पतझड़ का अध्याय खुला

देते हैं हम नित्य ज्योति को आवाज़ें
लेकिन नहीं दीप में आ बाती जलती

हमने जब जब भी बहार की पुस्तक के
पन्ने खोले,पतझड़ का अध्याय खुला
मिला जिसे आशीष नहाओ दूधों से
हर वह सपना मिला आक के दूध धुला
आशायें पल्लवित हुईं लेकिन ऐसे
जैसे सरसों जमती खुली हथेली पर
दोपहरी की धूप ढूँढ़ ले या जैसे
बिन्दु ओस के आधी खिली चमेली पर

ठोकर खाकर गिरे और फिर उठे संभल
लेकिन फिर से ठोकर भूमिसात करती

खड़े हुए व्यवधान बने थे दरवाज़े
अंगनाई इसलिये पगों से दूर रही
दीवारों पर चिपकी हुईं चार कौड़ी
अपने मद में इतराती हो चूर रही
टुटे हुए सीप के टुकड़े ऊंगली की
रहे पहुंच से परे सूत भर हो आगे
देहरी की अल्पना अधूरी रंग बिना
खोये रंग नहीं मेंहदी के भी जागे

और खिड़कियाँ ताक लगाये थी बैठीं
कोई परछाईं ही आये पग धरती

हमने जो आकाश समेटा मुट्ठी में
वह सूरज चंदा तारों से विलग रहा
उल्कायें आ बैठीं बिन आमंत्रण के
धूमकेतु जो आया वापिस नहीं गया
नदिया नहीं पर्वतों से बाहर निकली
सूख गई बोई आशाओं की क्यारी
और धरोहर एक आस्था की जो थी
टूट टूट कर तिल तिल बिखरी बेचारी

पीकर सब संकल्प निराशा एक घनी
बैठी हुई उबासी ले पंखा झलती

बिखरी है हर बार ज़िन्दगी पन्नों सी
कोई वापिस आकर क्रम से नहीं बँधा
बिगड़ा रहा संतुलन लम्हे लम्हे का
किसी घड़ी के कांटे के संग नहीं चला
फूल लिये हाथों में, अक्षत बिखर गये
और अर्चना के श्लोक अधूरे थे
रहे नाचते सदा इशारों पर जिनके
कोई मदारी न था, सभी जम्हूरे थे

लिये प्रतीक्षा बैठे हुए चाँदनी की
देखें आखिर कब ये मावस है ढलती

6 comments:

कंचन सिंह चौहान said...

हमने जब जब भी बहार की पुस्तक के
पन्ने खोले,पतझड़ का अध्याय खुला
मिला जिसे आशीष नहाओ दूधों से
हर वह सपना मिला आक के दूध धुला
kya baat hai

हमने जो आकाश समेटा मुट्ठी में
वह सूरज चंदा तारों से विलग रहा
bahut khoob

रहे नाचते सदा इशारों पर जिनके
कोई मदारी न था, सभी जम्हूरे थे
wah

मीत said...

कमाल है. बस कमाल है. किस किस पंक्ति, किस किस बात का ज़िक्र करूँ.

Udan Tashtari said...

अति उत्तम. शब्द नहीं होते आपकी तारीफ में, गुरुदेव:

लिये प्रतीक्षा बैठे हुए चाँदनी की
देखें आखिर कब ये मावस है ढलती

--क्या बात है-बहुत खूब!!!

महावीर said...

वाह! वैसे तो सारी ही कविता मस्तिष्क और हृदय को छू गई पर यह पंक्तियां बहुत ही सुंदर लगीं।

बिखरी है हर बार ज़िन्दगी पन्नों सी
कोई वापिस आकर क्रम से नहीं बँधा
बिगड़ा रहा संतुलन लम्हे लम्हे का
किसी घड़ी के कांटे के संग नहीं चला
फूल लिये हाथों में, अक्षत बिखर गये
और अर्चना के श्लोक अधूरे थे

Dr.Bhawna said...

बहुत अच्छी रचना है ,बहुत-बहुत बधाई...

नीरज गोस्वामी said...

अद्भुत शब्द...सुंदर भाव...क्या कहूँ..अभिभूत हूँ...वाह...वा....
नीरज

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में...