गीत वे ही आज रचना चाहता हूँ


गीत जो साहित्य की दहलीज पर जा झिलमिलायें
गीत जो टीका समय के भाल पर जाकर लगायें
गीत जिनको गुनगुनाने के लिये हों होंठ आतुर
गीत जो हर इक किरन के साथ मिल कर जगमगायें
 
 
गीत! हाँ मैं गीत वे ही आज रचना चाहता हूँ
 
 
स्वप्न वे जो आस बुनती है रही भीगे नयन में
स्वप्न वे जिनकी हुई तय परिणति बस इक अयन में
स्वप्न जिनको सुरमई करती प्रतीची आरुणी हो
स्वप्न जिनसे भोर का तारा सजा रहता शयन में
 
 
स्वप्न ! हाँ मैं स्वप्न बन वे, नयन अँजना चाहता हूँ
 
 
शब्द जिनको कह नहीं पाये अधर वे थरथराते
शब्द जिनका अर्थ पाने के लिये स्वर छटपटाते
शब्द जिन के कोष में हो ज्ञान शत मन्वन्तरों का
शब्द जिनके स्पर्श को सुर सरगमों के झनझनाते
 
 
शब्द ! हाँ मैं शब्द बन वे कंठ बसना चाहता हूँ
 
 
भाव जिनके सिन्धु में लेतीं हिलोरें लहर प्रतिपल
भाव नव अनुभूतियों का जो बने हर बार सम्बल
भाव जो अभिव्यक्त होकर भी सदा हैं पास रहते
भाव जो निस्पन्द होकर भी रहे स्वच्छंद चंचल
 
 
भाव ! हाँ मैं भाव वे बन उर संवरना चाहता हूँ

2 comments:

Shardula said...

गीत जिनको गुनगुनाने के लिये हों होंठ आतुर

गीत! हाँ मैं गीत वे ही आज रचना चाहता हूँ

स्वप्न वे जो आस बुनती है रही भीगे नयन में
स्वप्न जिनसे भोर का तारा सजा रहता शयन में

स्वप्न ! हाँ मैं स्वप्न बन वे, नयन अँजना चाहता हूँ

शब्द जिन के कोष में हो ज्ञान शत मन्वन्तरों का
शब्द जिनके स्पर्श को सुर सरगमों के झनझनाते

शब्द ! हाँ मैं शब्द बन वे कंठ बसना चाहता हूँ

भाव जिनके सिन्धु में लेतीं हिलोरें लहर प्रतिपल
भाव नव अनुभूतियों का जो बने हर बार सम्बल
भाव जो अभिव्यक्त होकर भी सदा हैं पास रहते
भाव जो निस्पन्द होकर भी रहे स्वच्छंद चंचल

भाव ! हाँ मैं भाव वे बन उर संवरना चाहता हूँ

प्रवीण पाण्डेय said...

अनुपम रचना, हर कवि के स्वप्नों को सुगढ़ता से उकेरा है आपने।

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...