सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन

सम्भव नहीं तोड़ कर बन्धन जीवन एक निमिष रह पाये
हर धड़कन, हर सांस और पल, कहीं किसी से बँधा हुआ है

पहली बार धड़कते दिल ने पह्ली बार आँख जब खोली
बांधे रही उसे उस पल से प्रीत भरी ममता के धागे
पहली बार प्रस्फ़ुटित स्वर ने सम्बोधन के रिश्ते जोड़े
तब ही से बन्धन अनगिनती ले ले कर अंगड़ाई जागे

कैसे भला तोड़ कर बन्धन पथे से कदम अग्रसर हो लें
उठने वाला एक एक पग, पथ पर ही तो सधा हुआ है

यौवन के वयसन्धि मोड़ पर दृष्टि साधना के सँवरे पल
उनकी अंगड़ाई ने जकड़ा तन को मन को सम्मोहित कर
कालचक्र के रुके हुये गतिक्रम में बन्दी हुई ज़िन्दगी
एक बिन्दु के होकर स्तंभित हुये समूचे निशि औ’ वासर

था मुमकिन यह नहीं तोड़ कर बन्धन ऐसे मोह पाश के
विमुख हो चले, क्योकि सृष्टिक्रम इस पर ही तो टिका हुआ है

जीवन की चढ़ती दोपहरी उलझी व्यवसायिक्ताओ में
रहा असंभव दामन कोई उससे दूर कभी रख पाये
एक राग था एक ताल में बंधी हुई थी पूरी सरगम
अवरोहो से पंचम तक सुर चाहे कितने खुल कर गाये

संभव नहीं तोड़ कर बंधन नव चरित्र अभीनीत कर सकें
निर्देशक ने पूर्ण कथानक निर्धारित कर रखा हुआ है
 

1 comment:

Udan Tashtari said...

क्या बात है- अद्भुत!!!

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