होकर के अज्ञात रह गये

घटनाओं से संदर्भो का
हम करते अनुपात रह गए
असमंजस की बही हवा में
बनकर सूखे पात बाह गए

कारण ढूँढा किये अकारण
उगे दिवस में ढली निशा में
पल मेंे कितने पल  है बीते
शेष शेष क्या भाग गुणा में
अर्धव्यास के एक बिंदु पर
थे तलाशते किसी वृत्त को
रहे देखते रात उतैरती
चुपके से आकर संध्या में

उलझन भरे अधूरेपन के
होकर हम निष्णात रह गए

लिपट धुंध की परछाई में
चले अनावश्यक के पीछे
दृष्टि टिकाये कंगूरों पर
देखि नहीं घाटिया नीचे
बिम्ब देख कर ही प्रपात का
उल्टी कर दी कर की छागल
बिना फ्रेम के कैनवास पर
चित्र बनाये आँखे मीचे

स्वप्नदृगी हम, वर्तमान से
होकर के अज्ञात रह गये

रही मानसिकताएं बंदी
अपनी, अनजाने बंधन में
रह न सके स्वच्छन्द कभी भी
भावों तक के संप्रेषण में
कठपुतली हम, हमें नचाते
अनदेखे हाथों के धागे
बिम्बविहीना रहे आजतक
अपने जीवन के दर्पण में

बिछी बिसातों पर मोहरे से
बिना चले, खा मात रह गए

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