क्यों न कहो मैं गीत सुनाऊँ ?

क्यों न कहो मैं गीत सुनाऊँ ?
संभव नहीं छंद से टूटे शब्दों को सुर से गा पाऊँ


तुम्हें विदित है और मुझे भी सॄष्टि एक लय में है गतिमय
एक छन्द सा अनुशासित है नक्षत्रों तारों का विनिमय
बिन लगाम के रथ को घोड़े, ले जाते कब सही दिशा में
और योजनाहीन हुआ कब वांछित को पा लेना भी तय

आज तोड़ कर बन्धन फिरते हुए शब्द जो आवारा हैं
कितनी बार उन्हें मैं उनकी सीमा में चलना सिखलाऊँ

जाते जाते नई भोर से जो कहती हैं बूढ़ी रातें
उसमें छुपी हुई रहती हैं अनुभव की अनगिन सौगातें
लेकिन दंभ दुपहरी का उनको नकार कर कह देता है
अर्थहीन सब बीते कल के साथ गईं जो .बीती बातें

तब ऐसी उच्छॄंखलता को समझाने की कोशिश करता
सोच रहा हूँ आखिर कितनी देर और मैं समय गंवाऊं

गंध बदलती है क्या बोलो कभी कहीं शीतल चन्दन की
धारायें परिवर्तित होतीं कब जन्मों के अनुबन्धन की
बदले हुए वक्त की देते हैं दुहाई केवल अशक्त ही
दॄढ़ निश्चय ही तो सक्षमता होती है दुख के भंजन की

आज समर्पित होकर बैठे घुटने टेक और गर्वित हो
तुम बतलाओ क्यों उनकी प्रतिमा के आगे शीश नवाऊँ

पतझड़ का अध्याय खुला

देते हैं हम नित्य ज्योति को आवाज़ें
लेकिन नहीं दीप में आ बाती जलती

हमने जब जब भी बहार की पुस्तक के
पन्ने खोले,पतझड़ का अध्याय खुला
मिला जिसे आशीष नहाओ दूधों से
हर वह सपना मिला आक के दूध धुला
आशायें पल्लवित हुईं लेकिन ऐसे
जैसे सरसों जमती खुली हथेली पर
दोपहरी की धूप ढूँढ़ ले या जैसे
बिन्दु ओस के आधी खिली चमेली पर

ठोकर खाकर गिरे और फिर उठे संभल
लेकिन फिर से ठोकर भूमिसात करती

खड़े हुए व्यवधान बने थे दरवाज़े
अंगनाई इसलिये पगों से दूर रही
दीवारों पर चिपकी हुईं चार कौड़ी
अपने मद में इतराती हो चूर रही
टुटे हुए सीप के टुकड़े ऊंगली की
रहे पहुंच से परे सूत भर हो आगे
देहरी की अल्पना अधूरी रंग बिना
खोये रंग नहीं मेंहदी के भी जागे

और खिड़कियाँ ताक लगाये थी बैठीं
कोई परछाईं ही आये पग धरती

हमने जो आकाश समेटा मुट्ठी में
वह सूरज चंदा तारों से विलग रहा
उल्कायें आ बैठीं बिन आमंत्रण के
धूमकेतु जो आया वापिस नहीं गया
नदिया नहीं पर्वतों से बाहर निकली
सूख गई बोई आशाओं की क्यारी
और धरोहर एक आस्था की जो थी
टूट टूट कर तिल तिल बिखरी बेचारी

पीकर सब संकल्प निराशा एक घनी
बैठी हुई उबासी ले पंखा झलती

बिखरी है हर बार ज़िन्दगी पन्नों सी
कोई वापिस आकर क्रम से नहीं बँधा
बिगड़ा रहा संतुलन लम्हे लम्हे का
किसी घड़ी के कांटे के संग नहीं चला
फूल लिये हाथों में, अक्षत बिखर गये
और अर्चना के श्लोक अधूरे थे
रहे नाचते सदा इशारों पर जिनके
कोई मदारी न था, सभी जम्हूरे थे

लिये प्रतीक्षा बैठे हुए चाँदनी की
देखें आखिर कब ये मावस है ढलती

उत्तर सारे मौन रह गये

उत्तर सारे मौन रह गये हैं प्रश्नो के इन्तज़ार में
तुमने पूछा नहीं अभी तक कितना प्यार तुम्हें करता हूँ

शब्द प्यार की गहराई को बतला पायें क्या है संभव
मन के बन्धन होठों पर आ जायें ये होता है कब कब
सौ सौ साखी लिख कर भी जो व्यक्त कबीरा कर न पाया
मीरा के इकतारे ने ये भेद और ज्यादा उलझाया

मेरी कोशिश उन भावों को अपने, मीत, तुम्हें समझाऊं
इसीलिये तो लिये प्रतीक्षा प्रश्नों की तुमको तकता हूँ

मज़दूरी से जितना करतीं किसी श्रमिक की सुदॄढ़ बांहें
कुंकुम से करतीं दुल्हन की स्वप्न सजाती हुई निगाहें
प्यासी धरती जितना करती सावन के पहले बादल से
पोर उंगलियों के करते हैं असमंजस में जो आंचल से

आशान्वित हूँ तुम पढ़ लोगे नयनों में जो लिखी इबारत
जिसके अक्षर अक्षर में मैं तुमको ही चित्रित करता हूँ

जितना प्यार गज़ल से करता, विरह-पीर से हो स्वर घायल
जितना थाप करे तबले से, करे नॄत्य से जितना पायल
सागर करता, शंख सीपियां अपने ह्रदय सजा कर जितना
मंदिर करे आरती से ज्यों, करे नैन से जितना काजल

बन्धन तोड़ सभी संकोची,तुम्हें आज मैं बता सकूंगा
नित्य भोर की प्रथम किरण के सँग संकल्प किया करता हूँ

निद्रा आ उन्हें फिर भेड़ती है

खोलता हूँ नैन के पट, मैं तुम्हारे स्वप्न का स्वागत करूंगा
किन्तु बारम्बार निद्रा आ उन्हें फिर भेड़ती है

जानता हूँ हो मेरे अहसास की अनुभूतियों में तुम हमेशा
पर नहीं आकर उतरता चित्र कोई भी नयन में
कर रहा महसूस मैं सान्निध्य पल पल पर तुम्हारा प्राण सरिते
बन नहीं पाता मगर आकार आकर के सपन में
हो विलग रहते नहीं हो मीत मुझसे एक पल के भी लिये तुम
तुम मेरे अस्तित्व का आधार तो हो, स्वामिनी हो
हैं जुड़े ये प्राण, धड़कन, सांस गतिक्रम एक तुम ही से सुनयने
ज़िन्दगी के साज की सरगम तुम्हीं हो, रागिनी हो

इसलिये मैं एक तुम को ही सदा आवाज़ देता हूँ विजन में
प्राण की शहनाई को सुधि हर घड़ी आ छेड़ती है

वे विगत के पल तुम्हारे चित्र हो सहयात्री चलते रहे है साथ मेरे
आज मेरे सामने फिर से खड़े आकर अचानक हो गये हैं
ये तुम्हारे रेशमी कुन्तल घटाओं में संवर कर कल घिर थे नील नभ पर
आज फिर से कल्पना की बदरियों में नीर भरने लग गये हैं
नैन में तिरतीहुई परछाइयों में जो उभरते थे हजारों कुमकुमों से
आस के वे दीप फिर से ज्योतिमय हो सज रहे बन कर दिवाली
और वे पल जो सदा ही मौन उत्तर बन गये थे प्रश्न के जो आये थे मेरे अधर पर
देखते हैं वे मुझे अब पास आकर हैं खड़े बन कर सवाली

स्वप्न इक विश्वास का मंझधार के नाविक सरीखा टूटता मस्तूल थामे
और धारा दूर तट पर से खड़ी होकर मुझे फिर टेरती है

इस भटकती ज़िन्दगी का कौन सा पथ कौन मंज़िल कौन जाने
भेद ये खुल पायेगा इसका नहीं अनुमान भी लग पा रहा है
है कोई धुन, कोई स्वर है, कोई सरगम राग कोई,वाद्य कोई
पर विदित होता नहीं है कौन इसको कौन सी पादान पर से गा रहा है
हो रहा महसूस जो, जाना हुआ सा किन्तु थोड़ा सा अपरिचित भी लगे है
थामता है उंगलियों को दूर से मेरी बिना कोई परस के
और खुलते बन्द होते रात दिन के जो पड़े परदे त्रि-अंकी नाटकों पर
कर रहे हैं चेतना के सब निमिष प्यासे मगर केवल दरस के

फिर अचानक एक बोझिल सा कोई सन्दर्भ का टूटा हुआ टुकड़ा उठाये
सान्द्र कोहरे में सनी एकाकियत आ कर मुझे फिर घेरती है

कल्पना के चित्र मेरे

बढ़ रहे हैं हर डगर में आजकल कोहरे घनेरे
और धुंधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे

रह गये हैं आज स्मॄति की पुस्तकों के पॄष्ठ कोरे
खोल कर पट चल दिये हैं शब्द आवारा निगोड़े
अनुक्रमणिका से तुड़ा सम्बन्ध का हर एक धागा
घूमते अध्याय सारे बन हवाओं के झकोरे

ओढ़ संध्या की चदरिया, उग रहे हैं अब सवेरे
और धुंधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे

हैं पुरातत्वी शिलाओं के सरीखे स्वप्न सारे
अस्मिता की खोज में अब ढूँढ़ते रहते सहारे
जुड़ न पाती है नयन से यामिनी की डोर टूटी
छटपटाते झील में पर पा नहीं पाते किनारे

हैं सभी बदरंग जितने रंग उषा ने बिखेरे
और धुंधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे

भित्तिचित्रों में पिरोतीं आस कल जो कल्पनायें
आज आईं सामने लेकर हजारों वर्ज़नायें
व्यक्तता जब प्रश्न करती हाथ में लेकर कटोरा
एक दूजे को निहारें, लक्षणायें व्यंजनायें

शेष केवल मौन है जो दे रहा है द्वार फेरे
और धुँधले हो रहे हैं कल्पना के चित्र मेरे

लेकिन संबोधन पर

सोचा मैने लिखूँ तुम्हें इक पत्र ह्रदय के भावों वाला
लेकिन संबोधन पर आकर अटकी रही कलम बेचारी

चाहा लिखूँ चम्पई फूलों के रंगों के पाटल वाली
चाहा लिखूं अधर पर खिलते कचनारों की लाली वाली
सोचा लिखूं सुधा का झरना देह धरे उतरा है भू पर
केसर में भीगी हो चन्दन की गंधों से महकी डाली

शतरूपे ! पर सिमट न पाता शब्दों में विस्तार रूप का
शब्दकोश ने हार मान कर दिखला दी अपनी लाचारी

सोचा छिटकी हुई ज्योत्सना लिखूँ शरद वाली पूनम की
सोचा लिखूँ प्रथम अँगड़ाई, फ़ागुन के बहके मौसम की
प्राची के मस्तक पर रखती हुई मुकुट इक रश्मि भोर की
याकि प्रेरणा एक सुखद तुम, लिखूं अजन्ता के उद्गम की

कलासाधिके ! कोई तुलना न्याय नहीं तुमसे कर पाती
क्या मैं देकर नाम पुकारूँ, बढ़ती रही मेरी दुश्वारी

सॄष्टा की जो मधुर कल्पना, कैसे उसको कहो पुकारूँ
जो है अतुल उसे मैं केवल शब्दों से किस तरह संवारूँ
चित्रलिखित हैं नयन और वाणी हो जाती है पाषाणी
तब भावों की अभिव्यक्ति को, किस सांचे में कहो उतारूँ

मधुर सरगमे ! एक नाम से सम्बोधित कर सकूँ असंभव
एक फूल में नहीं समाहित होती गंध भरी फुलवारी

इसीलिये संबोधन पर आ अटकी रही कलम बेचारी

यादों का मौसम

यों तो मौसम अनगिन आते रहे और बीते
एक तुम्हारी यादों का केवल दिन रात रहा

जब जब चली भोर संध्या में झोंकों भरी हवा
तब तब आई उमड़ तुम्हारी यादों की बदली
-रहा भेजता आमंत्रण पल पल उसको सावन
लेकिन मेरा द्वार छोड़ कर गई नहीं पगली
बुनती रही तितलियों के पंखों पर स्वप्न नये
मीत तुम्हारे तन की गंधें, रंगों में भर कर
सेमल के उड़ते फ़ाहों पर अंकित नाम किया
एक तुम्हारा, उगी चाँदनी की आभा लेकर

एक निमिष भी उसकी चादर, जरा नहीं सिमटी
सूरज की किरणों ने आकर कितनी बार कहा

करे कार्तिक दीपों की अगवानी की बातें
या फ़ागुन खेतों को भेजे सोने के गहने
हरे गलीचे करें तीज का स्वागत पथ बिछकर
आँगन देहरी, रंगबिरंगी राँगोली पहनें
चित्र तुम्हारे ही ओढ़ा करती हैं दीवारें
और अजन्ता एलोरा की गलियाँ बन जातीं
खिड़की की सिल पर आ बैठी एक कोई कोयल
एक तुम्हारे स्वर से उपजा हुआ राग गाती

दिन-दोपहरी, माघ-फूस, जेठों-बैसाखों में
एक यही गतिक्रम है जो सांसों के साथ रहा

घिरे गगन-गंगा के तट पर तारों की छाया
करे चाँदनी चन्दा से या प्यार भरी बातें
बेला फूले, महक लुटाये गमक रातरानी
धुली रोशनी से चमकी हों उजियारी रातें
पल की धड़कन दोहराते बस एक नाम केवल
जिसका है प्रारंभ तुम्ही से, और अंत तुम पर
लहरें, भंवरे, बुलबुल, मैना तारों की सरगम
सब दुहराते, और पपीहा गाता है वह स्वर

मौसम कभी बदल पायेगा जब जब यह सोचा
रेतीले टीलों सा वह भ्रम था, हर बार ढहा

कितनी और उम्र बाकी है

हर मौसम फ़ागुन के रंगों में रंग लिया भावनाऒ ने
एक तुम्हारी छवि नयनों ने भित्तिचित्र कर कर टांकी है

अगवानी को आज पंथ पर पांखुर बन कर बिछीं निगाहें
पगरज को सिन्दूर बना लेने को आतुर हैं सब राहें
कौआ चांदी नित्य भोर से छतें लगीं हैं आज सजाने
रुकी हुइ पुरबाई पथ में, स्वागत करने फ़ैला बाहें

रजनी जाना नहीं चाहती, थकी प्रतीची उसे बुलाते
हो अधीर मुड़ मुड़ देखा है, राह तुम्हारी ही ताकी है

सुरभित आशायें प्राची को लगीं और लज्जानत करने
रंग अलक्तक के पांवों पर, लगे और कुछ अधिक उभरने
करने लगा बात बुन्दों से झूम झूम माथे का टीका
चन्द्रहार के माणिक मन की हर धड़कन को आये सुनने

सजने लगे अचानक सारे क्षण अनजाने ही कुछ ऐसे
स्वयं पी रही प्याले भर भर, सुधियों की पागल साकी है

मिलते स्पर्श तुम्हारा होगी मेंहदी से रंगीन हथेली
अँगनाई में अँगड़ाई लेगी आ आ कर भोर नवेली
कंगन के साजों पर चूड़ी छेड़ेगी नव मेघ मल्हारें
पुरबाई बाँहों में भर कर मुझे बनेगी नई सहेली

जागी हुई कल्पना आकर भरती मुझको मधुपाशों में
उम्र प्रतीक्षा वाली निशि की और नहीं ज्यादा बाकी है

आप- दो पहलू

रात ने अपना घूँघट हटाया नहीं, बाँग इक छटपटाती हुई रह गई
आँख कलियों ने खोली नहीं जाग कर, गूँज भंवरों की गाती हुई रह गई
आप मुझसे विमुख एक पल को हुए,यों लगा थम गई सॄष्टि की हर गति
पैंजनी तीर यमुना के खनकी नहीं, बाँसुरी सुर बजाती हुई रह गई


-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-0-

सांस के पॄष्ठ पर धड़कनों ने लिखी , आप ही से जुड़ी वो कहानी हुई
आप की चूनरी के सिरे से बँधी, रात की चूनरी और धानी हुई
आप पारस हैं ये तो विदित था मुझे, आज विश्वास मेरा हुआ और दॄढ़
आपकी देह की गंध को चूम कर, नीम की पत्तियाँ रातरानी हुई

आपके लिये नव वर्ष

हर दिवस हो नये गीत सा छंदमय, सांझ बन कर गज़ल की रवानी रहे
रात डूबी हुई प्रीत की गंध में चांदनी की नई इक कहानी कहे
बात निशिगंध से मिल चमेली करे, औ’ भरे मोगरा बाँह कचनार को
ऐसी छवियों से सज कर उमगती हुई, इस नये वर्ष की ॠतु सुहानी रहे

मुट्ठियों में संवरने लगे आपकी, आपकी कल्पनाओं का विस्तार सब
स्वप्न हर, भोर में प्रश्न करने लगे, नैन में से निकल शिल्प होना है कब ?
इस नये वर्ष में जितने आयाम हैं सब सिमटते रहें आपके द्वार पर
कामना के सुमन की भरी आंजुरि, आपके पगकमल पे चढ़ाता हूँ अब

नव वर्ष २०२४

नववर्ष 2024  दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे  अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...