ज़िन्दगी प्रश्न करती रही नित्य ही
ढूँढ़ते हम रहे हल कोई मिल सके
हर कदम पर छलाबे रहे साथ में
रश्मि कोई नहीं साथ जो चल सके
कब कहाँ किसलिये और क्यों, प्रश्न के
चिन्ह आकर खड़े हो गये सामने
सारे उत्तर रहे धार में डूबते
कोई तिनका न आगे बढ़ा थामने
दिन तमाशाई बन कर किनारे खड़े
हाशिये पर निशायें खड़ी रह गईं
और हम याद करते हुए रह गये
सीख क्या क्या हमें पीढ़ियां दे गईं
तेल भी है, दिया भी न बाती मगर
दीप्त करते हुए रोशनी जल सके
बस अपरिचित पलों की सभायें लगीं
जिनसे परिचय हुआ वे चुराते नजर
सारे गंतव्य अज्ञातवासी हुए
पांव बस चूमती एक पागल डगर
हो चुकी,गुम दिशायें, न ऊषा जगी
और पुरबाई अस्तित्व को खो गई
सांझ अनजान थी मेरी अँगनाई से
एक बस यामिनी आई,आ सो गई
हैं प्रहर कौन सा, छटपटाते रहे
एक पल ही सही, कुछ पता चल सके
कामनायें सजीं थीं कि ग्वाले बनें
हम बजा न सके उम्र की बाँसुरी
गीत लिख कर हमें वक्त देता रहा
किन्तु आवाज़ अपनी रही बेसुरी
द्वार से हमने मधुमास लौटा दिया
और उलझे रहे स्वप्न के चित्र में
अपने आंगन की फुलवाड़ियां छोड़ कर
गंध खोजा किये उड़ चुके इत्र में
अब असंभव हुआ जो घिरा है हुआ
यह अंधेरा कभी एक दिन ढल सके
आँसू ने इंकार कर दिया
मैने कलम हाथ में लेकर, सोचा शब्द पीर को दे दूँ
लेकिन आंसू ने स्याही में ढलने से इंकार कर दिया
निमिष विरह के जले दीप से, एकाकीपन नागफ़नी है
और जहां तक देखा मन में घिरी निराशा बहुत घनी है
मुस्कानों की नगरी वाले पथ पर जब जब भी आशायें
चलीं चार पग, वक्त लुटेरा, आ कर जाता राहजनी है
मैने हर पल ज्योति जगा कर एक किरन को पास बुलाया
लेकिन्ब रजनी ने उषा में ढलने से इंकार कर दिय
सुधियों की शहनाई पर जब बजी वेदनाओं की सारगम
सारंगी के करुण स्वरों ने किया साथ में मिलकर संगम
अलगोजे के सुर ने पकड़ा मरुथल वाली लू का झोंका
पंचम का आरोह बन गया, सिसकी वाला स्वर भी मद्दम
पथाराई आंखों में चाहा स्वप्न आंज दूं चन्द्र निशा के
लेकिन संध्या ने काजल में ढलने से इंकार कर दिया
सन्नाटे का दर्द न समझी, बढ़ती हुई गहन खामोशी
अपराधी सी हवा मौन है, दे स्वीकॄति होने की दोषी
सुइयों ने कर लिया घड़ी की, आज पेंडुलम से गठबन्धन
अटकी हुईं एक ही स्थल पर पीती हुईं सभी सरगोशी
मैने सूरज को आमंत्रण भेजा, आ दिन को गति दे दे
लेकिन उसके हर घोड़े ने चलने से इंकार कर दिया
बासन्ती चूनर पर आकर लगे बबूलों के यों पहरे
उड़ा रंग बस शेष रह गये हैं पतझड़ के साये गहरे
कोयल की कूकों को पीने लगी चीख नभ में चीलों की
ओढ़ घनी निस्तब्ध टीस को,पल आकर पल के घर ठहरे
मैने चाहा अमराई को नये सिरे से मैं बौराऊं
लेकिन मरुतों ने पुरबा में ढलने से इंकार कर दिया
लेकिन आंसू ने स्याही में ढलने से इंकार कर दिया
निमिष विरह के जले दीप से, एकाकीपन नागफ़नी है
और जहां तक देखा मन में घिरी निराशा बहुत घनी है
मुस्कानों की नगरी वाले पथ पर जब जब भी आशायें
चलीं चार पग, वक्त लुटेरा, आ कर जाता राहजनी है
मैने हर पल ज्योति जगा कर एक किरन को पास बुलाया
लेकिन्ब रजनी ने उषा में ढलने से इंकार कर दिय
सुधियों की शहनाई पर जब बजी वेदनाओं की सारगम
सारंगी के करुण स्वरों ने किया साथ में मिलकर संगम
अलगोजे के सुर ने पकड़ा मरुथल वाली लू का झोंका
पंचम का आरोह बन गया, सिसकी वाला स्वर भी मद्दम
पथाराई आंखों में चाहा स्वप्न आंज दूं चन्द्र निशा के
लेकिन संध्या ने काजल में ढलने से इंकार कर दिया
सन्नाटे का दर्द न समझी, बढ़ती हुई गहन खामोशी
अपराधी सी हवा मौन है, दे स्वीकॄति होने की दोषी
सुइयों ने कर लिया घड़ी की, आज पेंडुलम से गठबन्धन
अटकी हुईं एक ही स्थल पर पीती हुईं सभी सरगोशी
मैने सूरज को आमंत्रण भेजा, आ दिन को गति दे दे
लेकिन उसके हर घोड़े ने चलने से इंकार कर दिया
बासन्ती चूनर पर आकर लगे बबूलों के यों पहरे
उड़ा रंग बस शेष रह गये हैं पतझड़ के साये गहरे
कोयल की कूकों को पीने लगी चीख नभ में चीलों की
ओढ़ घनी निस्तब्ध टीस को,पल आकर पल के घर ठहरे
मैने चाहा अमराई को नये सिरे से मैं बौराऊं
लेकिन मरुतों ने पुरबा में ढलने से इंकार कर दिया
थरथराती हुई उंगलियों से
नैन की झील में पड़ रहे बिम्ब में
चित्र आये हैं ऐसे संवरते हुए
थरथराती हुई उंगलियों से कोई
नाम कागज़ पे लिखता संभलते हुए
जो टँगीं हैं पलक की घनी झाड़ियों
पर हैं परछाईयां खो चुकी अर्थ भी
छटपटाती हुईं झूलने के लिये
थाम कर डोर कोई भी संदर्भ की
स्पर्श की आतुरा और बढ़ती हुईं
छू लें बिल्लौर सा झील का कैनवस
ज्ञात शायद न हो, भावना से रँगी
पर्त इस पर चढ़ी है रजत वर्क सी
याद का कोई आकर न कंकर गिरे
रंग रह जायें सारे बिखरते हुए
कांपते होंठ पर बात अटकी हुई
न कही जा रही, न ही बिसरे जरा
चित्र रेखाओं में इक उभरता हुआ
धुन्धमें डूब कर है कुहासों घिरा
एक पहचान के तार को खोजता
जोकि ईजिल की खूँटी से बाँधे उसे
ऒट से चिलमनों की रहा झाँकता
बन के जिज्ञासु, थोड़ा सा सहमा डरा
कोई लहरों पे सिन्दूर रंगता रहा
ढल रही शाम को चित्र करते हुए
है किसी एक आभास की सी छुअन
होती महसूस लेकिन दिखाई न दे
धमनियों में खनकती हुईं सरगमें
झनझनाती है लेकिन सुनाई न दे
मन के तालाब से धुल गये वस्त्र से,
भाव आतुर, टँगें शब्द की अलगनी
नैन लिखते हुए नैन के पत्र पर
बात वह जो किसी को सुनाई न दे
स्वप्न आकर खड़े हो रहे सामने
एक के बाद इक इक उभरते हुए
चित्र आये हैं ऐसे संवरते हुए
थरथराती हुई उंगलियों से कोई
नाम कागज़ पे लिखता संभलते हुए
जो टँगीं हैं पलक की घनी झाड़ियों
पर हैं परछाईयां खो चुकी अर्थ भी
छटपटाती हुईं झूलने के लिये
थाम कर डोर कोई भी संदर्भ की
स्पर्श की आतुरा और बढ़ती हुईं
छू लें बिल्लौर सा झील का कैनवस
ज्ञात शायद न हो, भावना से रँगी
पर्त इस पर चढ़ी है रजत वर्क सी
याद का कोई आकर न कंकर गिरे
रंग रह जायें सारे बिखरते हुए
कांपते होंठ पर बात अटकी हुई
न कही जा रही, न ही बिसरे जरा
चित्र रेखाओं में इक उभरता हुआ
धुन्धमें डूब कर है कुहासों घिरा
एक पहचान के तार को खोजता
जोकि ईजिल की खूँटी से बाँधे उसे
ऒट से चिलमनों की रहा झाँकता
बन के जिज्ञासु, थोड़ा सा सहमा डरा
कोई लहरों पे सिन्दूर रंगता रहा
ढल रही शाम को चित्र करते हुए
है किसी एक आभास की सी छुअन
होती महसूस लेकिन दिखाई न दे
धमनियों में खनकती हुईं सरगमें
झनझनाती है लेकिन सुनाई न दे
मन के तालाब से धुल गये वस्त्र से,
भाव आतुर, टँगें शब्द की अलगनी
नैन लिखते हुए नैन के पत्र पर
बात वह जो किसी को सुनाई न दे
स्वप्न आकर खड़े हो रहे सामने
एक के बाद इक इक उभरते हुए
लिखता हूँ अध्याय चाह के
पुरबा ने बाँसुरिया बन कर जब छेड़ा है नाम तुम्हारा
अभिलाषा की पुस्तक में , मैं लिखता हूँ अध्याय चाह के
स्वस्ति-चिन्ह जब रँग देती है पीपल के पत्तों पर रोली
देहरी पर, अँगनाई में जब रच जाती मंगल राँगोली
आहुतियों के उपकरणों को जब संकल्प थमाता कर में
और ॠचायें भर भर लातीं स्वाहा के मंत्रों की झोली
उस पल मेरे वाम-पार्श्व का एकाकीपन बुनता सपने
एक तुम्हारी छवियों वाली अमलतास की विटप छाँह के
मलय वनों से निर्वासित गंधों ने जब घेरा चौबारा
जब ऊषा ने विश्वनाथ के द्वारे घूँघट आन उतारा
जब कपूर ने अगरु-धुम्र के साथ किया नूतन अनुबन्धन
और अवध की गलियों ने जब संध्या को कुछ और निखारा
उस पल भित्तिचित्र में ढलता बिम्ब तुम्हारा कमल्लोचने
संजीवित कर देता है सब स्वप्न संवरते बरस मास के
प्राची की अरुणाई में जब गूँजी है प्रभात की बोली
याकि प्रतीची में उतरी हो आकर के रजनी की डोली
चन्द्र-सुधा से डूबे नभ में, महके रजत पुष्प की क्यारी
दोपहरी के स्वर्ण-पात्र में जब मौसम ने खुनकें घोलीं
उस पल मेरे भुजपाशों में उतरा हुआ ह्रदय का स्पंदन
आतुर हो जाता पाने को स्पर्श यष्टि की सुदॄढ़ बाँह के
श्लोकों से स्तुत होते हैं जब मंदिर में कॄष्ण मुरारी
बरसाने का आमंत्रण जब दोहराती वॄषभानु-दुलारी
मीरा की उंगलियाँ जगातीं जब इकतारे का कोमल स्वर
और प्रीत की शिंजिनियाँ जब नस नस में जातीं संचारी
उस पल सुधि के मानचित्र पर रूप तुम्हार दिशाबोध बन
करता है गुलाब में पारिणत, सब सिकतकण बिछी राह के.
अभिलाषा की पुस्तक में , मैं लिखता हूँ अध्याय चाह के
स्वस्ति-चिन्ह जब रँग देती है पीपल के पत्तों पर रोली
देहरी पर, अँगनाई में जब रच जाती मंगल राँगोली
आहुतियों के उपकरणों को जब संकल्प थमाता कर में
और ॠचायें भर भर लातीं स्वाहा के मंत्रों की झोली
उस पल मेरे वाम-पार्श्व का एकाकीपन बुनता सपने
एक तुम्हारी छवियों वाली अमलतास की विटप छाँह के
मलय वनों से निर्वासित गंधों ने जब घेरा चौबारा
जब ऊषा ने विश्वनाथ के द्वारे घूँघट आन उतारा
जब कपूर ने अगरु-धुम्र के साथ किया नूतन अनुबन्धन
और अवध की गलियों ने जब संध्या को कुछ और निखारा
उस पल भित्तिचित्र में ढलता बिम्ब तुम्हारा कमल्लोचने
संजीवित कर देता है सब स्वप्न संवरते बरस मास के
प्राची की अरुणाई में जब गूँजी है प्रभात की बोली
याकि प्रतीची में उतरी हो आकर के रजनी की डोली
चन्द्र-सुधा से डूबे नभ में, महके रजत पुष्प की क्यारी
दोपहरी के स्वर्ण-पात्र में जब मौसम ने खुनकें घोलीं
उस पल मेरे भुजपाशों में उतरा हुआ ह्रदय का स्पंदन
आतुर हो जाता पाने को स्पर्श यष्टि की सुदॄढ़ बाँह के
श्लोकों से स्तुत होते हैं जब मंदिर में कॄष्ण मुरारी
बरसाने का आमंत्रण जब दोहराती वॄषभानु-दुलारी
मीरा की उंगलियाँ जगातीं जब इकतारे का कोमल स्वर
और प्रीत की शिंजिनियाँ जब नस नस में जातीं संचारी
उस पल सुधि के मानचित्र पर रूप तुम्हार दिशाबोध बन
करता है गुलाब में पारिणत, सब सिकतकण बिछी राह के.
तुम्हें गीत बन जाना होगा
गा तो दूँ मैं गीत मान कर बात तुम्हारी ओ सहराही
लेकिन तुमको मेरे स्वर से अपना कंठ मिलाना होगा
यह पथ का संबन्ध साथ ले हमको एक डगर है आया
हमने साथ साथ ही पथ में बढ़ने को पाथेय सजाया
यद्यपि नीड़ तुम्हारे मेरे अलग अलग हैं ओ यायावर
मेरे जो हैं तुमने भी तो उन संकल्पों को दोहराया
बन कर इक बादल का टुकड़ा, बन तो जाऊं छांह पंथ में
लेकिन तुमको अपनी गति से कुछ पल को थम जाना होगा
जागी हुई भोर के पंछी हैं हम तुम फैला वितान है
सजा रखा पाथेय साथ में, संचित इक लम्बी उड़ान है
मॄगतॄष्णा के गलियारों से परे बने हैं मानचित्र सब
तीर भले संधान अलग हों,करने वाली इक कमान है
लक्ष्य-भेद मैं कर तो दूंगा, एक तुम्हारे आवाहन से
लेकिन प्रत्यंचा पर तुमको आ खुद ही चढ जाना होगा
जिन प्रश्नों ने तुमको घेरा, मैं भी उनमें कभी हुआ गुम
जिन शाखों पर कली प्रफ़ुल्लित,उन पर ही हैं सूखे विद्रुम
क्यों पुरबा का झोंका कोई, अकस्मात झंझा बन जाता
जितना कोई तुम्हें न जाने,उतना जान सको खुद को तुम
मैं उत्तर बन आ तो जाऊं उठे हुए हर एक प्रश्न का
लेकिन उससे पहले तुमको प्रश्न स्वयं बन जाना होगा
मैं चुनता हूँ वन,उपवन,घर-आँगन में बिखरे छंदों को
संजीवित करता हूँ पथ पर चलने की सब सौगंधों को
भाषा की फुलवारी में जो मात्राओं के साथ किये हैं
अक्षर ने, मैं दोहराता हूँ उन वैयक्तिक अनुबन्धों को
बन कर गीत संवर जाऊंगा मैं मन कलियों के पाटल पर
लेकिन तुमको अर्थों वाले शब्दों में ढल जाना होगा
लेकिन तुमको मेरे स्वर से अपना कंठ मिलाना होगा
यह पथ का संबन्ध साथ ले हमको एक डगर है आया
हमने साथ साथ ही पथ में बढ़ने को पाथेय सजाया
यद्यपि नीड़ तुम्हारे मेरे अलग अलग हैं ओ यायावर
मेरे जो हैं तुमने भी तो उन संकल्पों को दोहराया
बन कर इक बादल का टुकड़ा, बन तो जाऊं छांह पंथ में
लेकिन तुमको अपनी गति से कुछ पल को थम जाना होगा
जागी हुई भोर के पंछी हैं हम तुम फैला वितान है
सजा रखा पाथेय साथ में, संचित इक लम्बी उड़ान है
मॄगतॄष्णा के गलियारों से परे बने हैं मानचित्र सब
तीर भले संधान अलग हों,करने वाली इक कमान है
लक्ष्य-भेद मैं कर तो दूंगा, एक तुम्हारे आवाहन से
लेकिन प्रत्यंचा पर तुमको आ खुद ही चढ जाना होगा
जिन प्रश्नों ने तुमको घेरा, मैं भी उनमें कभी हुआ गुम
जिन शाखों पर कली प्रफ़ुल्लित,उन पर ही हैं सूखे विद्रुम
क्यों पुरबा का झोंका कोई, अकस्मात झंझा बन जाता
जितना कोई तुम्हें न जाने,उतना जान सको खुद को तुम
मैं उत्तर बन आ तो जाऊं उठे हुए हर एक प्रश्न का
लेकिन उससे पहले तुमको प्रश्न स्वयं बन जाना होगा
मैं चुनता हूँ वन,उपवन,घर-आँगन में बिखरे छंदों को
संजीवित करता हूँ पथ पर चलने की सब सौगंधों को
भाषा की फुलवारी में जो मात्राओं के साथ किये हैं
अक्षर ने, मैं दोहराता हूँ उन वैयक्तिक अनुबन्धों को
बन कर गीत संवर जाऊंगा मैं मन कलियों के पाटल पर
लेकिन तुमको अर्थों वाले शब्दों में ढल जाना होगा
नाम तुम्हारा आ जाता है
संझवाती के दीपक को जब सत्ता सौंपी है सूरज ने
जाने क्यों मेरे अधरों पर नाम तुम्हारा आ जाता है
सुर का सहपाठी होकर तो रहा नहीं मेरा पागल मन
फिर भी उस क्षण जाने कैसे गीत तुम्हारे गा जाता है
गोधूलि से रँगे क्षितिज पर, उभरे हैं रंगों के खाके
सिन्दूरी सी पॄष्ठभूमि पर, चित्र सुरमई बाल निशा के
और तुम्हारी गंधों वाली छवि से अँजे हुए नयनों में
लगते हैं अँगड़ाई लेने. कुछ यायावर शरद विभा के
कुछ पल का ही साथ इस कदर संजीवित कर गया समय को
लगता है तुमसे मेरा अनगिनती जन्मों का नाता है
सुरभि यामिनी गंधा वाली वातायन पर आ हँसती है
अभिलाषा के पुष्प-गुच्छ की रंगत और नई होती है
जलतरंग की मादक धुन में ढल जाते हैं पाखी के स्वर
गुंजित होती चाप पदों की एक अकेली पगडंडी पर
निंदिया का रथ मेरे घर से ज्ञात मुझे है बहुत दूर है
लेकिन स्वप्न तुम्हारा रह रह, पाहुन बन बन कर आता है
पनघट के पथ से आवाज़ें, देती है पायल मतवाली
कंदीलें उड़ने लगती हैं, महकी हुई उमंगों वाली
नैन दीर्घाओं में टँकते, चित्र कई जाने पहचाने
ढली सांझ में घुलते जाकर यादों के बीहड़ वीराने
संध्या-वंदन को, आँजुर में भरा हुआ जल अभिमंत्रित हो
इससे पहले दर्पन बन कर चित्र तुम्हारा दिखलाता है
नीड़ पथिक के पग को अपनी ओर बुलाने लगता है जब
अलगोजे के स्वर पर कोई भोपा गाने लगता है जब
शयन-आरती को मंदिर में तत्पर होता कोई पुजारी
करने लगती नॄत्य अलावों में जब इक चंचल चिंगारी
तब खिड़की पर आकर रुकता हुआ हवा का हर इक झोंका
मुझको लगता है संदेशे सिर्फ़ तुम्हारे ही लाता है
जाने क्यों मेरे अधरों पर नाम तुम्हारा आ जाता है
सुर का सहपाठी होकर तो रहा नहीं मेरा पागल मन
फिर भी उस क्षण जाने कैसे गीत तुम्हारे गा जाता है
गोधूलि से रँगे क्षितिज पर, उभरे हैं रंगों के खाके
सिन्दूरी सी पॄष्ठभूमि पर, चित्र सुरमई बाल निशा के
और तुम्हारी गंधों वाली छवि से अँजे हुए नयनों में
लगते हैं अँगड़ाई लेने. कुछ यायावर शरद विभा के
कुछ पल का ही साथ इस कदर संजीवित कर गया समय को
लगता है तुमसे मेरा अनगिनती जन्मों का नाता है
सुरभि यामिनी गंधा वाली वातायन पर आ हँसती है
अभिलाषा के पुष्प-गुच्छ की रंगत और नई होती है
जलतरंग की मादक धुन में ढल जाते हैं पाखी के स्वर
गुंजित होती चाप पदों की एक अकेली पगडंडी पर
निंदिया का रथ मेरे घर से ज्ञात मुझे है बहुत दूर है
लेकिन स्वप्न तुम्हारा रह रह, पाहुन बन बन कर आता है
पनघट के पथ से आवाज़ें, देती है पायल मतवाली
कंदीलें उड़ने लगती हैं, महकी हुई उमंगों वाली
नैन दीर्घाओं में टँकते, चित्र कई जाने पहचाने
ढली सांझ में घुलते जाकर यादों के बीहड़ वीराने
संध्या-वंदन को, आँजुर में भरा हुआ जल अभिमंत्रित हो
इससे पहले दर्पन बन कर चित्र तुम्हारा दिखलाता है
नीड़ पथिक के पग को अपनी ओर बुलाने लगता है जब
अलगोजे के स्वर पर कोई भोपा गाने लगता है जब
शयन-आरती को मंदिर में तत्पर होता कोई पुजारी
करने लगती नॄत्य अलावों में जब इक चंचल चिंगारी
तब खिड़की पर आकर रुकता हुआ हवा का हर इक झोंका
मुझको लगता है संदेशे सिर्फ़ तुम्हारे ही लाता है
कल वे सब धूमिल हो लेंगें
आज नयन के पाटल पर जो चित्र बने जाने अनजाने
कल तक इतिहासों के पन्नों में वे सब धूमिल हो लेंगे
आज सुवासित करती है जो कली फूल बन कर उपवन को
उसकी नियति पांखुरी बन कर निश्चित है कल को झर जाना
पथ की सिकता जितने पग के चिन्ह लगाये है सीने से
कल तक एक हवा के झोंके से छूकर उनको मिट जाना
और आज पग जिन राहों को मंज़िल का पथ बना रहे हैं
कल को ये पथ इन कदमों की संभव है मंज़िल हो लेंगे
आंख-मिचौली, गिल्ली डंडा, रंगीं कंचे, टूटी चूड़ी
वह गलियों का मानचित्र की रेखाओं में घुलते जाना
चढ़ते हुए उमर की छत पर फ़ांद वयस-संधि मुंड़ेर को
नई शपथ का नये साथ का सहसा इक पौधा उग आना
दॄष्टि कलम तब लिख देती है जिन पन्नों पर प्रेम कथायें
संभव है वे पन्ने फट कर कल इक टूटा दिल हो लेंगे
चौबारे की तुलसी के चौरे पर दीप जला संध्या का
कितनी दूर प्रकाशित पथ को यायावर के कर पाता है
कंदीलों को गगन दीप की केवल संज्ञा दे लेने से
अंधियारी पावस रजनी का तिमिर दूर कब हो पाता है
आज खुशी के रंगों में रँग जो पल हम सब बाँट रहे हैं
रखे याद की मंजूषा में कल ये पल बोझिल हो लेंगें
कल तक इतिहासों के पन्नों में वे सब धूमिल हो लेंगे
आज सुवासित करती है जो कली फूल बन कर उपवन को
उसकी नियति पांखुरी बन कर निश्चित है कल को झर जाना
पथ की सिकता जितने पग के चिन्ह लगाये है सीने से
कल तक एक हवा के झोंके से छूकर उनको मिट जाना
और आज पग जिन राहों को मंज़िल का पथ बना रहे हैं
कल को ये पथ इन कदमों की संभव है मंज़िल हो लेंगे
आंख-मिचौली, गिल्ली डंडा, रंगीं कंचे, टूटी चूड़ी
वह गलियों का मानचित्र की रेखाओं में घुलते जाना
चढ़ते हुए उमर की छत पर फ़ांद वयस-संधि मुंड़ेर को
नई शपथ का नये साथ का सहसा इक पौधा उग आना
दॄष्टि कलम तब लिख देती है जिन पन्नों पर प्रेम कथायें
संभव है वे पन्ने फट कर कल इक टूटा दिल हो लेंगे
चौबारे की तुलसी के चौरे पर दीप जला संध्या का
कितनी दूर प्रकाशित पथ को यायावर के कर पाता है
कंदीलों को गगन दीप की केवल संज्ञा दे लेने से
अंधियारी पावस रजनी का तिमिर दूर कब हो पाता है
आज खुशी के रंगों में रँग जो पल हम सब बाँट रहे हैं
रखे याद की मंजूषा में कल ये पल बोझिल हो लेंगें
बस इतना तुम याद न आओ
शपथ तुम्हें है मुझसे लेलो मेरी खुशियाँ, मेरे जीवन
जी न सकूँ में बिना तुम्हारे, बस इतना तुम याद न आओ
खंजननयने, तुम्हें विदित है तुम आधार मेरे जीवन का
शतदलरुपिणी ज्ञात तुम्हें है, तुम हो कारण हर धड़कन का
मौन सुरों की सरगम वाली वीणा की ओ झंकॄत वाणी
तुम ही तो निमित्त हो मेरे शतजन्मों के अनुबन्धन का
शपथ तुम्हारी, वापिस ले लो अपने प्यार भरे आलिंगन
मैं निमग्न जिनमें हो जाऊँ, अब इतना तुम याद न आओ
गुलमोहर की अमलतास की छांहों में लगते थे डेरे
वे अतीत के क्षण रहते हैं अक्सर ही सुधियों को घेरे
उनकी सुरभि सदा महकाती है मन का सूना गलियारा
घोर निशा में दोपहरी में, ढले सांझ या उगें सवेरे
वे पल मैने सुमन बनाकर रखे किताबों के पन्नों में
उनको किन्तु नहीं पढ़ पाऊँ, अब इतना तुम याद न आओ
उंगली के पोरों पर दस दस बल में लिपटी हुई ओढ़नी
पगनख से हस्ताक्षर करती हुई धरा पर एक मोरनी
रह रह कर पुस्तक के पन्नों से उठती झुकती वे नजरें
हरी सुपारी वाली कसमें सहज उठानी, सहज तोड़नी
मेरी निधि से ले लो चाहे पीपल छाया, घनी दुपहरी
आँचल से मैं चंवर डुलाऊँ, बस इतना तुम याद न आओ
जी न सकूँ में बिना तुम्हारे, बस इतना तुम याद न आओ
खंजननयने, तुम्हें विदित है तुम आधार मेरे जीवन का
शतदलरुपिणी ज्ञात तुम्हें है, तुम हो कारण हर धड़कन का
मौन सुरों की सरगम वाली वीणा की ओ झंकॄत वाणी
तुम ही तो निमित्त हो मेरे शतजन्मों के अनुबन्धन का
शपथ तुम्हारी, वापिस ले लो अपने प्यार भरे आलिंगन
मैं निमग्न जिनमें हो जाऊँ, अब इतना तुम याद न आओ
गुलमोहर की अमलतास की छांहों में लगते थे डेरे
वे अतीत के क्षण रहते हैं अक्सर ही सुधियों को घेरे
उनकी सुरभि सदा महकाती है मन का सूना गलियारा
घोर निशा में दोपहरी में, ढले सांझ या उगें सवेरे
वे पल मैने सुमन बनाकर रखे किताबों के पन्नों में
उनको किन्तु नहीं पढ़ पाऊँ, अब इतना तुम याद न आओ
उंगली के पोरों पर दस दस बल में लिपटी हुई ओढ़नी
पगनख से हस्ताक्षर करती हुई धरा पर एक मोरनी
रह रह कर पुस्तक के पन्नों से उठती झुकती वे नजरें
हरी सुपारी वाली कसमें सहज उठानी, सहज तोड़नी
मेरी निधि से ले लो चाहे पीपल छाया, घनी दुपहरी
आँचल से मैं चंवर डुलाऊँ, बस इतना तुम याद न आओ
तुझ पर ही सब कुछ आधारित
पिघले हुए स्वाति-चन्दा से
टपक गि्रीं सीपी मे बूंदें
जो, उन सबने आज सुनयने
तेरे अधरों को चूमा है
अलकापुर की सुरसरिता में
सद्य:स्नाता एक अप्सरा
उसके ही लंबे केशों से
मौक्त मणि का अंश जो झरा
पारिजात ने पांखुर के
प्याले में उसको रखा सहेजा
और एक आभूषण में फिर
ॠतुशिल्पी ने जिसे है जड़ा
रति के हस्ताक्षर से सज्जित
है जो यही अलौकिक माला
उसकी ही बस इक थिरकन पर
मन सम्मोहित हो झूमा है
अभिव्यक्ति के क्षीर-सिन्धु में
गोते खाने की अभिलाषा
पर शब्दों से कॄपण, कोष को
रिक्त देख मन रहता प्यासा
अक्षर अक्षर जोड़ जोड़ कर
बुने हुए पल और निमिष में
अनुभूति के एक अर्थ को
समझ, जानने की जिज्ञासा
प्रणय निवेदन के भावों से
भरे हुए इक भावालय को
साथ लिये मन का यायावर
तेरे चहुं ओर घूमा है
सगर वंशजों की आराधित
उमाकान्त की केशवासिनी
की पायल की झंकारों से
जागी है जो मधुर रागिनी
वह जमना की सिकता में जो
घुले हुए वंशी के स्वर हैं
को लेकर आकांक्षित है
बन सके कंठ की अंकशायिनी
उसी एक आतुर आशा की
आंखों का सतरंगी सपना
बार बार कहता है आकर
तेरी आंखों को छूना है
अधरों की थिरकन से फिसले
हुए शब्द की जर्जर काया
द्रुत सरगम पर ख्याल बिलम्बित
जीवन के साजों ने गाया
किन्तु तार के सप्तक तुझ पर
शुरू, तुझी पर अंत हुए हैं
तू जीने के लिये प्रेरणा
स्वीकारा, पर जान न पाया
ॠद्धि-सिद्धि, उपलब्धि-प्राप्ति के
सारे मंत्र तुझी से जागे
तेरा नाम न गूंजे जिसमें
अर्थहीन वह स्वर सूना है
१५०वीं पोस्ट-- एक वह प्रस्तावना हो
मीत तुम मेरे सपन के इन्द्रधनुषी इक कथानक
के लिये जो पूर्णिमा ने है लिखी, प्रस्तावना हो
जानता हूँ जो दिवस के संग शुरू होगी कहानी
पाटलों पर जो लिखेगी, रश्मि बून्दों की जुबानी
पंछियों के कंठ के स्वर का उमड़ता शोर लेकर
गंध में भर कर सुनायेगी महकती रात रानी
और हर अध्याय में जो छाप अपनी छोड़ देगी
तुम उसी के केन्द्रबिन्दु की संवरती कामना हो
फूल के द्वारे मधुप ने आ जिसे है गुनगुनाया
धार की अँगड़ाइयों ने साज पर तट के बजाया
ज्योति पॄष्ठों पर लिखा है जल जिसे नित वर्त्तिका ने
नॄत्य करते पांव को जो घुंघरुओं ने है सुनाया
वह विलक्षण राग जो संगीत बनता है अलौकिक
तुम उसी इक राग की पलती निरंतर साधना हो
आहुति के मंत्र में जो घुल रही है होम करते
जो जगी अभिषेक करने, सप्त नद का नीर भरते
मधुमिलन की यामिनी में स्वप्न की कलियां खिला कर
जो निखरती है दुल्हन के ध्यान में बनते संवरते
शब्द की असमर्थता जिसको प्रकाशित कर न पाई
मीत तुम अव्यक्त वह पलती ह्रदय की भावना हो
के लिये जो पूर्णिमा ने है लिखी, प्रस्तावना हो
जानता हूँ जो दिवस के संग शुरू होगी कहानी
पाटलों पर जो लिखेगी, रश्मि बून्दों की जुबानी
पंछियों के कंठ के स्वर का उमड़ता शोर लेकर
गंध में भर कर सुनायेगी महकती रात रानी
और हर अध्याय में जो छाप अपनी छोड़ देगी
तुम उसी के केन्द्रबिन्दु की संवरती कामना हो
फूल के द्वारे मधुप ने आ जिसे है गुनगुनाया
धार की अँगड़ाइयों ने साज पर तट के बजाया
ज्योति पॄष्ठों पर लिखा है जल जिसे नित वर्त्तिका ने
नॄत्य करते पांव को जो घुंघरुओं ने है सुनाया
वह विलक्षण राग जो संगीत बनता है अलौकिक
तुम उसी इक राग की पलती निरंतर साधना हो
आहुति के मंत्र में जो घुल रही है होम करते
जो जगी अभिषेक करने, सप्त नद का नीर भरते
मधुमिलन की यामिनी में स्वप्न की कलियां खिला कर
जो निखरती है दुल्हन के ध्यान में बनते संवरते
शब्द की असमर्थता जिसको प्रकाशित कर न पाई
मीत तुम अव्यक्त वह पलती ह्रदय की भावना हो
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