हवा के पंख पर चढ़ कर

रुका था जब दिवस का रथ प्रतीची में कहीं जाकर
छलकने को हुई आतुर सितारों की भरी गागर
विभा तत्पर हुई अपना जरा घूँघट हटाने ्को
दिया चल चाँद अलसाया गगन के पार जाने को

धुँये की कुछ लकीरों ने हवा पर चित्र खींचे थे
कलश के नीर ने जिस पल थकन के पांव सींचे थे
जगी थी दीप की लौ तुलसियों के आंगनीं में आ
रंगोली में टंगा आकर अंधेरों का था जब बूटा

तुम्हारा नाम उस पल घंटियों की गूँज बन कर के
हवा के पंख पर चढ़ कर मेरी अंगनाई में आया

उतर कर आ गईं दीवार से परछाइयां नीचे
लगा अहसास कोई मूंदता पलकें खडा पीछे
लगी गाने सितारों की मधुर झंकार नव गाना
मचल कर जुगनुओं ने शीश पर छप्पर कोई ताना

किसी नीहारिका के गाँव से सन्देश लेकर के
पकड कंदील की डोरी उतरकर नाम इक आया

क्षितिज के रंग पिघले कुछ नई आभाएँ ले लेकर
सिंदूरी पृष्ठ पर उभरे अचानक सुरमई अ्क्षर
सुरों ने शब्द में बुन कर बनाई गीत की चादर
दिशा ने ओढ़ ली संगीत में रँग कर उसे सादर

उमड़ती गंध की फ़गुनाई सी नटखट बदरिया ने
तुम्हारे नाम में रँग कर उसे फिर झूम कर गाया

4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुन्दर गीत

प्रवीण पाण्डेय said...

उन्मुक्त भाव जगाता स्वागत गीत।

वीना said...

उतर कर आ गईं दीवार से परछाइयां नीचे
लगा अहसास कोई मूंदता पलकें खडा पीछे
लगी गाने सितारों की मधुर झंकार नव गाना
मचल कर जुगनुओं ने शीश पर छप्पर कोई ताना

बहुत ही सुंदर और ये पंक्तियां तो विशेष रूप से पसंद आईं

विनोद कुमार पांडेय said...

धुँये की कुछ लकीरों ने हवा पर चित्र खींचे थे
कलश के नीर ने जिस पल थकन के पांव सींचे थे
जगी थी दीप की लौ तुलसियों के आंगनीं में आ
रंगोली में टंगा आकर अंधेरों का था जब बूटा


ऐसे भाव से सजे छ्न्दबद्ध रचना को बार बार गुनगुनाने का मन होता है...अत्यन्त सुंदर गीत..बधाई राकेश जी

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