तूलिका पी गई रंग खुद ही सभी

सूख निर्झर गये भावना के सभी, भाव उमड़े नहीं छंद में जो ढलें
कल्पना की डगर के पथिक थक गये, पांव बोझिल हुए ये न संभव चल
बांध कर थे कतारें खड़े अक्षरों का नहीं थाम पाई कलम हाथ भी
छन्द के पास भी शेष कुछ न रहा, सिर्फ़ यह हाथ अपने निरतर मलें

चाह तो थी कलम की उकेरे नये गीत मल्हार के कुछ नये राग के
मस्तियों की गली में विचरते हुए फ़ागुनों के उमड़ते हुए फ़ाग के
तूलिका पी गई रंग खुद ही सभी इसलिये चित्र सँवरा नहीं एक भी
प्रश्न नजरो में ले रह गई फिर कलम, पंथ में खो चुके एक अनुराग के

7 comments:

पवन धीमान said...

ह्रदय को छूने वाली रचना.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन की व्यथा को अच्छे शब्द दिए हैं

Udan Tashtari said...

बांध कर थे कतारें खड़े अक्षरों का नहीं थाम पाई कलम हाथ भी
छन्द के पास भी शेष कुछ न रहा, सिर्फ़ यह हाथ अपने निरतर मलें



-ये बात आप पर...कभी नहीं..माँ शारदा का वरद हस्त आप पर है...छन्द बहते रहेंगे!!

दिलीप said...

aapki rachnaayon ka star hi bhinn hai lajawaab...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी रचना ( कल्प्नातीते ) चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर मंगलवार १.०६.२०१० के लिए ली गयी है ..
http://charchamanch.blogspot.com/

Shar said...

:(

Unknown said...

राकेश जी..जब देर से पहुँचता हूँ तो मुझे खुद ही बहुत खेद होता है इतनी बढ़िया भावपूर्ण रचना इतने देर बाद पढ़ पाया...यह भी बेहतरीन..सुंदर रचना के लिए आभार

फिर मैं गीत नया बुनता हूँ

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