टूटते हर पल बिखरते

टूटते हर पल बिखरते स्वप्न  संवरे नयन मे जो
ये नियति ने तय किया है जिंदगी की इस डगर पर

हर संवरती भोर में अंगड़ाइयां ली चाहतो ने
सांझ तक चलते हुए दिन ने उन्हें पल पल निखारा
आस की महकी हहु पुरबाई की उंगली पकड़ कर
रात ने काजल बना कर आँख में उनको संवारा
 
 ईजिलों की पकड़ ढीली पर नजर के कैनवस पर
चित्र जितने भी उकेरे रंग रह जाते बिखर कर

 टूटते हर पल बिखरते जो जुड़े सम्बन्ध अपने
कर्जदारों के किये हर वायदे की उम्र जैसे
याकि पतझड़ के कथानाक पर लिखी लंबी कहानी
में किसी खिलती कली की पाँखुरी का ज़िक्र जैसे

मौसमों की संधिरेखा पर मिले जो मोड़ आकर
वे खिंची परछाइयों को देखते लौटे पलट कर

टूटते हर पल बिखरते शाख से कैलेंडरों की
पत्र जर्जर हो दिवस के रात की पगडंडियों पर 
 और पग ध्वनियाँ कहारों की उषा की पालकी के
पात्र कर रखती रही विध्वंस की नौचंदियों पर

सीखदी
​ इतिहास ​
 ​
 ने फिर से संभल के
​ ​
अग्रसर हो
हर कदम पर पाँव लेकिन रह गया पथ में
​ फ़िसल कर​

2 comments:

Udan Tashtari said...

ईजिलों की पकड़ ढीली पर नजर के कैनवस पर
चित्र जितने भी उकेरे रंग रह जाते बिखर कर

--बहुत सुन्दर!! ब्लॉग की शक्ल सूरत भी बदल गई...बेहतरीन!!

राकेश खंडेलवाल said...

जीवन में परिवर्तन आना आवश्यक है और उचित भी
रुके हुये पानी में दूषण अनायास ही बढ़ जाता है
गति ने अपनी दूरी कब है तय होने दी किसे यहं पर
परिवर्तन के साथ नित्य ही पथ खुद को बदले जाता है.

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