बिछे हुए हैं चौंसठ खाने

होठों पर आने से पहले शब्द हुआ करते संपादित
अब उन पर प्रतिबन्ध नये कुछ बंधी अपेक्षा लगी लगाने

चुन रख लिए उम्र की बगिया में से एक एक कर कर कर
अनुभव के सांचों में ढल कर जितने फूल मिले क्यारी में
गुच्छे बना शब्द में ढाले और उन्हें सरगम में बांधा
किन्तु रहे वे मौन न जाने क्यों अपनी ही दुश्वारी में

शाखाओं के साथ साथ जब पत्ती प्रश्न उठाने लगती
तब दुविधा है कहाँ कहाँ पर किसे किसे जाएँ समझाने

अर्थ अनर्थों में न जाने कैसे परिवर्तित हो जाते
जो अभिप्राय नहीं होता है, वही उभर कर सम्मुख आता
रही बुलाती जिसे मुंडेरी छत की आवाजें दे देक
वह संदेसे वाला कागा कर अनसुनी नहीं ही आता

जिन बिम्बों की परछाईं से जोड़ रखा था अपना परिचय
अकस्मात् वे मुख को अपने फेर हो गए हैं अनजाने

तुहिन कणों में भीगी पांखुर तन जाती है शूलों जैसी
जब दोपहरी के सूरज का रथ पश्चिम को बढ़ने लगता
जब बहार के झोंके मुड़ने लगते हैं आ मोड़ गली के
तब मरीचिकाओं का साया अंगनाई में भरने लगता

सहमी सुधियों के यायावर असमंजस में खड़े हुए हैं
दिशा चुनें कैसे हर पग पर बिछे हुए हैं चौंसठ खाने

6 comments:

Udan Tashtari said...

गजब गजब के बिम्ब..गजब गजब की कल्पनाशीलता..हमसे तो तारीफ ही करने में चूक हुई जाती है..शब्दों के आभाव में...क्या कहें..नमन कर देते हैं गुरुदेव को!!

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut sunda, abhivyakti

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

sangeeta swarup said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...आनंद आया आपकी रचना पढ़ कर

kunwarji's said...

waah!
jabardast bimb-yojna or shabd sanyojan....

apne anubhav ko badhiya jubaan di ji aapne....

kunwar ji,

दिलीप said...

waah adbhut har baar ki tarah

नरेन्द्र व्यास said...

निःशब्द..!! आभार !!

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