अनुभूतियाँ मिलती नहीं हैं

दोपहर से आँख मलता है दिवस लेते उवासी
सांझ हो पाती नहीं है और थक कर बैठ जाता
सीढ़ियों पर पांव रखता है अधर की सकपकाते
इसलिये ही शब्द छूता ना स्वरों को,लड़खड़ाता
 
 
वृत्त में चलती हुई सुईयाँ घड़ी की - ज़िन्दगी है
केन्द्र से जो बँध न रहलें,खूँटियाँ मिलती नहीं हैं
 
 
आस सूनी मांग ले पल के निधन पर छटपटाती
कामना की झोलियाँ फिर कल्पना के द्वार फ़ैला
फिर वही गतिक्रम,विखंडित स्वप्न कर देता संजोये
और टँगता कक्ष की दीवार पर फिर चित्र पहला
 
 
है वही इक पीर,घटनाक्रम वही, आंसू वही हैं
और अब नूतन कहीं अनुभूतियाँ मिलती नहीं हैं
 
 
होलियाँ, दीवालियाँ  एकादशी और’ पूर्णिमायें
कौन कब आती नजर के दूर रह कर बीत जाती
सावनी मल्हार फ़ागुन की खनकती  थाप ढूँढ़े
कोई भी पुरबा ई मिल पाती नहीं है गुनगुनाती
 
 
द्वार के दोनों तरफ़ हैं पृष्ठ कोरे भीतियों के
रँग सकं उनमें कथानक,बूटियाँ मिलती नहीं है

रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे


स्वप्न की वीथियों में उगे फूल बन
रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे
फिर अवनिका-पटल चित्र करने लगा
बिम्ब बनते हुये जब गगन से झरे
 

कोई सूरजमुखी में बदल रह गया
कोई करने लगा भोर पीताम्बरी
पोर पर आ कोई हल्दिया बन गया
कोई पुरबाईयाँ कर गया केसरी
हँस पड़ा कोई भुजपाश ले गुलमुहर 
कोई कचनार सा खिलखिलाने लगा
और थामे हुये रश्मियाँ धूप की
कोई आ झील पर झिलमिलाने लगा
 

बाँह  मौसम ने फ़ैलाई जितनी अधिक
दृश्य आ आके उतने ही उनमें भरे
 

वाखरों पर नयन की खड़े ओढ़ ला
मौसमों की गली से नये आवरण
सावनी एक मल्हार पहने हुये
फिर कली पर बुने कुछ नये आभरण
तीर नदिया के जलते हुये दीप की
वर्तिका की तरह नृत्य करते हुये
झोलियों में संजोये हुये बिम्ब को
चित्र दहलीज पर कर के रखते हुये
 

नभ सलिल से जो रजताभ कण चुन लिये
वाटिकाओं की ला वीथियों में धरे
 

वेणियों पर उतर आ गये रूप की
मोतियों में गुँथे,मोगरे से सजे
और हथफूल को केन्द्र करते हुये
कंगनों को पकड़ घुँघरुओं से बजे
टेसुई आभ होकर अलक्तक बने
फिर हिना से हथेली रचाने लगे
पांखुरी पांखुरी हो बिछे सेज पर
और फ़िर कामनायें सजाने लगे


हो गए शिल्प नूतन पुन: आस के
 चेतना में घुली कल्पना के परे 

स्वर उमड़ते कंठ


स्वर उमड़ते कंठ से न छू सके कभी अधर
कोर पर सिमट के रह गया है अश्रु का सफ़र
दृष्टि की गली में कोई पाहुना ना आ सका
अजनबी से मोड़ पे आ ज़िन्दगी गई ठहर
 
सामने नहीं है शेष कोई भी तो कामना
बज रहा है द्वात्र पर अतीत का ही झुनझुना
आ खड़े हैं पास में वे पंथ मानचित्र के
दंभ ने जिन्हें स्वयं के वास्ते नहीं चुना
 
कल्पना के पाखियों के पंख सारे झर गये
घिर तमस के मेघ नैन का वितान भर गये
अस्स की किरन  को लील कर दिशायें हँस पड़ीं
एक बिन्दु पर अटक के थम सभी प्रहर गये
 
मंदिरों के द्वार दीप एक भी जला नहीं
भाग्य था गुणित परन्तु अंश भी फ़ला नहीं
चाँदनी ने गीत जितने रात जाग कर लिखे
पंखुरी के कंठ स्वर में एक भी सजा नहीं
 
भोर का लिखा सँदेस एक भी ना पढ़ सके
खिंच रही थी रेख को ना पाँव पार कर सके
तीर की उड़ान के परे रहे थे लक्ष्य सब
आँधियों के सामने न निश्चय देर टिक सके

थी किताब वेड की जो ब्रह्मलीन हो गई 
तेर बांसुरी की लग रहा है क्षीण हो गई
 मंत्र अपने उच्चारण से हो गए अलग लगा 
तार सब बिखर चुके हैं मौन बीन हो गई 

हुए हैं हाथ बाध्य अब मशाल दीप्त नव करें 
अवनिकाएं सब हटायें औ प्रकाश नभ भरें 
जो प्राप्ति संचयित हुई है ज़िंदगी के द्वार से 
उसे नवीन आस कर के आंजुरी में हम धरें 

खुलते तो हैं पृष्ठ

खुलते तो हैं पृष्ठ हवा को छूकर इस मन की पुस्तक के
सुधियों वाली जो संध्या की गलियों में टहला  करती है
पी जाती है पर आंखों में तिरती हुई धुंध शब्दों को
और रिक्तता परछाई बन  कर आंगन में आ तिरती है
 
 
हो जाती है राह तिरोहित, अनायास ही चलते चलते
एक वृत्त में बन्दी बन कर लगता है पग रह जाते हैं
अधरों पर रह रह कर जैसे कोई बात लरज जाती है
लेकिन समझ नहीं आ पाता उमड़े स्वर क्या कह जाते हैं
 
 
बिखराने लगता है चढ़ता हुआ अंधेरा स्याही जैसे
सपनों की दहलीजों पर बन ओस फ़िसलती है गिरती है
और मौन की प्रतिध्वनियां बस देखा करती प्रश्न चिह्न बन
जैसे ही तारों से कोई तान बांसुरी की मिलती है
 
 
भटकन लौट लौट  कर आती है टकराते हुये क्षितिज सेे
आकारों के आभासों से जुड़ता नहीं नाम कोई भी
दीपक रोज जला कर रखता है दिन ला अपने आले में
मुट्ठी में भर रख लेती है उसकी रश्मि सांझ  सोई सी
 
 
हँसिये का आकार चाँद ले लेता हाथ रात का छूकर
सपनों के पौधे उग पाने से पहले ही कट जाते हैं
बिखरे हुये विजन की गूँगी आवाज़ों को खोजा  करते
अवगुंठित हो इक दूजे में निमिष प्रहर सब घुल जाते हैं

जब कथानक गया इस कथा का लिखा

बन गईं लेखनी रश्मियाँ भोर की
आज लिखने लगी इक नई फिर कथा
हो गये हैं इकत्तीस पूरे बरस
जब कथानक गया इस कथा का लिखा
 
 
अजनबी एक झोंका हवा का उड़ा
दो अपरिचित सहज गये पास में
दृष्टि से दृष्टियों ने उलझते हुये
एक दूजे को बाँधा था भुजपाश में
पंथ दो थे अलग, एक हो घुल गये
पग बढ़े एक ही रागिनी में बँधे
लक्ष्य के जितने अनुमान थे वे सभी
एक ही बिन्दु को केन्द्र करते सधे
 
 
एक ही सूत्र है धड़कनों जोड़ता
हर सितारा गया मुस्कुरा कर बता
 
 
भोर उगती रहीं सांझ ढलती रहीं
सांस के साथ सांसें लिपटती रहीं
दोपहर नित नये आभरण ओढ़ती
प्रीत की धूप पीती सँवरती रही
स्वप्न चारों नयन के हुये एक से
एक ही कामना परिणति की रही
साथ मिलकर के दो आंजुरि एक हो
यज्ञ में आहुति साथ देती रहीं
 
 
प्राण दो थे मगर एक हो जुड़ गये
एक से जब विलग दूसरा कुछ था
 
 
तय किये पंथ फ़ैले हुये दूर तक
पग चले साथ अवलम्ब बनते हुये
जेठिया धूप की चादरें थीं तनी
चाँदनी थी सितारों से छनते हुये
हर अपेक्षा की उड़ती हुये पांख को
बांध रक्खा समन्वय की इक डोर से
कर समर्पित रखे भावना के प्रहर
पांव में उद्गमों के प्रथम छोर पे
 
 
आज जीवन्त फिर से हुई कामना
साथ बस एक यह प्राप्त होवे सदा

नाम थी आज की सभ्यता लिख गई

इक सड़क के किनारे पे बिखरे पड़े
फ़्रेन्च फ़्राई के कन्टेनरों पे छपा
नाम थी आज की सभ्यता लिख गई
कोशिशें की बहुत,पर नहीं पढ़ सका
 
 
विश्व पर्यावरण दिन मनाया था कल
खूब नारे लगे खूब जलसे हुये
रोक लगना जरूरी, न दूषण बढ़े
बात उछली हवाओं में चलते हुये
रिक्त पानी की बोतल गिरीं पंथ में
चिप्स के बैग बन कर पतंगें उड़े
हर डगर पर यही चिह्न छोड़ा किये
पांव चलते हुये जिस तरफ़ भी मुड़े
 
 
स्वर उमड़ता हुआ करता उद्घोष था
भोर से सांझ बीती,नहीं पर थका
 
 
एक टुकड़ा हरी घास बाकी रहे
एक आँजुरि रहे स्वच्छ जल की कहीं
अगली पीढ़ी को देनी विरासत हमें
लेवें संकल्प अस्मर्थ हंवे नहीं
बस यही सोच ले, कैन थी हाथ में
कोक की पेप्सी और स्प्राईट की
खाली होते किनारे उछाला उन्हें
बात उनके लिये यह सहज राईट थी
 
 
ध्यान से मैं मनन अध्ययन कर रहा
पर समझ आ नहीं पाया ये फ़लसफ़ा
 
 
दीप तो बाल कर रख लिया शीश पर
पर तले का अंधेरा न देखा तनिक
दृष्टि दहलीज के बार जब भी गयी
अंश था काल का एक ही वह क्षणिक
जिस नियम को बनाने का जयघोष था
मात्र वे सब रहे दूसरों के लिये
उनके आगे कभी आ न दर्पण सका
सोच के वे बदलते रहे जाविये
 
 
दायां कर एक उपदेश की मुद्रिका
बायें से खेलते है नियति से जुआ.
 

दीप दीपावली के जलें इस बरस

भोर की रश्मियों की प्रखरता लिये दीप दीपावली के जलें इस बरस
रक्त-कमलासनी के करों से झरे,आप आशीष का पायें पारस परस
ऋद्धि सिद्धि की अनुकूल हों दृष्टियाँ साथ झंकारती एक वीणा रहे
भावनाओं में अपनत्व उगता रहे, क्यारियाँ ज़िन्दगी की रहें सब सरस



 

जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए
नवीन वर्तिकाओं से सजे हुए नए दिए
नए ही स्वप्न आँजती है आँख फिर से इस बरस 
जो अंकुरित हो आस वो बरस के अंत तक जिए

रची पुरबि के द्वार पर नवीन आज कल्पना 
न अब रहे ह्रदय कहीं पे   कोई भी हो अनमना 
उगे जो भोर निश्चयों के साथ यात्राओं के 
डगर के साथ अंश हों नवीन वार्ताओं के 
न व्यस्तता की चादरों से दूर एक पल रहे 
औ' आज ही भविष्य हो गया है आन कल कहे 
न नीड़  के निमंत्रणों से एक पल कोई छले 
औ लक्ष्य पग के साथ अपने पग मिला मिला चले

हैं मंत्रपूर सप्तानीर आंजुरी में भर लिए
जले हैं फिर से इस बरस हजार कामना लिए

जो कामनाएँ हैं मेरी, वही रहें हों आपकी 
ये डोरियाँ जुड़ी रहें सदा हमारे साथ की 
न मैं में तुम में भेद हो,जो तुम कहो वो मैं कहूं 
तुम्हारी भावना प्रत्येक साथ साथ मैं सहूँ 
यों  तुम से मैं जुडू  कि  भेद बीच आप का हेट 
बढ़ा है भ्रम में डूब कर  समस्त फासला कटे 
चले थे साथ पंथ जिस पे एक दिन,पुन:: चलें 
जो खंड हिम के बीच आ गए सभी के सब गलें

न फिर से कोई रह सके अधर पे मौन को लिए 
जले हैं दीप पर्व पर नए ही इस बरस दिए

सुनो जो कह रहीं हैं आज वर्तिकाएँ थरथरा
 उठो तो अन्धकार का परस रहे डरा डरा
चलो तो दूरियाँ क्षितिज की इक कदम में बंद हों
 बढ़ो तो हाथ थामने को मंजिलों में द्वन्द हों 
हैं प्राप्ति के पलों की उंगलियाँ तुम्हारे हाथ में
अमावसी निशा भले, जले हैं दीप साथ में 
लगा रहीं हैं अल्पनायें स्वस्ति कल के भाल पर 
लिखा है हल उठे हुए नजर के हर सवाल पर

सितारे आसमान पर जलें तुम्हारे ही लिए 
खड़ा  हूँ  दीप पर्व पर यही मैं कामना लिए।

सब कुछ ठीक ठाक है


सांझ अटक कर चौराहे पर पीती रही धुंआ ज़हरीला
बूढ़े  अम्बर का जर्जर तन हुआ आज कुछ ज्यादा पीला
पीर पिघल कर बही नयन से घायल हुई घटाओं की यों
पगडंडी का राज पथों का सब ही का तन मन है गीला
बान्धे रहा राजहठ लेकिन पट्टी अपने खुले नयन पर
कहते हुये चिह्न उन्नति के हैं ये, सब कुछ ठीक ठाक है
 
 
मौसम की करवट ने बदले दिन सब गर्मी के  सर्दी के
बसा  लिया है सावन ने अब अपना घर सूने मरुथल में
सिन्धु तीर पर आ सो जातीं हिम आलय से चली हवायें
नीलकंठ का गला छोड़कर भरा हलाहल गंगा जल में
निहित स्वार्थ के आभूषण   से शोभित प्रतिमा के आराधक
ढूँढ़ा करते दोष दृष्टि में, कहते दर्पण यहाँ साफ़ है
 
 
कर बैठी अधिकार तुलसियों के गमलों पर विष की बेलें
खेतों में उगती फ़सलों की अधिकारी हैं अमरलतायें
भूमिपुत्र मां के आंचक्ल को हो होकर व्याकुल टटोलते
प्राप्त किन्तु हो पातीं केवल उसको उलझी हुई व्यथायें
जिनका है दायित्व सभी वे हाथ झाड़ अपने कह देते
जो पीड़ित है उसे जनम का पिछले कोई मिला श्राप है
 
 
धरा  टेरती जिसको वो ही इन्द्रसभा में जाकर बैठे
दृष्टिकिरण घाटी में आती नहीं जहां से कभी उतर कर
गंधर्वों के गान अप्सराओं  की किंकिणियों के स्वर में
कतिपय आश्वासन रह जाते होठों पर चुप्पी धर धर कर
लेकिन जिस पल धैर्य सुराही आतुर हुई छलक जाती है 
सोचा करते तब जाने क्या हमने आखिर किया पाप है  

दिशाओं पर इबारत

लाज ने हर बार रोके शब्द चढ़ने से अधर पर
दृष्टि छूते ही नयन की देहरी को झुक गई है
प्राप्त मुझको हो गये सन्देश सब उड़ती हवा से
कंठ की वाणी जिन्हें उच्चार करते रुक गई है
 
स्वप्न जो संवरे नयन में, मैं उन्हें पहचान लूंगा
भाव की आलोड़नायें हो रहीं जो, जान लूंगा
 
शब्द की बैसाखियां क्या चाहते संबंध अपने
बिन कही संप्रेषणा के बन रहे आधार हम तुम
कोई परिभाषा नहीं,जो सूत्र हमको बांधता है
फूल-खुश्बू,धार-नदिया, शाख से हो कोई विद्रुम
 
मैं तुम्हारी छांव को परछाईं अपनी मान लूंगा
भावना की टेर को मैं सहज ही पहचान लूंगा
 
जब अकेली सांझ लिखती है दिशाओं पर इबारत
बादलों ने शब्द बन तब नाम लिक्खा है हमारा
कंपकंपाती दीप की लौ ने स्वयं को तूलिका कर
रात की कजराई में बस चित्र अपना ही निखारा
 
मैं हमारी अस्मिता का प्राप्त कर अनुमान लूँगा
जो तुम्हारी है उसी को मीत अपनी मान लूंगा

पीर बिना कारण के गाती

गिरजे में, मंदिर मस्जिद में केवल सौदागर मिलते हैं
कोई ऐसा नहीं कहीं भी दे पाये प्रश्नों के उत्तर
 
खिली धूप की सलवट मे क्यों अंधियारे के बीज पनपते
क्यों चन्दा की किरन किसी के मन का आंगन झुलसा जाती
क्यों कर्मण्यवाधिकारस्ते की बदला करती परिभाषा
कैसे किसी हथेली पर आकर के अब सरसों जम जाती
किसका आज विगत के पुण्यों का प्रताप ही बन जाता है
किसके भाल टँगे अक्षर की छवियां धूमिल होती जातीं
क्यों नयनों के ढलते जल पर भी प्रतिबन्ध लगा करते हैं
पीर बिना कारण के गाती आकर कुछ अधरों पर क्योंकर
 
पथवारी पर वड़ के नीचे लगी हुई कुछ तस्वीरों पर
अक्षत चन्दन रख देने से भाग्य कहां बदला करते हैं
खोल दुकानें,जन्तर गंडे ताबीजों को बेच रहे जो
उनका कितना बदला ? भाग्य बदलने का दावा करते हैं
कोई शीश नवाये,कोई सवामनी की भेंट चढ़ाये
श्रद्धा के पलड़े में दोनों की क्यों तुलनायें करते हैं
टिकट लगा कर दर्शन दे जो,वो तो देव नहीं हो सकता
और दलाली करने वाले क्या हैं सच पशुओं से बढ़कर

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...