छलके शब्दों की गागरिया

छलक रही शब्दों की गागर
संध्या भोर और निशि-वासर
दोहे, मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद
घुलने लगा कंठ में सुरभित पुष्पों का मकरंद

भरने लगा आंजुरि मे अनुभूति का गंगाजल
लगा लिपटने संध्या से आ मॆंहदी का आँचल
ऊसर वाले फूलों में ले खुश्बू अँगड़ाई
मरुथल के पनघट पर बरसा सावन का बादल

करने लगी बयारें, पत्रों से नूतन अनुबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद

लहराई वादी में यादों की चूनर धानी
नदिया लगी उछलने तट पर होकर दीवानी
सुर से बँधी पपीहे के बौराई अमराई
हुए वावले गुलमोहर अब करते मनमानी

वन-उपवन में अमलतास की भटकन है स्वच्छंद
घुलने लगा कंठ में सुरभित पुष्पों का मकरंद

रसिये गाने लगीं मत्त भादों की मल्हारें
अँगनाई से हंस हंस बातें करतीं दीवारें
रंग लाज का नॄत्य करे आरक्त कपोलों पर
स्वयं रूठ कर स्वयं मनायें खुद को मनुहारें

एक एक कर लगे टूटने मन के सब प्रतिबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद

3 comments:

Udan Tashtari said...

एक एक कर लगे टूटने मन के सब प्रतिबंध
दोहे मुक्तक और सवैये, खिले गीत के छंद

--एक और सुंदर गीत के लिये बधाई.

Upasthit said...

Rakesh ji,
Apke jaise sidhdhhast kavi ki kavita par pratikriya dena bhi hamare jaison ke liye samman ki baat hai.
kavia nishchay ji madhurtapurna hai, USA me baith kar bhi papihe ke sur se bandhi baorayi amrayi ki yaad, kisi ke liye bhi irshya ka vishay ho sakti hai.
par kahin kahin gati badhit si lagi(ye ek nihayat hi vyaktigat anubhav ho sakta hai).

राकेश खंडेलवाल said...

धन्यवाद समीर भाई और उपस्थितजी

राकेश

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