बस इतना है परिचय मेरा

बस इतना है परिचय मेरा
 
भाषाओं से कटा हुआ मैं
हो न सका अभिव्यक्त गणित वह
गये नियम प्रतिपादित सब ढह
अनचाहे ही समीकरण से जिसके प्रतिपल घटा हुआ मैं
जीवन की चौसर पर साँसों के हिस्से कर बँटा हुआ मैं
 
बस इतना है परिचय मेरा
 
इक गंतव्यहीन यायावर
अन्त नहीं जिसका कोई, पथ
नीड़ नहीं ना छाया को वट
ताने क्रुद्ध हुए सूरज की किरणों की इक छतरी सर पर
चला तोड़ मन की सीमायें, खंड खंड सुधि का दर्पण कर
 
बस इतना है परिचय मेरा
 
सका नहीं जो हो परिभाषित
इक वक्तव्य स्वयं में उलझा
अवगुंठन जो कभी न सुलझा
हो पाया जो नहीं किसी भी शब्द कोश द्वारा अनुवादित
आधा लिखा एक वह अक्षर, जो हर बार हुआ सम्पादित
 
बस इतना है परिचय मेरा

नाम है आपका

भोर में शब्द ने पंछियों के स्वरों में
कहा गूँज कर नाम है आपका
शाख ने बात करते हुए डूब से
मुस्कुराकर कहा नाम है आपका
शांत सोई हुई झील के होंठ पर
आके ठहरी हुई फूल की पंखरी
यों लगा दर्पणों ने लिखा वक्ष पर
बिम्ब बन कर स्वयं नाम है आपका

पेड़ की पत्तियों से छनी धूप ने
छाँह पर नाम लिख रख दिया आपका
थाल पूजा का चूमा खिली धूप ने,
ज्योति बो नाम को कर दिया आपका
धूप ने बात करते हुये बूँद से,
आपके नाम को इन्द्तधनुषी किया
सांझ को धूप ने घर को जाते हुये,
रंग गालों पे ले रख लिया आपका.

जब गीतों को गाकर मेरे

कल्पवृक्ष की कलियों ने जब पहली बार नयन खोले थे
पुरबाई के झोंके पहली बार नाम कोई बोले थे
प्रथम बार उतर कर गिरि से नदिया कोई लहराई थी
पहली बार किसी पाखी ने जब उड़ने को पर तोले थे
 
हुलस गए हैं वे सारे पल आकर के मेरी नस नस में
दृष्टि तुम्हारी से टकराए मीत नयन जब जाकर मेरे
 
पिघली हुई धूप छिटकी हो आकर जैसे ताजमहल पर
क्षीर सिन्धु में प्रतिबिंबित हो कर चमका जैसे पीताम्बर
हिम शिखरों पर नाच रही हो पहली किरण भोर की कोई
थिरक रही हों सावन की झड़ियाँ जैसे आ कर चन्दन पर
 
लगा ओढ़ कर बासंती परिधान तुषारी कोई प्रतिमा
अंगनाई में खडी हो गई अनायास ही आकर मेरे
 
सुधियों में यूँ लगा सुधायें आकर के लग गई बरसने
भावो के कंचन को कुन्दन किया किसी अनुभूत छुअन ने
सांसों के गलियारे में आ महक उठीं कचनारी कलियाँ
पल पल पुलकित होती होती धड़ाकन धड़कन लगी हरषने
 
लगे नाचने सरगम के सातों ही सुर आकर बगिया में
तुमने उनको जरा सुनाया जब गीतों को गाकर मेरे
 
मिलीं दिशायें ज्योंकि उपग्रही संसाधन से हो निर्देशित
अकस्मात ही अर्थ ज़िन्दगी के कुछ नये हुए अन्वेषित
लक्ष्य, साध के ध्येय प्रेम के आये समझ नये फिर मानी
जीवन का हर गतिक्रम होने लगा तुम्हीं से प्रिय उत्प्रेरित
 
गुँथे आप ही आप सुशोभित होकर के इक वरमाला में
जितने फूल सजाये तुमने गुलदानों में लाकर मेरे

गीत गाता रहा

कोई बैठा हुआ सांझ के खेत में
ढल रही धूप के तार को छेड़ते
चंग टूटा हुआ इक बजाता रहा
गीत गाता रहा
 
दूर  चौपाल ने कितनी आवाज़ दीं
फूल पगडंडियाँ थीं बिछाती रहीं
जेहरों पे रखीं पनघटों की भरी
कलसियां थीं निमंत्रण सजाती रहीं
किन्तु अपनी किसी एक धुन में मगन
आँख में आँज कर कुछ अदेखे सपन
नींद की सेज पर सलवटों को मिटा
चान्दनी, चाँदनी की बिछाता रहा
गीत गाता रहा
 
स्वर्णमय आस ले झिलमिलाते रहे
पास अपने सितारे बुलाते रहे
तीर मंदाकिनी के सँवरते हुए
रास की भूमिकायें बनाते रहे
चाँद का चित्र आकाश में ढूँढ़ता
काजरी रात का रंग ले पूरता
दूर बिखरे क्षितिज की वो दहलीज पर
अल्पनायें नयी कुछ सजाता रहा
गीत गाता रहा
 
पास पाथेय सब शेष चुकने लगा
नीड़ आ पंथ पर आप झुकने लगा
शेष गतियाँ हुईं वृक्ष की छाँह में
एक आभास निस्तब्ध उगने लगा
संग चरवाहियों के चला वो नहीं
भ्रम के भ्रम से कभी भी छला वो नहीं
शाख पर कंठ की रागिनी के, बिठा
शब्द को वे हिडोले झुलाता रहा
गीत गाता रहा

ज़िन्दगी है रेशमी साड़ी

ज़िन्दगी है रेशमी साड़ी जड़ी इक चौखटे ,में
बुनकरों का ध्यान जिससे एक दम ही हट गया है
पीर के अनुभव सभी हैं बस अधूरी बूटियों से
रूठ कर जिनसे कशीदे का सिरा हर कट गया है

है महाजन सांस का लेकर बही द्वारे पुकारे
और मन ये सोचता है किस तरह नजरें छुपाये
आँख का आँसू निरन्तर चाहता है हो प्रकाशित
शब्द की ये चाहना है गीत कोई नव सजाये
गीत मन के सिन्धु से जो रोज उमड़े हैं लहर बन
आज ऊपत आ नहीं पाते कहीं पर रुक गये हैं
भावनाओं के हठीले देवदारों के सघन वन
दण्डवत भूशायी हो कर यों पड़े ज्यों चुक गये हैं

दर्द के इक कुंड में जलता हुआ हर स्वप्न   चाहे
कोई आकर सामने स्वाहा स्वधा के मंत्र गाये
पर न जाने यज्ञ के इस कुंड से जो उठ रहा था
हो हविष नभ, को शुंआ वो लग रहा है छंट गया है

धड़कनें बन कर रकम, लिक्खी हुईं सारी , बकाया
रह गईं जो शेष उनको नाम से जोड़ा गया है
एक जो अवसाद में उलास के टांके लगाता
रेशमी धागा, निरन्तर सूत कर तोड़ा गया है
नीलकंठी कामनायें विल्वपत्रों की प्रतीक्षित
पर सजाया है उन्हें आकर धतूरे आक ने ही
राजगद्दी ने जिन्हें वनवास खुद ही दे दिया हो
हो सके अभिषेक उनके, बस उमड़ती खाक से ही

कोस बिख्री सांस के अक्षम हुए लम्बाई नापें
साढ़साती घूम कर फिर आई कितनी बार मापें
उंगलियों पर आंकड़ों का अंक जितनी बार जोड़ा
एक केवल शून्य हासिल, और सब कुछ घट  गया है

कल्पना के पाखियों के पर निकलने से प्रथम ही
कैद करने लग गया सय्याद से दिन जाल लेकर
चाँद के तट तक पहुँचने की उमंगें लड़खड़ाती
ले गई है सांझ वापस, रात की हर नाव खे कर
खूँटिया दीवाल पर नभ की जड़ी थीं जगमगाती
शिल्पियों ने फिर अमावस के, पलस्तर फेर डाला
यामिनी के राज्य ने षड़यंत्र रच कर भोर के सँग
पूर्व की गठरी बँधी में से चुरा डाला उजाला

आस पल पल जोड़ कर संचित करें कुछ आज अपना
आँजने लगती पलक  की कोर पर ला कोई सपना
किन्तु मायावी समय के सूत्र की पेचीदगी में
घिर, रहा जो पास में था, आज सारा बँट गया है

गीत वे ही आज रचना चाहता हूँ


गीत जो साहित्य की दहलीज पर जा झिलमिलायें
गीत जो टीका समय के भाल पर जाकर लगायें
गीत जिनको गुनगुनाने के लिये हों होंठ आतुर
गीत जो हर इक किरन के साथ मिल कर जगमगायें
 
 
गीत! हाँ मैं गीत वे ही आज रचना चाहता हूँ
 
 
स्वप्न वे जो आस बुनती है रही भीगे नयन में
स्वप्न वे जिनकी हुई तय परिणति बस इक अयन में
स्वप्न जिनको सुरमई करती प्रतीची आरुणी हो
स्वप्न जिनसे भोर का तारा सजा रहता शयन में
 
 
स्वप्न ! हाँ मैं स्वप्न बन वे, नयन अँजना चाहता हूँ
 
 
शब्द जिनको कह नहीं पाये अधर वे थरथराते
शब्द जिनका अर्थ पाने के लिये स्वर छटपटाते
शब्द जिन के कोष में हो ज्ञान शत मन्वन्तरों का
शब्द जिनके स्पर्श को सुर सरगमों के झनझनाते
 
 
शब्द ! हाँ मैं शब्द बन वे कंठ बसना चाहता हूँ
 
 
भाव जिनके सिन्धु में लेतीं हिलोरें लहर प्रतिपल
भाव नव अनुभूतियों का जो बने हर बार सम्बल
भाव जो अभिव्यक्त होकर भी सदा हैं पास रहते
भाव जो निस्पन्द होकर भी रहे स्वच्छंद चंचल
 
 
भाव ! हाँ मैं भाव वे बन उर संवरना चाहता हूँ

कितना खोया है कितना पाया है

शाख कलम की फूल अक्षरों के जब नहीं खिला पायेगी
छन्दों में जब ढल न सकेंगी,उमड़ भावनायें अंत:स की
वाणी नहीं गीत गायेगी,डुबो रागिनी में स्वर लहरी
और दृष्टि से कुछ कहने की कला न रह पायेगी बस की
 
 
ओ सम्बन्धित ! क्या तब भी तुम मुझ से यह संबंध रखोगे
जो हर बार गीत को मेरे नया याम देता आया है
 
कल क्या होगा भान न इसका मुझको है, न है तुमको ही
हो सकता है कलम उठाने में हो जायें उंगलियाँ अक्षम
हो सकता है मसि ही चुक ले लिखते हुए दिवस की गाथा
या हो सकता चुटकी भर में जो यथार्थ लगता,होले भ्रम
 
कल परछाईं जब अपनी ही साथ छोड़ जाये कदमों का
क्या तुम तब भी दे पाओगे वह सावन,जो बरासाया है
 
कल मरुथल की उष्मा बढ़कर सोखे यदि भावों का सागर
नुचे परों वाले पाखी सी नहीं कल्पनायें उड़ पायें
मन हो बंजर और धरातल पर न फूटे कोई अंकुर
क्षितिज पार के ज्ञान वृत्त जब सहसा मुट्ठी में बँध जायें
 
कल जब अधर न बोलें कुछ भी महज थरथरा कर रह जायें
क्या तुम वह सब दुहराओगे,जो मैने अब तक गाया है
 
शब्दों को स्वर देने वाला, उनका रचनाकार अगर कल
मुझे बना कर नहीं रख सके, अपनी रचनाओं का माध्यम
तो क्या संभव चीन्ह सकोगे मुझको कहीं भूल से चाहे
इस अनंत में जहां ,रहा अस्तित्व सूक्ष्मतम अणु से भी कम
 
अंत आदि में कल जब मिश्रित हो जाये तो क्या संभव है
तुम कर सको आकलन कितना खोया है कितना पाया है

मंगल दीप जलाया क्यों था

तुमको अगर चले जाना था
राहों में अंधियारा भर के
संझवाती का तो फिर तुमने
मंगल दीप जलाया क्यों था
 
 
मुट्ठी भरे गगन पर अपने
स्वीकृत मुझको रही घटायें
चाहा नहीं भटक कर राहें
ही आ जायें चन्द्र विभायें
मैं व्यक्तित्वहीन सिकता का
अणु इक चिपका कालचक्र से
अपने तक ही सीमित मैने
रखीं सदा निज व्यथा कथायें
 
तुमने नहीं ढालना था यदि
अपने सुर की मृदु सरगम में
मेरे बिखरे शब्दों को फिर
तुमने गीत बनाया क्यों था
 
बदलीं तुमने परिभाषायें
एक बात यह समझाने को
चुनता है आराध्य,तपस्वी
अपनी पूजा करवाने को
राहें ही देहरी तक आतीं
पा जातीं जब नेह निमंत्रण
बादल भी आतुर होता है
नीर धरा पर बरसाने को
 
जो तपभंग नहीं करना था
मेरे विश्वामित्री मन का
तो फिर कहो मेनका बनकर
तुमने मुझे रिझाया क्यों था
 
नियति यही थी सदा रिक्त ही
रही मेरी कांधे की झोली
एक बार भी सोनचिरैय्या
आकर न आँगन में बोली
किस्सों में ही पढ़ी धूप की
फैली हुई सुनहरी चादर
धुन्ध कुहासे दिखे लटकते
जब भी कोई खिड़की खोली
 
तुमको नींद चुरा लेनी थी
मेरी इन बोझिल रातों की
तो पलकोंपर सपने का भ्रम
लाकर कहो सजाया क्यों था

विमुख सभी सम्बन्ध हो गये

एक द्वार था केवल जिससे अटकी हुई अपेक्षायें थीं
जीवन के उलझे गतिक्रम ने उसके भी पट बन्द हो गये
 
कथा एक ही दुहराई है हर इक दिन ने उगते उगते
आक्षेपों के हर इक शर का लक्ष्य हमीं को गया बनाया
जितने भी अनकिये कार्य थे वे भी लिखे नाम पर अपने
बीजगणित का सूत्र अबूझा रहा,तनिक भी समझ न आया
 
कभी किसी से स्पष्टिकरण की चर्चायें जैसे ही छेड़ीं
अनायास ही अधर हमारे पर अनगिन प्रतिबंध हो गये
 
नयनों के दर्पण तो दिखलाते ही रहे बिम्ब जो सच थे
पता नहीं कैसे भ्रम ने आ उन पर भी अधिकार कर लिया
शेष नहीं था मार्ग इसलिये नीलकंठ के अनुगामी हो
जो कुछ मिला भाग में अपने, हमने अंगीकार कर लिया
 
किन्तु न जाने छिन्दर्न्वेषी समयचक्र की क्या इच्छा थी
निर्णय सभी हवा के पत्रों पर अंकित अनुबन्ध हो गये
 
बन कर छत्र निगलता आया दिनकर परछाईं भी अपनी
लहरें रहीं बहाती पग के नीचे से सिकता को पल पल
दिशा बोध के चिह्न उड़ाकर सँग ले गईं दिशायें खुद ही
लगा रूठने निमिष निमिष पर धड़कन से सांसों का संबल
 
तुलसी पत्रों गंगाजल की रही तोड़ती दम अभिलाषा
विमुख स्वयं ही से अब जितने अपने थे सम्बन्ध हो गये

अब चुप होकर मैं

थमे हवा के झोंके छत के कमरे में बैठे
लहरें छुपीं रहीं जाकर पर्वत के कोटर में
तारों पर झंकार नींद से होड़ लगा सोई
सोच रहा हूँ बैठूं थोड़ा अब चुप होकर मैं


पीपल बरगद चन्दन पानी
लहराते निर्झर
यज्ञभूमि वेदी आहुतियाँ
संकल्पों के स्वर
निष्ठा और आस्था संस्कृतियों
की गाथाएँ
मन्त्रों मेम गुन्थित जीवन की
सब परिभाषाएं
 
 
लिखते लिखते बिखर गई है चादर पर स्याही
जिसे उठा कर सोच रहा हूँ,रख दूं धोकर मैं
 
सपनों के अनुबन्ध और
सौगन्धें अयनों की
रतनारे,कजरारे,मदमय
गाथा नयनों की
गठबन्धन,सिन्दूर,मुद्रिका
पैंजनिया कंगन
चौथ,पंचमी,पूनम,ग्यारस
अविरल आयोजन
 
दोहराते बीते जीवन की निधि का रीतापन
सोच रहा हूँ चलूँ और अब कितना ढोकर मैं
खुले अधर के मध्य रह गईं
बिना कहे बातें
मौसम साथ न जिनको लाया
वे सन सौगातें
क्यारी,फूल,पत्तियाँ,काँटे
भंवरों का गुंजन
अलगोजे की तान-अधूरी
पायल की रुनझन
 
सब सहेज लेता अनचाहे यायावरी समय
सोच रहा क्या पाऊंगा,फ़िर से यह बोकर मैं

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...