जब सृजन के पल अपरिचित हौं घिरे उद्वेलनों में
शब्द की परछाईयाँ एकाकियत की धूप निगले
हो खड़ा आगे तिलिस्मी पेंच आ असमंजसों का
नैन की अमराईयों में रोष आ पतझर बिखेरे
उस घड़ी बन सांत्वना का मेघ जो बरसा ह्रदय पर
वह तुम्हारी प्रीत का विश्वास है केवल सुनयने
पंथ पर झंझाओं के फ़न सैंकड़ों फैलें निरन्तर
वीथियाँ भी व्योम की उल्काओं से भर जायें सारी
अंधड़ों के पत्र पर बस हो लिखा मेरा पता ही
धैर्य पर हो वार करती वक्त की रह रह कुल्हाड़ी
एक संबल बन मुझे गतिमान जो करता निरन्त
मोड़ पर इक चित्र का आभास है केवल सुनयने
अर्थ होठों से गिरी हर बात के विपरीत निकलें
स्थगित हो जायें मन की भावना के सत्र सारे
घाटियों से लौट कर आये नहीं सन्देश कोई
नाम जिस पर हो लिखा वह पल स्वयं ही आ नकारे
पगतली की भूमि पर जो छत्र बन आश्रय दिये है
वह मेरा मुट्ठी भरा आकाश है केवल सुनयने
कोई निश्चय हो नहीं पाता खड़ा,गिरता निरन्तर
आंजुरि में नीर भी संकल्प का रुकने न पाये
मंत्र कर लें कैद अपने आप में सारी ऋचायें
हाथ आहुति डालने से पूर्व रह रह कँपकँपाये
उस घड़ी बन कर धधकती ज्वाल जो देता निमंत्रण
वह अनागत में छुपा मधुमास है केवल सुनयने
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
-
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
परिभाषा उस एक निमिष की खोज रहा हूँ जिस पल तुमने होठों से न कहते कहते आँखों से मुझको हाँ की थी वह पल जब शाकुन्तल सपने, सँवरे थे दुष्यन्त नयन ...
5 comments:
बहुत सुंदर गीत ,बधाई
उस घड़ी बन कर धधकती ज्वाल जो देता निमंत्रण
वह अनागत में छुपा मधुमास है केवल सुनयने
प्रेम के अध्याय बाँचती ये दो पंक्तियाँ।
अर्थ होठों से गिरी हर बात के विपरीत निकलें
स्थगित हो जायें मन की भावना के सत्र सारे
घाटियों से लौट कर आये नहीं सन्देश कोई
नाम जिस पर हो लिखा वह पल स्वयं ही आ नकारे
आज की यह प्रस्तुति भी बेहतरीन..धन्यवाद राकेश जी.
very nice...........bahoot achchhe tarike se app ne yeh geet sajaya hai.
शुभ-दीपावली
सुकुमार गीतकार राकेश खण्डेलवाल
Post a Comment