मोहब्बत के बगीचे के अगर हम इक शजर होते
ज़माने की अलामत से सदा ही बेखबर होते
ये मुमकिन है कि करते हम, कहीं तकरीर बन लीडर
यकीं है और कुछ होते, न शायर हम मगर होते.
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
धरम के चोंचले ये सब जो जन्नत में गढ़े होते
जो हैं छोटे वे अपने कद से न ज्यादा बड़े होते
न ही तब मिशनरी होती, न होता धर्म परिवर्तन
जनमते ही धरम सीने पे बन तमगे जड़े होते.
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०
जब ह्रदय की पीर हमने ढाल शब्दों में बहाई
आपका संदेश आया है बधाई हो बधाई
यों लगा शुभकामनायें आपकी ये कह रही हैं
ज़िन्दगी भर रुक न पाये अब तुम्हारी ये रुलाई
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
नव वर्ष २०२४
नववर्ष 2024 दो हज़ार चौबीस वर्ष की नई भोर का स्वागत करने खोल रही है निशा खिड़कियाँ प्राची की अब धीरे धीरे अगवानी का थाल सजाकर चंदन डीप जला...
-
प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
-
मूर्च्छित है भावना, बिंध वक्त के पैने शरों से लेखनी हतप्रभ शिथिल है, मौन लेखन ओढ़ता है काल के तो चक्र चलते हैं सदा होकर दुधारे युद्ध तो थमता ...
-
इस पनघट पर तो छलकी हैं सुबह शाम रस भरी गगरैया लेकिन प्राणों के आँगन में तृषा रही बाकी की बाकी अधरों पर उग रही प्यास ने कितने ही झरने प...
6 comments:
हा हा,
वाकई बहुत ही अलग रंग के बल्कि यूँ कहिये कि रंग बिरंगे हँसते हँसाते मुक्तक है. बहुत बधाई. :)
राकेश जी, सुन्दर, अति सुन्दर
मोहब्बत के बगीचे के अगर हम इक शजर होते
ज़माने की अलामत से सदा ही बेखबर होते
ये मुमकिन है कि करते हम, कहीं तकरीर बन लीडर
यकीं है और कुछ होते, न शायर हम मगर होते.
वाह राकेश भाईसाहब, अद्भुत हैं आप।
राकेश जी बहुत सुंदर मुक्तक है,..आपका ये रंग पहली बार पढ़ा... बहुत अच्छा लिखते है आप,..
आपकी लेखनी हम लोगो के लिये एक प्रेरणा है।
सुनीता(शानू)
अब आप थोड़ा हटकर लिखने लगे हैं, पर हम तो कायल हैं आपके लेखन के, हमें तो ये मूड कुछ ज्यादा ही पसन्द आया।
बहुत-बहुत बधाई।
खूब कहा है!!!
Post a Comment