कौन तुम्हारे पाँव पखारे

 


चली हवाएं जब छूकर के चन्दन गात तुम्हारा रूपसि
उपवन में तब तब ही घिरकर लहराईं हैं मस्त बहारें 

ले चुम्बन आरक्त कपोलों का, अंगड़ाई  ली उषा ने 
प्राची की दुल्हन के मुख पर सज्जित हुई तभी अरुणाई 
रुका देख कर चिकुर तुम्हारे आवारा बादल का टुकडा 
तब सावन की श्याम घटाएं पीछे पीछे दौड़ी आई 

बरखा की मदमाती बूँदें,  करने लगी होड़  आपस में 
किस बदली के घर से निकलें और तुम्हारे पाँव पखारें 

थिरक पैंजनी ने जब छेड़ी मधुर रागिनी, जागी सरगम 
नए सुरों का लगी ढूँढने कैसे क्या वह दे सम्बोधन 
कगन से झुमके की गुपचुप सुनने को आतुर कलियों की
आपाधापी, उलझा उपवन कैसे कर पाए अनुशासन

पगतलियों का स्पर्श ओढ़ कर पथ की धूल हुई रोपहली
राह पड़ गई असमंजस में कैसे अपना रूप सँवारे

देख अलक्तक  की आभा को हरसिंगार लगा अकुलाने
एक बार जो पाए चुम्बन तो फ़िर हो जाए  कचनारी
कटिबन्धन का त्रिवली के भंवरों में  उलझ छनक जाने से 
प्रेरित होता पुष्पधन्व, तरकस से भर मारे पिचकारी 

सृष्टा मन कृति ! शब्द हीन होकर भाषा ये सोच रही है 
क्या कह कर के  सम्बोधन दे और तुम्हारा नाम पुकारे।

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