमाली स्वयं बीज बोये हुए
ज्योति के, क्यारियों से चुराते रहे
 
बादलों ने ढकी धूप की कोंपलें
आवरण को हटा मुस्कुराई नहीं
शाख ने पैंजनी बांध ली  ओस की
आतुरा रह गई, झनझनाई नहीं
पंथ ने कोई पाथेय बांधा नहीं
नीड़ खोले बिना द्वार सोता रहा
और तय था घटित जो भी होना रहा
हम अपरिचित रहे और होता रहा

और हम बारह खानों में अटके हुए 
अंक, बस जोड़ते औ घटाते रहे 

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