स्वर उमड़ते कंठ


स्वर उमड़ते कंठ से न छू सके कभी अधर
कोर पर सिमट के रह गया है अश्रु का सफ़र
दृष्टि की गली में कोई पाहुना ना आ सका
अजनबी से मोड़ पे आ ज़िन्दगी गई ठहर
 
सामने नहीं है शेष कोई भी तो कामना
बज रहा है द्वात्र पर अतीत का ही झुनझुना
आ खड़े हैं पास में वे पंथ मानचित्र के
दंभ ने जिन्हें स्वयं के वास्ते नहीं चुना
 
कल्पना के पाखियों के पंख सारे झर गये
घिर तमस के मेघ नैन का वितान भर गये
अस्स की किरन  को लील कर दिशायें हँस पड़ीं
एक बिन्दु पर अटक के थम सभी प्रहर गये
 
मंदिरों के द्वार दीप एक भी जला नहीं
भाग्य था गुणित परन्तु अंश भी फ़ला नहीं
चाँदनी ने गीत जितने रात जाग कर लिखे
पंखुरी के कंठ स्वर में एक भी सजा नहीं
 
भोर का लिखा सँदेस एक भी ना पढ़ सके
खिंच रही थी रेख को ना पाँव पार कर सके
तीर की उड़ान के परे रहे थे लक्ष्य सब
आँधियों के सामने न निश्चय देर टिक सके

थी किताब वेड की जो ब्रह्मलीन हो गई 
तेर बांसुरी की लग रहा है क्षीण हो गई
 मंत्र अपने उच्चारण से हो गए अलग लगा 
तार सब बिखर चुके हैं मौन बीन हो गई 

हुए हैं हाथ बाध्य अब मशाल दीप्त नव करें 
अवनिकाएं सब हटायें औ प्रकाश नभ भरें 
जो प्राप्ति संचयित हुई है ज़िंदगी के द्वार से 
उसे नवीन आस कर के आंजुरी में हम धरें 

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की ज्योति अनंत है..

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...