रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की

प्रीत का गीत बन गुनगुनाने लगा, शब्द ने छू लिये आपके जो अधर
रश्मियाँ स्वर्णमय हो गईं भोर की, आपने उनको देखा जरा आँख भर
कुन्तलों ने हवाओं की डोरी पकड़, एक ठुमका दिया तो घटा घिर गई
पेंजनी की खनक पर लगीं नाचने,करके श्रॄंगार संध्या निशा दोपहर.

Comments

बहुत खूब!
Udan Tashtari said…
बहुत उम्दा.
Parul said…
SARAS...SUNDAR
अतुल said…
बहुत बढिया.

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