वर्त्तिका के प्राण के उत्सर्ग की पहली कहानी
ज्योति की अँगड़ाइयों में दीप की ढलती जवानी
मैं अगर गाऊँ नहीं तो कौन इनको शब्द देगा
और फिर दोहराई जायेगी वही गाथा पुरानी
तो अपरिचित ! आओ हम तुम शब्द से परिचय बढ़ायें
कुछ कहो तुम, कुछ कहूँ मैं, साथ मिल कर गीत गायें
अर्चना के मंत्र में जो गूँजता है वह प्रथम स्वर
साधना के केन्द्र के आव्हान का जो प्रथम अक्षर
जोड़ता जो एक धागा है, उपासक से उपासित
प्रीत की आराधना का एक जो है चन्द्रशेखर
इन सभी की बाँह को थामे हुए आगे बढ़ें हम
जा रही हैं जो गगन तक, सीढ़ियों पर पग उठायें
यज्ञ में संकल्प के जल से भरी वह एक आंजुर
देवता के पांव चूमे फूल की जो एक पांखुर
नॄत्य में देवांगना के झनझनाता एक घुंघरू
रास को आवाज़ देती कुंज की वह एक बांसुर
कर गये प्रारंभ जो आधार की रख कर शिलायें
आओ उन पर हम नये प्रासाद मिल जुल कर बनायें
एक को आवाज़ दें हम, दूसरे को बीन लायें
शब्द यों क्रमबद्ध करके होंठ पर अपने सजायें
तार की आलोड़ना में मुस्कुराती सरगमों को
रागिनी में हम पिरोकर,स्वर संवारें गुनगुनायें
हैं क्षितिज के पार जो संभावनायें चीन्ह लें हम
और उनसे ज्योर्तिमय कर लें सभी अपनी दिशायें
ओ अपरिचित आओ हम तिम शब्द से परिचय बढ़ायें
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7 comments:
सुबह सुबह उठते ही अपकी इतनी सुन्दर कविता पढकर मन प्रसन्न हो गया.... मेरी हिन्दी आप जैसी अच्छी नहीं, ये पाम्व क्या होता है ? कहीं पांव तो नहें ।
"तो अपरिचित ! आओ हम तुम शब्द से परिचय बढ़ायें"
आप पढ़ाने को तैयार हैं, तो मैं भी बिल्कुल तैयार हूँ !!
"तो अपरिचित ! आओ हम तुम शब्द से परिचय बढ़ायें
कुछ कहो तुम, कुछ कहूँ मैं, साथ मिल कर गीत गायें"
आपकी छ्न्दबद्ध कविताएँ हमेशा प्रेरित करती हैं छंदों में लिखने के लिए .. परंतु आपकी अलग बात है ।
शब्दों से आओ हमतुम एक संबंध बनाए.।कविता जो है वो तो सुंदर है हीं पर सोंच की गहराई में एकता के गान को नये आयाम में पिरोना सचमुच अर्थपूर्ण है.॥
कर गये प्रारंभ जो आधार की रख कर शिलायें
आओ उन पर हम नये प्रासाद मिल जुल कर बनायें
राकेश जी बहुत सही कहा है आपने बहुत गहरा अर्थ छिपा है इन पक्तिंयों के पीछे एक सच्चा देशवासी इस अर्थ को खूब समझ सकता है। बहुत-बहुत बधाई।
हैं क्षितिज के पार जो संभावनायें चीन्ह लें हम
और उनसे ज्योर्तिमय कर लें सभी अपनी दिशायें
ओ अपरिचित आओ हम तिम शब्द से परिचय बढ़ायें
----बहुत ही खुब, राकेश भाई..सुंदर, मजा आ गया.
सीमाजी,दिव्याभ,भावनाजी रवीन्द्रजी आभारी हूँ
बेजी,मुझे प्रतीक्षा है अब, शब्द नये कुछ तुमसे पाऊं
मैने किया सुधार वर्तनी में रवीन्द्रजी,जो इंगित था
औ' समीर तुम नहीं प्रेरणा दो तो गीत कहां गा पाऊं
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