होंठ पर कुछ यूँ ही थरथराता रहा

गीत गाने मचलती रही रागिनी
शब्द पर होंठ पर छटपटाता रहा

रात के चित्र में रंग भरते हुये
चाँद के हाथ से गिर गई तूलिका
कोई तारा प्रकाशित नहीं हो सका
चाँदनी ने लिखी थी नहीं भूमिका
दॄष्टि की हर किरन पी गया था क्षितिज
मोड़ पर आई नीहारिका खो गई
और मंदाकिनी के तटों में उलझ
रह गई जो चली पंथ में सारिका

फिर अँगूठा दिखा उग रही भोर को
खिलखिलाते हुए तम चिढ़ाता रहा

ज्योति को पत्र लिख कर बुलाते हुये
पास की रोशनाई सभी चुक गई
शब्द के शिल्प गढ़ते हुए लेखनी
चूर थक कर हुई दोहरी झुक गई
अर्थ सन्देश के सब बदल तो दिये
मेघ ने दोष माना नहीं है मगर
कुमकुमों से सजी पालकी जो चली
गांव की राह से भी परे रुक गई

राख जल कर हुई आस की वर्त्तिका
रंग उसका गगन को सजाता रहा

डोरियाँ खींचते थक गई उंगलियाँ
सामने से अवनिका हटी ही नहीं
दीर्घा मंच के मध्य में थी तनी
धुंध गहरी ज़रा भी छँटी ही नहीं
पात्र नेपथ्य में ही छुपे रह गए
और अभिनीत पूरी कहानी हुई
पीर की पूँजियाँ खर्च करते रहे
किन्तु निधि से ज़रा भी घटी ही नहीं

शब्द चादर दिलासों की ओढ़े हुए
आँख में स्वप्न फिर ला सजाता रहा

हो रहे सब दिवस-रात यायावरी
कोई गंतव्य लेकिन कहीं भी नही
देव होकर प्रतीक्षित खड़े रह गये
थाल पूजा के लेकिन सजे ही नही
आरती आरती के सभी शब्द ले
घंटियों की धुनों में कहीं खो गई
धूप की धूम्र में थे अगरू देखते
दीप अँगड़ाई लेकर जगे ही नहीं

मंत्र कोई सजा न सका आके स्वर
होंठ पर कुछ यूँ ही थरथराता रहा

Comments

Udan Tashtari said…
गीत गाने मचलती रही रागिनी
शब्द पर होंठ पर छटपटाता रहा

हमेशा की तरह!!


अद्भुत!

वाह!
इस उहापोह में कब घंटे निकल जाते हैं, शब्द नहीं आते हैं। उनका साथ ही बहुत है मेरी यात्रा के लिये।
अतिउत्तम रचना । बहुत बहुत बधाई।
सुन्दर रचना!
--
मंगलवार के साप्ताहिक काव्य मंच पर इसकी चर्चा लगा दी है!
http://charchamanch.blogspot.com/
Harish said…
Kya khub kahi hai
गीत गाने मचलती रही रागिनी
शब्द पर होंठ पर छटपटाता रहा.
I like it.
flower delivery
रंजना said…
क्या कहूँ...

अद्भुत,अद्वितीय !!!
ana said…
shabda sanyojan ati sundar..bahut achchha likhte hai aap........badhai
sundar abhiveyakti...kamal ki lekhani hai aapki har baar kahana padata hai..badhai

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