तूलिका पी गई रंग खुद ही सभी

सूख निर्झर गये भावना के सभी, भाव उमड़े नहीं छंद में जो ढलें
कल्पना की डगर के पथिक थक गये, पांव बोझिल हुए ये न संभव चल
बांध कर थे कतारें खड़े अक्षरों का नहीं थाम पाई कलम हाथ भी
छन्द के पास भी शेष कुछ न रहा, सिर्फ़ यह हाथ अपने निरतर मलें

चाह तो थी कलम की उकेरे नये गीत मल्हार के कुछ नये राग के
मस्तियों की गली में विचरते हुए फ़ागुनों के उमड़ते हुए फ़ाग के
तूलिका पी गई रंग खुद ही सभी इसलिये चित्र सँवरा नहीं एक भी
प्रश्न नजरो में ले रह गई फिर कलम, पंथ में खो चुके एक अनुराग के

कल्पनातीते

वह अधर के कोर पर अटकी हुई सी मुस्कुराहट
वह नयन में एक चंचल भाव पलकें खोलता सा
भाल का वह बिन्दु जिसमे सैकड़ों तारे समाहित
कंठ का स्वर शब्द में ला राग मधुरिम घोलता सा

कल्पनातीते ! मेरी सुधि में तुम्हारी छवि मनोहर
लेख बन कर इक शिला का हर घड़ी है साथ मेरे

स्वर्णमय हो पल हुए अंकित ह्रदय के पाटालों पर
आ गईं थी तुम मेरे भुजपाश में सहसा लजा कर
और भर ली माँग अपनी प्रीत का चन्दन मेरी ले
रंग उसमें फिर हिना का घोल कर कुमकुम बना कर

प्राणसलिले ! कोष स्मॄति के एक उस ही ज्योत्सना से
दीप बन होते प्रकाशित हर घड़ी संध्या सवेरे

वह किताबों की झिरी से कनखियों का झाँक जाना
भूलना राहें दुपट्टे की गली में उंगलियों का
खींचना रेखा धरा पर दॄष्टि की अपनी कलम से
और अधरों का निरन्तर फड़फड़ाना तितलियों सा

प्रीतिसरिते !चित्र ये मेरे ह्रदय की वीथिका में
हर घड़ी मधुसिक्तता की रश्मियाँ रहते बिखेरे

अभी तलक भी घुली हुई हैं

तुम्हारी नजरें जहाँ गिरी थीं, कपोल पर से मेरे फिसल कर
हमारी परछाईयां उस जगह में अभी तलक भी घुली हुई हैं

हुई थी रंगत बदाम वाली हवा की भीगी टहनियों की
सजा के टेसू के रंग पांखुर पर, हँस पड़ी थी खिली चमेली
महकने निशिगंध लग गई थी, पकड़ के संध्या की चूनरी को
औ बीनती थी अधर के चुम्बन कपोल पर से नरम हथेली

जनकपुरी की वह पुष्प वीथि,जहा प्रथम दृष्टि साध होकर
मिली थी, उसकी समूची राहें अभी तलक भी खुली हुई हैं

न तीर नदिया का था न सरगम, औ न ही छाया कदम्ब वाल
न टेर गूंजी थी पी कहाँ की, न सावनों ने भिगोया आकर
मगर खुले रह गये अधर की जो कोर पर था रहा थिरकता
वही सुलगता सा मौन जाने क्या क्या सुनाता है अब भी गाकर

न जाने क्यों इस अनूठे पल में, उमड़ती घिरती हैं याद आकर
मुझे पकड़ कर अतीत में ले जायेंगी इस पर तुली हुई हैं

वो मोड़ जिस पर गुजरते अपने कदम अचानक ही आ मिले थे
वो मोड़ जिस पर सँवर गई थी शपथ के जल से भरी अंजरिया
उसी पे उगने लगीं हैं सपनों की जगमगाती हजार कोंपल
लगी उमड़ने बैसाख में आ भरी सुधा की नई बदरिया

ढुलक गई नभ में ईंडुरी से जो इक कलसिया,उसी से गिर कर
जो बूँद मुझको भिगो रही हैं वो प्रीत ही में धुली हुई हैं

माँ के चरणों में

विश्वासों के दीप जला कर भरे प्राण में सघन चेतना
बने सुरक्षा कवच, पंथ में हरने को हर एक वेदना
मिट्टी के अनगढ़ लौंदे से प्रतिमा सुन्दर एक संवारे
संस्कृतियों के अमृत जल से बने शिल्प को और निखारे


चारों मुख से सृष्टि रचयिता ने किसकी महिमा गाई थी
तन पुलकित मन प्रमुदित करती उसकी सुधियाँ पुरबाई सी


जीवन के अध्याय प्रथम का जो लिखती है पहला अक्षर
अधरों पर भाषा संवारती, और कंठ में बोती है स्वर
अभिव्यक्ति का ,अनुभूति का कण कण जिस पर आधारित है
बन कर प्राण शिराओं में जो प्रतिपल होती संचारिर है


काल निशा के घने तिमिर में उगे भोर की अरुणाई सी
तन पुलकित मन प्रमुदित करती उसकी सुधियाँ पुरबाई सी


दिशाबोध का क्रम होता है जिसके इंगित ही से प्रेरित
ग्रंथ हजारों लिखे गये पर हैं जिसकी क्षमतायें नेतित
दिवस नहीं बस एक बरस का, हर पल हर क्षण की जो धात्री
दिन में है संकल्प सूर्य जो, और दिलासा बने रात्री


पूजित है धड़कन सांसों से, वो भी, उसकी परछाईं भी
तन पुलकित मन प्रमुदित करती उसकी सुधियाँ पुरबाई सी

जरा सा गुनगुनाया हूँ

लिखे हैं गीत मैने भावना को शब्द में बोकर
लिखे हैं अस्मिता को हर सिरजते छन्द में खोकर
लिखे हैं कल्पना के पक्षियों के पंख पर मैने
लिखे हैं वेदना की गठरियों को शीश पर ढोकर


मगर जो आज लिखता हूँ नहीं है गीत वह मेरा
तुम्हारी प्रीत को बस शब्द में मैं ढाल लाया हूँ


रंगा जिस प्रीत ने पग में तुम्हारे आलता आकर
कपोलों पर अचानक लाज की रेखायें खींची थी
अँजी थी काजरी रेखायें बन कर, जो नयन में आ
कि जिसने गंध बन कर साँस की अँगनाई सींची थी


उमगती प्रीत की उस इन्द्रधनुषी आभ को अपने
पिरोकर छन्द में दो पल जरा सा गुनगुनाया हूँ


किया जिस प्रीत ने कर के तुम्हारे स्पर्श को,पारस
नयन की क्यारियों में स्वप्न के पौधे उगाये हैं
उंड़ेले हैं बहारों के कलश, मन की गली में आ
सँवर कर ताल में, घुंघरू पगों के झनझनाये हैं


उसी इक प्रीत की उठती तरंगों ने छुआ मुझको
लगा है आज मैं बरसात में उसकी नहाया हूँ


पलक अपनी उठा कर जो कहा तुमने बिना बोले
बताया उंगलियों के पोर ने मुझको जरा छूकर
अधर के थरथराते मौन शब्दों को उठाकर के
लिखा था पांव के नख से कोई सन्देश जो भू पर


उसी सन्देश में मैने डुबोई लेखनी अपनी
निखर कर आ गया जो सामने, वो बीन लाया हूँ

लिखने से क्या होगा हासिल

 सम्भव तो था लिख देता मैं गीत नये नित दस या बारह
प्रश्न उठा लेकिन यह मन में, लिखने से क्या होगा हासिल

अक्षर चार वाहवाही के, और शब्द कुछ " खूब लिखा है "
"अद्भुत है","उपमायें अनूठीं""शिल्प रचा है तुमने सुन्दर"
भावों की कड़ियां गूंथी हैं सुघड़ तरीके से माला में
और शब्द के मोती सारे लाये एक एक चुन चुन कर

किन्तु दूसरे दिन इतिहासों के जो पन्ने खुलें भूल से
उनके बीच कहीं जाकर यह गीत सभी हो लेंगे शामिल

घटनाक्रम जो घटित हुआ वह सहसा कुछ लिखवा देता है
अंगारों में ढले शब्द तब भरते वाणी में हुंकारें
आवाहन, कर्त्तव्य भावना, बलिदानों की बात, चुनौती
याद दिलाई जाती हैं रह रह तलवारों की झंकारें

किन्तु समय के दो दिन खर्चे हो जाने के बाद सभी यह
बातें, एक लाल फ़ीते में बँध हो जातीं दफ़्तर दाखिल

लगते हैं महफ़िल में नित ही गीतोपं के गज़लों के मेले
सब ही के अन्दाज़ अनूठेसब में अलग अलग कुछ बातें
मिलन बाँसुरी, चूड़ी काजल,चन्दन,फूल,वन्दना के स्वर
फ़ागुन का उल्लास, विरह में डूबी हुई सावनी रातें

किन्तु दूसरे दिन की महफ़िल, उतना उन्हें याद रखती है
कर्ज़दार को जैसे रहता, चुकता किया हुआ कोई बिल

उत्तीर्ण होता ही रहूँगा

लो परीक्षा चाहे जितनी तुम मेरे विश्वास की प्रिय
है अडिग विश्वास मैं उत्तीर्ण होता ही रहूँगा

अर्चना के दीप की लौ चाहे जितनी थरथराये
पंथ हर पग पर स्वयं ही सैंकड़ो झंझा उगाये
द्रष्टि के आकाश पर केवल उमड़ते हों बगूले
और चारों और केवल चक्र वायु सनासनाये

डगमगा कर राह भटके पंथ में मैं शैल-दृढ़ता
के नये कुछ बीज हर पग संग बोता ही रहूँगा

आस की हर इक कली पर पतझरी आ रोष बिखरे
होंठ की हर प्यास पर जलती हुई दोपहर निखरे
आचमन का नीर बाकी रह न पाए आंजुरी में
मन्त्र अधरों के कँवल छूते हुए दस बार सिहरे

अग्नि नभ से हो बरसती तो उसे आलाव कर के
मैं स्वयं तप कुन्दनों की भाँति होता ही रहूँगा

हो विलय जाएँ हथेली की सभी रेखाएं चाहे
एक पल के भी लिए खुल पायें न हो बंद द्वारे
पर्वतों के श्रंग से लेकर तलहटी सिन्धु की तक
शून्य में डूबी हुई निस्तब्धता सब कुछ सँवारे

मैं प्रफुल्लित अंकुरों की चिर निरंतर साधना ले
प्राण को निष्ठाओं में पल पल पिरोता ही रहूँगा

नाम ले परिवर्तनों का छायें कितने भी कुहासे
संस्कृतियों के शिविर में पल रहें हो अनमना से
पीढियां अक्षम न अपनी रत्नानिधियों को संभालें
ज्योति की किरणें बिछुड़ने सी लगें लगने विभा से

मैं भ्रमित आभास के हर बिम्ब का विध्वंस करके
इक नये विश्वास का संकल्प बोता ही रहूँगा

चांद किरन से की मनुहारें

कलासाधिके तेरे नयनों से फिसली इक दॄष्टि किरन न
मेरे मन के अवसादों में भर दी है उमंग फ़ागुन की

अंबर ने भर कलश तिमिर के जितने ढुलकाये संध्या में
उनका तम रिस रिस कर रंगता था मेरे मन की दीवारे
आशा के जुगनू करवट ले लेकर उनमें रह जाते थे
तोड़ा करती थी दम पल पल चांद किरन से की मनुहारें

अरुण अधर की मुस्कानों की खिली धूप के छीटे खाकर
उन दीवारों पर आ उभरी है मोहक छवियाँ मधुवनकी

बिछी हुईं थी मीलों लम्बी पथ में जो एकाकी राहें
दिशाहीन कदमों की मंज़िल पथ पग पग पर पी जाता था
संध्या के पल हों दोपहरी की बेला हो, उगी भोर हो
सार घड़िया, प्रहर पलों में सूनापन इक छा जाता था

रचे अलक्तक से पांवों का राहों को जो स्पर्श मिल गया
मंज़िल आकर लगी चूमने देहरी स्वयं मेरे आँगन की

शून्य क्षितिज के कैनवास पर रंग बिखर कर रह जाते थे
और तूलिका हो जाती थी चित्र बना पाने में अक्षम
अलगोजे पर बही हवा के,रह रह कर चढ़ने की कोशिश
में फ़िसल फ़िसल कर गिर जाती थी अनगाये गीतों की सरगम

तुमने अपने सुर की सहसा बिखरा दी जो स्वर्ण माधुरी
लगीं छेड़ने सभी दिशायें रागिनियाँ स्वर्गिक वादन की

बदलते मौसम में

उड़ी हवा में गन्ध, टूटने लगे लगे प्रतिबन्ध, मचलने लगे होंठ पर छन्द बदलते मौसम में
जगी ह्रदय में प्रीत, सपन में आया मन का मीत, सुनाता हुआ नये कुछ गीत बदलते मौसम में

चेहरे पर से हटा एक चादर को जागा कई दिनों से परछाईं के घर में जा था दिन सोया
हुई ओस की मद्दम मद्दम बरखा से भर आंजुरि अपनी बैठ गया उकड़ूँ फिर अपना मुख धोया
पलक मिचमिचा अंगड़ाई में उठा हाथ अपने चटकाया जोड़ जोड़ को खोल मोर्चा जमा हुआ
पीली पगड़ी लाल अंगोछा,लिया पहन फिर रेशम कुरता जो कि दूध की रंगत में था सना हुआ

खुली याद की गांठ, चौथ को सजा दूज का चाँद भावनाओं के उमड़े बाँध, बदलते मौसम में
जगी ह्रदय में प्रीत, सपन में आया मन का मीत, सुनाता हुआ नये कुछ गीत बदलते मौसम में

बिखराई लोटे भर भर के गंध फूल ने गठरी खोली अपनी जो थी कई दिनों से बन्द रही
लगा बजाने द्वारे पर आकर मृदंग वह एक मधुप कलियों ने इतने दिन तक जिसकी राह तकी
शाखाओं पर नन्ह-मुन्ने बोल लगे किलकारी लेने और खेलने लगे खोज कर खेल नये इस मौसम के
लगी नाचने दूब छरहरी छेड़ी हुई हवा की धुन पर अपने सीने पर से हटा बोझ सब बोझिल वे

उपवन के नव फूल, बन गई पथ की बिखरी धूल, गा उठे सरिताओं के कूल बदलते मौसम में
जगी ह्रदय में प्रीत, सपन में आया मन का मीत, सुनाता हुआ नये कुछ गीत बदलते मौसम में

हटा सलेटी कम्बल अपना सजते हुये सांझ ने ने पहनी पीले गोटे वाली लाल एक साड़ी
लहरों पर दोनों में रक्खे दीपों ने झिलमिल झिलमिल कर सोनहली रंगीन नई बूटी काढ़ी
टाँक हजारों तारे अपने आंचल में रजनी ने आकर लहराई निशिगंधा की महकी झालर
नभ की मंदाकिनियों से लाकर बरसाने लगा चन्द्रमा अमिय नीर से भर भर कर अपनी कांवर

बढ़े दिवस के पांव, सज गये दुल्हन से अब गांव सुहानी लगे पेड़ की छाण्व, बदलते मौसम में
जगी ह्रदय में प्रीत, सपन में आया मन का मीत, सुनाता हुआ नये कुछ गीत बदलते मौसम में

दीप बन जलता रहा हूँ

दृष्टि को अपनी उठा कर तुम मुझे देखो न देखोो
मैं तुम्हारे द्वार पर बन दीप इक जलता रहा हूँ


नींद की चढ़ पालकी तुम चल दिये थे जब निशा में
मैं खड़ा था उस घड़ी बिसरे सपन की वीथियों में
और तुम आलेख लिखते थे नये दिनमान का जब
मैं रहा संशोधनों का चिह्न बन कर रीतियों में


एक दिन शायद नयन की कोर पर मैं टँग सकूँगा
आस की इन सीढियों पर नित्य ही चढ़ता रहा हूँ


तुम चले तो जो छिटक कर एड़ियों से उड़ गई थी
मैं उसी रज को सजा कर भाल पर अपने रखे हूँ
ओढ़नी लहरा हवा की झालरी जब बन गई थी
मैं वही मृदुस्पर्श अपनी बाँह में अब तक भरे हूँ


एक दिन उद्गम यहाँ आ जायेगा बह धार के सँग
प्राण में यह प्यास लेकर साधना करता रहा हूँ


बन गई परछायों को चूम कर जो देहरी पर
चाहता हूँ एक बूटा बन जड़ूँ उस अल्पना में
शान्त सोई झील ने जिनको सँजो कर रख लिया है
चित्र वे मैं चाहता भर पाऊँ अपनी कल्पना में


एक पारस आ कभी तो प्राण इनमें भर सकेगा
बस इसी कारण नये कुछ शिल्प मैं गढ़ता रहा हूँ

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...