इस दिवाली पे लौटे वही चार पल

दीप दीपावली के जले आज फिर
आज फिर गंध आई दबे पांव चल
मीठी बातों की जो उस हवा में घुली
जिसकी गलियों से हम दूर आये निकल

गेरुओं से छलकती हुई प्यालियाँ
और खड़िया लिए वे कटोरे कई
बूटियों में उमंगें जगात हुए
उंगलियां फर्श पर थी थिरकती हुई
खांड से जो बने वे खिलौने लिए
खील से थी लबालब भरी हठ रियां
दीप की वातियां सूत में कातती
अनवरत नाचती घूमती तकलियां

कितने वर्षों के इतिहास की तह चढ़ी
पर लगे बस अभी बीत गुजरा है कल

पन्नियों से सजी थैलियों में भरे
माहताबो की लड़ियाँ, नई चकारियां
फुलझड़ी और पटाखे कई भाँति क​
नभ को छूती हवाई बनी सुर्रियां
हर गली और दूकान सजती हुई
भीड़ तेरस को उमड़ी सराफा गली
और हलवाइयों की चली और से
छवियां मन में मचाती हुई खलबली

याद की बिजलियाँ कौंधती कह रही
उस गली में बिताए पुनः चार पल

आज इस गाँव में दीप दिखता नहीं
चित्र ही बस टंगे घर की दिवार पर
स्वस्ति के चिह्न भी बंधनों में बंधे
अल्पनाएं भी दिखती नहीं द्वार पर
कोई कंदील लटकी नहीं है कहीं
आता कोई पड़ौसी न मिलने यहां
फेसबुक और वाट्स एप सन्देश है
अर्थहीनता, बना कर खड़े पंक्तियाँ

एक अवलंब केवल सुधी का रहा
भाव में डूब जब भी हुआ मन विह्वल
राकेश खंडेलवाल


1 comment:

Udan Tashtari said...

वाक़ई वो गंध आती तो है हर दिवाली के साथ

मुझे झुकने नहीं देता

तुम्हारे और मेरे बीच की यह सोच का अंतर तुम्हें मुड़ने नहीं देता मुझे झुकने नहीं देता कटे तुम आगतों से औ विगत से आज में जीते वही आदर्श ओ...