दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना

भाव उमड़े होंठ पर आ शब्द में लेकिन ढले ना
दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना
 
जो विगत था दे गया उपहार में बस प्रश्न लाकर
गुत्थियों ने चक्रव्यूहों में रखा उनको सजाकर
उत्तरों के भेद सारे नींद के संग उड़ गये थे
और आगत देखकर इनको रहा हँसता ठठाकर
 
बीज जितने बो रखे थे अंकुरित होकर फ़ले ना
दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना
 
रख रखीं उलझाये धारायें सभी अनुबन्ध वाली
ज़िन्दगी ने साथ हर पग पर दिया बन कर सवाली
उंगलियों को थामते हर मोड़ पर आकर अनिश्चय
मुट्ठियों ने एक चुटकी भर न सिकता भी संभाली
 
आस के प्रतिबिम्ब भी पल को मिले आकर गले ना
दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना
 
पाँव जब आगे बढे पीछे डगर ने थाम  खींचे
नींद से कर वैर सपने रह गए थे आँख मीचे
मानकों ने बादलों के पंख कंधों पर उगाये
छोड़ कर आकाश की गलियाँ नहीं आ पाए नीचे
 
हो कभी अनुकूल तारे चार पग सँग चले ना 
दीप चौखट पर रखे ही रह गए पल भी जले ना

प्रश्न करने लग गई निशिगन्ध

जब तुम्हारे कुन्तलों की वेणियों में फूल महके
प्रश्न करने लग गई निशिगन्ध उस पल मलयजों से
मोगरा गेंदा, चमेली, कौमुदी, कचनार जूही
और हरसिंगार के संग हो गुलाबों की महक भी
गुलमुहर की प्राथमिक अंगड़ाईयों से अधिक मोहक
कौन सी यह गंध, मनमोहक सुवासों से परे भी
दूब पत्ते लहर झरने  सब अधीरा उत्तरों को
कौन है उत्प्रेरणा बनता निरन्तर हलचलों पे
उम्र के कस्तूरिया पल दृष्टि अपनी है झुकाये
षोडसी दृग में बने पहले सपन ने आंख खोली
थरथराहट प्रथम चुम्बन की अपेक्षा में अधर की
थी ख्गिंची रक्तिम कपोलों पर प्रथम आ जो रंगोली

सब प्रतीक्षा ले खड़े हैं कोई तो संकेत आये
उद्गमों का जो पता दे मोहिनी इन कलकलों के
द्वार प्राची के लहरती चूनरी अरुणिं उषा की
चाँदनी का शाल ओढ़े दृष्टि कजरारी निशा की
सब लपेटे अचरजों को एक दूजे को निहारें
नववधू की उंगलियों पर नृत्यमय होती हिना भी

पूछते सब खोलता है कौन यह अध्याय नूतन
और लिखता नाम अपना देवपुर की सरगमों पे

होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानी

रश्मियाँ साथ ले जब दिवाकर का रथ चल दिया था इधर मुस्कुराता हुआ
रंग प्राची के चहरे का रक्तिम हुआ उस घड़ी जाने कैसे लजाते हुए
ओस ने रोशनी चूम कर छेड़ दी एक अंगडाई  लेती हुई कुछ धुनें
मंदिरों  में हुई  आरती  में   घुले कंठ के बोल फिर   गुनगुनाते  हुए
 
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हो अधीरा आस उत्सुक दृष्टि  से पथ जोहती हैं 
औ' प्रतीक्षा की घड़ी इक ढल गई लगता अयन में 
 
कोर पर आ होंठ के अँगड़ाईयाँ लेती कहानी
मुस्कुराहट की गली में खिलखिलाती रात रानी
और ठोड़ी से उचक कर पूछता तिल बात नथ से
ओढ़ कर सिन्दूर होगी किस घड़ी फिर रुत सुहानी
 
तब नयन के स्वप्न रँग देते कपोलों को पिघल कर
स्वर्ण अरुणिम आभ वाली बदलियाँ घिरतीं गगन में
 
भावना की कशमकश से जूझता मन वावरा सा
चित्र उजले पॄष्ठ पर सहसा उभरता सांवरा सा
झनझनाती हैं हवा की पैंजनी अंगनाईयों में
कोई परिचय एक पल में पास आता बांकुरा सा
 
उड़ परीवाली कथाओं का कोई अध्याय अन्तिम
आ अचानक रंग अनगिनती भरे जाता सपन में
 
दृष्टि जाकर के परे सीमाओं के रह रह अटकती
टिक नहीं पाती किसी भी बिन्दु पर फिर फिर भटकती
गंध बिखराती प्रतीक्षा की अगरबत्ती हजारों
गुनगुनी परछाइयों की ढेर सी कलियां चटखतीं 
 
आस के उमड़े हुए बादल बरसते हैं निरन्तर
और बोते हैं नई आकाक्षा पथ के विजन में

कितने दिन बीते

एक बात को ही दुहराते कितने दिन बीते
 
भोजपत्र पर बात वही होती आई अंकित
शिल्पकार ने पाषाणों में जिसे किया शिल्पित
जिसकी अर्क सुधा बरसाते मेघ कलश रीते
 
कविता और कहानी सबमें वह ही दुहराई
सरगम ने हर एक साज पर बस वह ही गाई
तुम को रहा सुनाता मैं भी वह ही मनमीते
 
दिवस महीने साल युगों के इतिइहासों में बन्द
वह ही महका करती है फूलों में बन कर गंध
जिसकी परछाईं में रहकर   भावुक मन जीते
 
उसी बात को बस दुहराते इतने दिन बीते

नए वर्ष के हे नव सूरज

आओ जीवन के नवल वर्ष
नव आशा से झोली भर दो दो 
बरसों से छाये तिमिरांचल 
को दे प्रकाश  दीपित कर दो 

जो अपनी संकीर्ण प्रवृति के 
हाथों बने हुए कठपुतली 
दूजों के इंगित पर निशिदिन 
नाच रहे हैं बन कर तकली 
उनके अंधियारों को अपने  
ज्योतिदान से करो प्रकाशित 
ताकि नहीं हो पाये फिर से 
उनके मन में तम आयातित 

नये वर्ष के नव पंछी को 
नया व्योम देकर नव पर दो 

निश्चित जीवन के नवल वर्ष
यों फूल उगाओ आँगन में
रंजित हो नहीं रक्त से इक
भी पृष्ठ तुम्हारे दर्पण में
सामन्ती अभिलाषाओं की
संस्कृतियाँ सभी समूल मिटें
सौहार्द्र द्वार पर पुष्पित हो
समृद्धि शांति चहुँ और दिखे

आकाँक्षा कोटि ह्रदय की यज
इस बरस, वर्ष पूरी कर दो
स्वागत जीवन के नवल वर्ष
अभिषेक तुम्हारा अक्षय हो

करते अपने इन सपनों का
श्रुंगार वर्ष बीते कितने
आंखों में बही उतरते हैं
अब आकर के दूजे सपने
इस बार नई कुछ साध नहीं
खाली झोली फ़ैलाते हैं
बूढ़ी होने को आई हैं
वे ही आशा दुहराते हैं

अपना मधुकलश तनिक छलका
दो बूँ आंजुरी में भर दो
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
सुख कोष  तुम्हाराअनवर हो

फिर करो अंकुरित नवल वर्ष
स्वर्णिम इतिहासों की वर्णित
अलकापुरोयों के एप्रतिकृतियाँ
हों गली गांव आकर सज्जित
पीड़ा के सज्ल क्षणों को तुम
कर दो शतवर्षी वनवासी
जनमानस के मस्तक रच दो
अनुकूल विभायें विधना की

जो तुमसे रहीं अपेक्षायें
इस बार सभी पूरी कर दो
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
सुख कोष  तुम्हाराअनवर हो

हे नये वर्ष के नव सूरज
सोनहली किरनें बिखाराओ
प्राची में और प्रतीची में
फ़िर उत्तर दक्षिण गुंजाओ
अपने घोड़ों की टापों से
हर दिन को सौंपो ताल नई
सपना फिर जागे हर सोया
हो सब साधों की चाल नई

फिर से सोनहले सपनों को
नव सूरज संजीवित कर दो
स्वागत जीवन के नवल वर्ष
अभिषेक तुम्हारा अक्षय हो

शब्द मेरे पास होते

शब्द मेरे पास होते एक मुट्ठी से अधिक तो
गीत मैं क्रम से लगा कर आपको मैं भेंट करता
 
शब्द जिनको मैं कहूँ अपना, सभी हैं उंगलियों पे
और दोहराते रहे हैं चन्द वे बातें पुरानी
एक पीपल,एक बरगद,एक पनघट, एक अँगना
तीर पर सुधि की नदी के गमगमाती रातरानी
 
शब्दकोशों से छुड़ाकर हाथ जो आ पाये मुझ तक
बस उन्हीं से रात दिन मैं बैठ कर हूँ बात करता
 
चाह तो हर रोज मेरा कोष संचय का बढ़े कुछ
और नूतन शब्द मेरे पास आयें बैठ जायें
सुर कोई भी जो उभर कर कंठ  से आये अधर तक
बस उन्हीं को गीत कर दें और झूमें गुनगुनायें
 
 टूट जाता हर घड़ी पर स्वप्न बनने से प्रथम ही
ताक पर किरचें उठा कर मैं सदा चुपचाप रखता
 
आपके जो पास हैं वे भी मुझे अक्सर लुभाते
किन्तु मुझको ज्ञात है विस्तार अपनी झोलियों का
जानता हूँ मिल गये तो साध रखना है असम्भव
है नजर अटकी निरन्तर राह तकती बोलियों का 
 
भावना के सिंधु में लहरें उमड़ती है निशदिन 
सोख लेती है सभी, अभिव्यक्ति की लेकिन विफलता 

सृजनकार का वन्दन कर लें

आज सिरज कर नव रचनायें  सृजनकार का वन्दन कर लें
और रचेता के अनगिनती रूपों काअ भिनन्दन कर लें

चित्रकार वह जो रंगों की कूची लेकर दृश्य  बिखेरे
नाल गगन पर लहरा देता सावन के ला मेघ घनेरे
बगिया के आँगन में टाँके  शतरंगी फूलों की चादर
शून्य विजन में जीवन भर कर नई नई आभायें उकेरे

उस की इस अपरिम कूची को  नमन करें हम शीश नवाकर
आओ कविता के छन्दों से सृजनकार का वन्दन कर लें

शिल्पी कितना कुशल रचे हैं ऊँचे पर्वत, नदी नालियाँ
चम्बल से बीहड़ भी रचता, खजुराहो की शिल्पकारियाँ
मीनाक्षी, कोणार्क, सीकरी, ताजमहल यमुना के तट पर
एलोरा की गुफ़ा , अजन्ता की वे अद्भुत चित्रकारियाँ

उसके जैसा शिल्पी कोई हो सकता क्या कहो कहीं भी
एक बार फिर उसको सुमिरन करते अलख निरंजन कर लें

सृजनकार वे जिनने सिरजे वेद पुराण उपनिषद सगरी
वेदव्यास, भृगु, वाल्मीकि  औ सनत्कुमारी कलम सुनहरी
सूरा-मीरा, खुसरो,नानक, विद्यापति, जयदेव, जायसी
तुलसी जिसने वर्णित की है अवधपति के हाथ गिलहरी

उनके पदचिह्नों पर चल कर पा जाये आशीष लेखनी
महकायें निज मन का आँगन, सांस सांस को चन्दन कर लें

उम्र की शाख से पत्र झरते रहे

वृक्ष तो छाँह के शेष सब होगये
उम्र की शाख से पत्र झरते रहे
हम भटकते हुए स्वप्न ले नैन में
सांझ से भोर की बात करते रहे
 
रात दिन ढूँढ़ते रह गये वे निमिष
जो हथेली में आकर रुके थे नहीं
ज़िद के पीपल घनेरे खड़े द्वार पर
टूट कर गिर गये पर झुके थे नहीं
मुट्ठियों में समर्पण रखा बन्द ही
खोलने का नहीं हमसे साहस हुआ
चाह हर पल पली जीत की चित्त में
पर न पासे उठा खेल पाये जुआ
 
मंज़िलें जो जुड़ीं थी अपेक्षाओं से
उनके पथ में कदम रखते डरते रहे
 
साँस सहमी रही द्वार पर आ खड़ी
हो गई थी स्वयं आके जब चाँदनी
शोर का भ्रम हुआ हर घड़ी जब बजी
गुनगुनाती हुई मोहिनी रागिनी
सूर्य तपता मरुस्थल का आ शीश पर
एक अहसास यह घेर रखे रहा
स्वर था असमंजसों में घिरा रह गया
चाहते थे मगर शब्द इक न कहा
 
रंग छू न सके तूलिका के सिरे
और हम रंग बिन रंग भरते रहे
 
बाँध ली लाल बस्ते में जब सांझ ने
धूप, उस पल दुपहरी की की कामना
थे शुतुर्मुर्ग से मुँह छिपाते रहे
हम चुनौती का कर न सके सामना
हम  बताते स्वयं को युधिष्ठिर रहे
अश्वत्थमा हतो फिर भी कहते रहे
अपना आधार कुछ था नहीं इसलिये
जो भी झोंका मिला,साथ बहते रहे
 
पंथ आसान था पर हमारे कदम
ठोकरें खाते,गिरते संभलते रहे
 
जानते थे कि कुछ चाहिये है हमें
चाहिये क्या मगर सोचते रह गये+
जब समय उंगलियों से फ़िसल बह गया
भाग्य की रेख को कोसते रह गये
हम समर्पण का साहस नहीं कर सके
 कर गईं इसलिये ही उपेक्षा वरण
चित्र उपलब्धि के सब अगोचर रहे
हट न पाया घिरा धुंध का आवरण
 
अपने आदर्श बदले नहीं पंथ में
और अवरोध थे, नित्य बढ़ते रहे
 
साधना है ,कभी ज़िन्दगी ये लगा
है ये माया का भ्रम,है तपस्या बड़ी
हम स्वयं को समझ पायें पल के लिये
सामने आ रही थी समस्या खड़ी
कोई परिचय नहीं हो स्वयं से सका
चाँद उगता रहा,  और  ढलता रहा
सांस के साथ आहुति बनीं धड़कनें
प्रश्न यज्ञाग्नि  सा नित्य जलता रहा
 
योग्यतायें नहीं आँक अपनी सके
दंभ के कुंभ दिन रात गढ़ते रहे
 
शब्द अटके रहे कंठ की वीथि में
होंठ पर आ तनिक न प्रकाशित हुए
भाव के पुष्प कट कर रहे गंध से
छोर अंगनाई के न सुवासित हुए
दृष्टि के कोण समतल रहे भूमि के
इसलिये आस उड़ न सकी व्योम में
शांति की कामनायें   ह्रदय में बसा
अग्नि सुलगा रखी सोम के रोम में
 
हो न संभव जो संभावनायें सकीं
बस उन्हीं में निरंतर उलझते रहे

ज़िंदगी की वाटिका में

ज़िंदगी की वाटिका में  चाह तो रोपे निरन्तर
तुलसियों को मंजरी पर उग रहीं हैं नागफ़नियाँ
 
नीर तट अभिमंत्रिता सौगन्ध से सींचा निशा दिन
बाड़ कर सम्बन्ध की बिलकुल अछूती डोरियों से
पल्लवन को छाँह में फ़ैलाईं पलकों की बरौनी
और सौंपा लाड़ प्रतिपल सरगमी कुछ लोरियों से
 
पर अपेक्षित पाहुनों के पांव अब तक उठ ना पाये
ताकते कितना रहे हम शून्य पथ पर टाँक अंखियाँ
 
नील नभ की वादियों में है विचरता मन पखेरू 
बादलों के पंख फैलाये हवा की झालरों पर 
बांह में भर कर धनक के रंग की आभाएँ अद्भुत 
ढूंढता विश्रांति के पल धूप वाली चादरों पर 
 
पर ठगी मौसम लुटेरा घात कर बैठा डगर पर 
हो गईं अपनी यहां के मोड़ पर हर राहजनियाँ 
 
रह गये बुनते घरौंदे याद के सैकता कणों से
नैन वाली जाह्नवी की धार में निशिदिन भिगोकर
दूर होकर के लगाई जो विगत ने, अड़चनों से
है सजाते मौक्त मणियों से जड़े सपने पिरोकर
 
पर ना जाने कौन अपनी उंगलियों के इंगितों से
काँच के टुकड़े बना देता,सजाईं हीर कनियाँ

गंध में भीगे हुए हैं

ज़िंदगी की वाटिका में जो हुए सुरभित निशा दिन 
वे सभी पल मित्रता की गंध में भीगे हुए हैं 


कर समन्वय नित्य  ही सौहार्द्र के स्वर्णिम क्षणों से 
जोड़ते है तार अपने मुस्कुराती वीथियों से 
बांधते हैं डोरियाँ नव सोच की बुन  कर निरंतर 
तोड  कर सम्बन्ध जर्जर रूढिवाली रीतियों से 

बन गए थाती संजोई जो नहीं अक्षुण्ण होती 
चाहे घट अनगिन निधी के शेष हो रीते हुए हैं 

जो जुड़े संदीपनी आकाश की परछाईयों में
सूर्या  अंशित से जुड़े कुरुराज के सम्बन्ध गहरे
पार्थ से जुड़ कर सहज वल्गायें थामी उंगलियों में
और किष्किन्धाओं पर जुड़ कर स्वत: ही पाँव ठहरे

इन सुगम अनुभूतियों की जब छलकतीं हैं सुधायें
याद के पुलकित हुयें पल अब उन्हें पीते हुये हैं

मोड़ पर आ ज़िन्दगी के दृष्टि मुड़ कर देखती है
सामने आते करीने से लगे घटनाओं के क्रम
सिर्फ़ कुछ दिखते निरन्तर स्वर्णमंडित मित्रता से
शेष पर केवल चढ़ा अपनत्व का  थोपा हुआ भ्रम


हाथ की रेखाओं में भी बन गये रेखायें गहरी
बस वही पल मित्रता के, शेष बस बीते हुये हैं.

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...