तूमन केवल स्वप्न ही दिये

तुमने मुझको स्वप्न कुछ दिए
लेकिन तुमने स्वप्न ही दिए

​नील 
 गगन के परे सुवासित औ 
​पुष्पित 
राहों 
​के 
निज पाशों में  रखे बाँध कर हर पल उन  बाहों के 
धवल चाँदनी  में अंगड़ाई ले, संदली हवा के 
सांस सांस भर तृप्ति प्राप्त करती, बढ़ती चाहों के 

रहा खोजता मैं उत्तर, पर 
तुमने केवल प्रश्न ही दिए 

प्रश्न स्वप्न की इस दुनिया का पथ है शुरू कहाँ से
जो सभाव्य बताते उसको संभव करे जहाँ से
प्रतिबिम्बो के आकारों के आयामों को नापें
आदि अंत की रेखाओं का कर दें अंत कहाँ पे

मांगीमाल उत्तरों वाली
तुमने मुझको यत्न ही  दिए

यत्न किये निशि वासर इन लंबी राहों पर चलते
जिन पर कभी मंज़िलों के साये भी आ न पड़ते
होते है आरम्भ, अंत  पर जिनका कही नहीं है
और नीड भी संध्या के, पाथेयो में ही ढलते

परिणति की अभिलाषाओं को
अंतशेष भी भग्न ही दिए

 
तूमन केवल स्वप्न ही दिये

रचना करती है अभिनंदन

क्षमता नहीं किसी में सुन ले
उसके लेखन में गुंजायश
सबका है अपना विज्ञापन

किस रचना को गया सराहा
किसने देखे है सम्मेलन
कौन शब्द दे करे उजागर
किसी हृदय का अन्तर्वेदन
 कहाँ कहाँ पर मिला मान है
और छपी है कितनी पुस्तक
आत्म प्रशंसा के सब  साधन 

किस रचना के योगदान पर
कितने मंच रहै है निर्भर
किस रचना  का शिल्प आनूठा
हावी हुआ सभी के उपर 
कितनी हुई संकलित अब तक
और संकलन का कितनो के
कितनी बार किया संपादन   

बीए एमए पी एच डी की
कितनी सनद बटोरी अब तक
भाषा औ व्याकरण कहां तक
द्वारे आकर देते दस्तक
आलोचक आ शीश झुकाते
करते हैं साहित्यकार का
सांझ सवेरे बस आराधन
ऐसे अद्भुत स्वतःप्रशंसक
का रचना करती अभिनंदन
 

बड़ी दूर का सदेशा इ

बड़ी  दूर का सदेशा इक बाँसुरिया की टेर पकड़ कर
गिरती हुई ओस की गति से पुरबा के संग बहता आया 

​गंधों की मचली लहरी की लहर लहर में घुला हुआ सा 
सावन की पहली फुहार में भीग भीग कर धुला हुआ सा  ​
क्षिति के सिरे चमकती सोनहली किरणों की आभायें ले 
खोल सके मन का वातायन, इस निश्चय पर तुला हुआ सा 

गलियारे   के   द्वार   बंद थे, पहरे लगे हुए राहों में 
फिर भी तोड़ सभी बाधाएं धीमे से आँगन में आया 

संदेशों में गुंथी हुई थी मन की कल्पित अभिलाषाएं
अक्षर अक्षर में संचित थी युगों युगों कु प्रेम कथाए
वासवदत्ता और उदयन की, साथ साथ नल दमयंती की
साम्राज्यों की रूप प्रेम के करता आ असीम सीमाएं

जल तरंग के आरोहों के अवरोहो के मध्य कांपती
उस ध्वनि की कोमलता में लिपटा लाकर संदेश सुनाया

 बड़ी दूर का संदेशा वह आया था बिन संबोधन के
और अंत में हस्ताक्षर भी अंकित नही किसी प्रेषक के 
क्या संदेशा मेरे  लिए है या फिर किसी और का भटका
उठे अचानक प्रश्न अनगिनत, एक एक कर रह रह कर के

बड़ी दूर का संदेशा।    यह देश काल की सीमाओं से
परे ,रहा है किसका, किसकी खातिर है ये समझ न आया
 

अकेले उतने हैं हम

जितनी संचारों की सुविधा बढी, अकेले उतने हैं हम
केवल साथ दिया करते है अपने ही इक मुट्ठी
​ भर​
  गम 

राजमार्ग पर दौड़ रही है उद्वेलित बेतार तरंगें
पगडंडी पर अंतर्जाल लगाये बैठा अपने डेरे
हाथों में मोबाइल लेकर घूम रहा हर इक यायावर
लेकिन फिर भी एकाकीपन रहता है तन मन को घेरे

​घँटी  तो बजती है​ पर आवाज़ न कोई दिल को छूती 
मन मरुथल की अंगनाई मे दिखते अपनेपन के बस  भ्रम 

हरकारे के कांधे वाली झोली रिक्त रहा करती है
मेघदूत के पंथ इधर से मीलो दूर कही मुड़ जाते
पंख पसारे नही कबूतर कोई भी अब नभ में जाकर
बोतल के संदेशे लहरों की उंगली को थाम
​ ​
 न पाए

दुहराना
​ ​
 चाहा
​ ​
 अतीत के साधन आज  नई दुनिया में
असफल होकर बिखर गए  पर सारे के सारे
​ ही ​
 उद्यम 

बडी दूर का संदेशा हो या फिर कोई
​ कही​
 निकट का 
सुबह
​ उगी 
 जो आस टूट कर बिखर गई संध्या के ढलते
टेक्स्ट फेसबुक ट्विटर फोन ईमेल सभी पर बाढ़ उमड़ती
लेकिन कोई एक नही है जिसको हम अपना कह सकते

संचारों के उमड़ रहे  इन  बेतरतीबी  सैलाबों  में
सब कुछ बह जाता है, रहती केवल सन्नाटे की सरगम

हार है या जीत मेरी

 ज़िन्दगी ने जो दिया वह हार है या जीत मेरी
जानता हूँ मैं नही, स्वीकार करता सिर झुकाकर

आकलन आधार है बस दृष्टिकोणों के सिरे का
जीत को वे हार समझेंहार को जयश्री बना दें
एक ही परिणाम के दो अर्थ जब भी है निकलत
ये जरूरी है उन्हें तबहम स्वयं निस्पृह बता दें

सौंपती है ज़िन्दगी वरदान ही तो आजुरी में
ये मेरा अधिकार उनको रख सकूं कैसे सजाकर

हार दिखती सामनेही जीत का आधार होती
ठोकरों ने ही सिखाया पग संभल रखना डगर में
राह की उलझन उगाती  नीड के अंकुर हृदय में
और देती है नए  संकल्प  के  पाथेय  कर में 

मजिलो की दूरियां  का संकुचित  होना सुनिश्चित
देर तब तक है रखू मैं  पांव को  अपने उठाकर 

हार हो या जीत हो यह तो भविष्यत ही  बताये
कर्म पर अधिकार अपना फ़ल प्रयासों पर टिका है
शत  युगों का ज्ञान। अर्जित यह बनाता संस्कृतियां
विश्व  की हर एक भाषा की किताबों में लिखा है

हार हो या जीत, दोनों शब्द हैं ! शाश्वत नहीं है

एक इंगित ही समय का, अर्थ बदले मुस्कुराकर

आओ बैठें बात करें

आओ बैठें बात करें

बहुत हो चुकी कविता गज़लें
काटी राजनीति की फ़सलें
कुछ पल आज चैन से कट लें
छेड़ विगत का अम्बर, यादों की मीठी बरसात करें

चक्करघिन्नी बने घूमते
कोई अनबुझी प्यास चूमते
बीत रहे हैं  दिवस टूटते
करें दुपहरी सांझ अलस की, सपनों वाली रात करें

आज फ़ेसबुक पीछे छोड़ें
और ट्विटर से निज मुख मोड़ें
व्हाट्सएप्प का बन्धन तोड़ें
और साथ अपने जीवन को, हम अपनी सौगात करें

आओ बैठें बात करें

एक दीपक  जला कर

दृष्टि अपनी बिछाये प्रतीक्षा रही, एक दीपक  जला कर रखे द्वार पर
दिन के दरवेश ढलती हुई सांझ मैं लौट कर के गली में चले आएंगे

अंश पाथेय के मुँह मसोसे रहे भोर उनकी  न उंगली पकड कर चली
और पूरा हुआ एक सपना नहीं कर सकें तय बिछी राह की दूरियां
सूर्य का रथ सजे इससे पहले सजे आतुरा नैन में स्वप्न आंजे हुये
राह में अग्रसर हो रहे पांव ने दी नहीं किन्तु पल की भी मंजूरियां

एक दीपक जला कर रखा आस का कल नई भोर में होंगे संकल्प नव
और यायावरी मन नई राह के साथ उनका निभाने चले आएंगे

भग्न
​ मन्दिर की खंडित पडी मूर्तियां रह गई है उपेक्षित  पुनः शाम को 
आस्था की पकड़ डोर चलते हुए हाथ छूते नहीं घंटियों का सिरा 
वाटिकाएँ उजड़ कर हुई ठूंठ बस, तितलियाँ औ मधुप दूर ही रह गए 
एक युग हो गया पाँव पर मूर्ती के फूल कोई कभी जब था आकर गिरा 

फिर भी विश्वास है एक दिन तो कभी, कोई दीपक जलाकर रखेगा यहां 
फिर समय करवटें जब बदल कर चले, भाग्य बिगड़े हुए भी संवर जाएंगे 

तुलसी अंगनाई की सूख कर झर गईं बिन पिये जल, समेटे हुये आरती 
एक दीपक जला कर न चौरे रखा, सांझ आई,  थी, मूम्ह मोड़ फ़िर से गई
ंंत्र के बोल होंठों से रूठे रहे कोई संकल्प की आंजुरि न भरी
और
​ एकांत टिक टिक किये जा रही, लटकी दीवार पर की घड़ी की सुई

फिर भी विश्वास की इक किरण जागती, एक दीपक जला कर रखेगा कोई
संस्क्रुति की धरोहर बने वांन्मय, फिर्र अधर पर सजे गीत बन जायेंगे

मौसम की गलियारों में

मौसम की गलियारों में बिखरा अब सूनापन है

धूप जवानी 
​की 
सीढ़ी चढ़ हो आवारा घूमे
तड़के उठ कर ढली सांझ तक चूनर को लहराये
ताप रूप का अपने बरसा, करती दिन आंदोलित
मुक्त कंठ से पंचम सुर में अपनी स्तुतियाँ गाये

बादल के टुकड़ों से नभ की बढ़ी हुई अनबन है

पनघट ने कर लिया पलायन कहीं दूसरे गाँव
तरुवर दृश्य देखते, लज्जित निज छाहों में सिम
​टे 
चौपालो ने दरवेशों को कहा 
​अ
वांछित कल ही
तले नीम के खड़ी दुपहरी बस एकांत लपेटे

सन्नाटे की मौन स्वरों में गूँज रही रुनझुन हे

 दी उतार रख हरी चूड़ियां, दूब हुई बादामी
​पिछवाड़े की बगिया का पथ भूली सोनचिरैया ​
प्यास लिपस्टिक बनी हुई होठों का साथ न छोड़े
 शाख शाख पर निर्जनता ही करती ता ता थैया

 तन पर मन  पर अलसाएपन का 
​आ ​
जकड़ा बंधन है

शब्द ​वे आखिर कहाँ हैं

मुखड़ा बनें गीत का मेरे या फिर किसी गजल का मतला
शब्द 
​वे आखिर कहाँ हैं, ढूँढता संध्या सकारे 

जो हृदय के तलघरों की भावनायें व्यक्त कर दें
स्वर जिसे कह ना सका उस बात में संगीत भर दें
कण्ठ की अंगनाई से चल आई देहरी परअधर की
एक उस अनुभूति को जो सहज ही अभिव्यक्त कर दें

शब्दकोशों के पलटते पृष्ठ दिन कितने बिताए
शब्द आखिर हैं कहाँ वे, कोई तो उनका पता दे

 शब्द जो छाए हुये हर एक भ्रम को काट डालें
शब्द देकर अर्थ, अर्थों को कोई नूतन दिशा दें
दो दिलों के मध्य की गहरी घनेरी घाटियों का
सेतु बन कर बिछ गई ये दूरियां सारी मिटा दें

शब्द
​ ​
आखिर हैं कहाँ वे,जो रहे असि धार बन कर
औरनजिनकी आन रखने प्राण हर कोई लुटा दे

शब्द जिनको साथ लेकर्र मेघदूतम नभ विचरते 
शब्द बन कर रूप, रम्भा- उर्वशी को चित्र करते
शब्द वे  शचि के गिरा जिनसे नहुष नीचे धरा पर 
शब्द
​  ​
जिनसे मोरध्वज के पुत्र बिन संकोच कट्ते

आज
​ ​
जो भी सामने हैं, अर्थ खो निष्प्राण वे सब
शब्द आखिर हैं कहाँ ,इतिहास जिनको कल पुकारे 

नए अर्थ दे दू शब्दों को


​अनुमति 
अगर तुम्हारी हो तो नए अर्थ दे दू शब्दों कोऔर छंद में उन्हें पिरो कर मैं इक नया गीत लिख डालूँ


बदली की पायल से बिखरी हैं सुर बन कर जो सरगम के
उन्हें कहू मैं चिकुर सिंधु मे छितराये अमोल कुछ मोती
दामिनियों की पेंजनियों से हुई परावर्तित किरणें है
उन्हें नाम दूं उस चितवन का ढली साँझ जो चितवित होती

नए कोष के पृष्ठ अभी तो सारे के सारे हैं कोरे
परिभाषा की नई नई परिभाषा 
से उ​नको रंग डालूँ


चढ़ती हुई रात की  बगिया के सुरमाये से झुरमुट से
तोडू फूल और फिर गूंथू कुछ की वेणी कुछ के गजरे
अम्बर में खींचा करती हैं मन्दाकिनिया जो रांगोली
उसको बना बूटियाँ कर दूं रंग हिनाई ज्यादा गहरे

पुरबा के ​अल्हड झोंके सा लहराता​ यह ​​ गात तुम्हारा
अनुमति दो तो भित्तिचित्र कर इसको अपने स्वप्न सजा लूँ

 उगी धूप  जो  ओससिक्त ​ पाटल  पर करती है  हस्ताक्षर
उसको दे विस्तार बना दूँ एक भूमिका नई ग़ज़ल की 
खिड़की के शीशों पर खिंचती  हुई इंद्रधनुषी रेखाएं 
उन्हें बनाऊं भंगिम स्मितियाँ अधर  कोर से जो हैं छलकी

दिनं के   पन्नों पर दोपहरीसंध्या नाम लिखा करती जो 
अनुमति हो तो उसे तुम्हारा कह कर नव इतिहास बना लूँ 

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...