घुल रही आस्था आज विश्वास में

ताल में ज्यों कमल पत्र पर से फिसल
ओस की बून्द लहरें जगाने लगी
नाम तेरे ने मेरे छुए जो अधर
सरगमें बज उठी हैं मेरी सांस में

बज रही आरती में बँधा शब्द हर
इक जुड़ा है हुआ एक ही नाम से
रंग भरती रही भोर तक है निशा
एक ही चित्र में सुरमई शाम से
एक ही गंध को भर के भुजपाश में
संदली ये हवा लेती अँगड़ाईयां
एक नूपुर की झंकार को थाम कर
गुनगुनाती रही रोज अँगनाईयां

एक आकार वह, स्वप्न से मूर्त हो
आ गया है अचानक मेरे पास में

बादलों के कहारों के कांधे चढ़ी
आई भूली हुई याद की पालकी
रूप की धूप में जगमगाती हुई
एक बिंदिया चमकती हुई भाल की
झीना परदा उड़ा एक पल के लिये
जागने लग पड़ी है मधुर भावना
प्रीत लिखने लगी है ह्रदय पर नये
एक अध्याय की आज प्रस्तावना

भाव के निर्झरों से उमड़ती हुई
आस्था घुल रही आज विश्वास में

रश्मियों से गुंथी गंध की वेणियां
इन्द्रधनुषी रँगे पंख मधुकीट के
कुन्तलों में मचलती हवा पूरबा
स्वप्न साकार करती है मन ढीठ के
पुष्पराजों की अँगड़ाईयों से अधर
जब खुले तो सुधा की बही जान्हवी
हो गईं एक पल में तिरोहित सभी
जो सुलगती हुई प्राण में प्यास थी

चित्र जब से तेरे, पाटलों पर बने
रात दिन ढल गये, मेरे, मधुमास में




2 comments:

Dr.Bhawna said...

एक आकार वह, स्वप्न से मूर्त हो
आ गया है अचानक मेरे पास में

चित्र जब से तेरे, पाटलों पर बने
रात दिन ढल गये, मेरे, मधुमास में

राकेश जी बहुत ही सुन्दर पंक्तियां है आपको साधुवाद।

राकेश खंडेलवाल said...

भावनाजी,

धन्यवाद

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...