धूप की डोरियों से बन्धे थे प्रहर
थीं घड़ी की सुई डगमगाती रहीं
बन बिखरती रही आज की झोंपड़ी
आस तिनके पे तिनका सजाती रही
कल जो आया ढला आज में, खो गया
फिर प्रतीक्षा संवरने लगी इक नई
दांये से बांये को, बांये से दांये को
मथ रही ज़िन्दगी, इक समय की रई
जो बिखर कर गिरा भोर के साथ में
साँझ आकर उसे बीनती नित रही
बाँध बन कर पलक ने रखी रोक कर
रात जैसे घिरी एक नदिया बही
शब्द छू न सके कंठ की रागिनी
सिसकियाँ होंठ पर कसमसाती रहीं
श्ब्द थे गूंजते रह गये कान में
हो अजर हो अमर एक अहिवात के
चाँदनी की धुली हर किरन पी गये
आ अंधेरे घिरे मावसी रात के
थे हथेली लगा ओक प्यासे अधर
पिघले आकर नहीं मेघ आषाढ़ के
छांह के बरगदों की कहानी मिटी
ठूंठ बाकी रहे बस खड़े ताड़ के
ज़िन्दगी आंख में स्वप्न फिर आंज कर
कल के स्वागत में दीपक जलाती रही
जब भी उठने लगे पांव संकल्प के
एक अवरोध था सामने आ गया
दॄष्टि तत्पर हुई दस्तकें दे क्षितिज
एक कहरा उमड़ कर घना छा गया
बांह आश्वासनों की पकड़ते हुए
थक गईं उंगलियां मुट्ठियां खुल गैंई
मन के ईजिल पे टांगे हुए चित्र में
जितनी रंगीन थीं, बदलियां धुल गईं
सब निमंत्रण बहारों के गुम हो गये
पतझरी थी हवा सनसनाती रही
और फिर अधखुले होंठ से वाणियाँ
मौन हो गीत इक गुनगुनाती रहीं
जो कहानी लिखी थी गई रात भर
थी धुंधलके मे रजनी नहाये हुए
चांदनी चांद से गिर के मुरझाई सी
आंख मलती हुई तारकों की किरण
ले रही टूटती एक अँगड़ाई सी
कक्ष का बुझ रहा दीप लिखता रहा
सांझ से जो शुरू थी कहानी हुई
लड़खड़ाते कदम से चले जा रही
लटकी दीवार पर की घड़ी की सुई
फ़र्श पर थी बिछी फूल की पाँखुरी
एड़ियों के तले बोझ से पिस रही
टूटती सांस की डोरियां थाम कर
खुश्बुओं से हवाओं का तन रंग रही
और खिड़की के पल्ले को थामे खड़ी
एक प्रतिमा किसी अस्त जुन्हाई की
शून्य जैसे टपकता हुआ मौन से
एक निस्तब्ध पल हाथ बाँधे ख्ड़ा
गुनगुनता रहा एक चंचल निमिष
जो समय शिल्प ने था बरस भर गढ़ा
बिन्दु पर आ टिका सॄष्टि के, यष्टि के
पूर्ण अस्तित्व को था विदेही किये
देहरी पर प्रतीक्षा लिये ऊँघते
स्वप्न आँखों ने जितने थे निष्कॄत किये
गंध पीती हुई मोतिये की कली
बज रही थी किसी एक शहनाई सी
डूबते राग में ऊबते चाँद को
क्या धरा क्या गगन सब नकारे हुए
एक अलसाई बासी थकन सेज पर
पांव थी बैठ, अपने पसारे हुए
रिक्तता जलकलश की रही पूछती
तॄप्ति का कोई सन्देश दे दे अधर
ताकता था दिया क्या हो अंतिम चरण
जो कहानी लिखी थी गई रात भर
भोर की इक किरन नीम की डाल पर
आके बैठी रही सिमटी सकुचाई सी
चांदनी चांद से गिर के मुरझाई सी
आंख मलती हुई तारकों की किरण
ले रही टूटती एक अँगड़ाई सी
कक्ष का बुझ रहा दीप लिखता रहा
सांझ से जो शुरू थी कहानी हुई
लड़खड़ाते कदम से चले जा रही
लटकी दीवार पर की घड़ी की सुई
फ़र्श पर थी बिछी फूल की पाँखुरी
एड़ियों के तले बोझ से पिस रही
टूटती सांस की डोरियां थाम कर
खुश्बुओं से हवाओं का तन रंग रही
और खिड़की के पल्ले को थामे खड़ी
एक प्रतिमा किसी अस्त जुन्हाई की
शून्य जैसे टपकता हुआ मौन से
एक निस्तब्ध पल हाथ बाँधे ख्ड़ा
गुनगुनता रहा एक चंचल निमिष
जो समय शिल्प ने था बरस भर गढ़ा
बिन्दु पर आ टिका सॄष्टि के, यष्टि के
पूर्ण अस्तित्व को था विदेही किये
देहरी पर प्रतीक्षा लिये ऊँघते
स्वप्न आँखों ने जितने थे निष्कॄत किये
गंध पीती हुई मोतिये की कली
बज रही थी किसी एक शहनाई सी
डूबते राग में ऊबते चाँद को
क्या धरा क्या गगन सब नकारे हुए
एक अलसाई बासी थकन सेज पर
पांव थी बैठ, अपने पसारे हुए
रिक्तता जलकलश की रही पूछती
तॄप्ति का कोई सन्देश दे दे अधर
ताकता था दिया क्या हो अंतिम चरण
जो कहानी लिखी थी गई रात भर
भोर की इक किरन नीम की डाल पर
आके बैठी रही सिमटी सकुचाई सी
मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
तुमने जो सम्बोधन देकर मुझे पुकारा खंजननयनने
बस उस के ही सन्दर्भों में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
फ़िसला हुआ अधर की कोरों से, चढ़ कर स्वर की लहरी पर
थाम हवाओं के झोंके की उंगलियाँ जो मुझ तक आया
मन में उमड़ रहे भावों की ओढ़े रंग भरी दोशाला
जिसे सांझ की परछाईं ने काजल करके नयन सजाया
वह इक शब्द कान के मेरे दरवाजे पर दस्तक देकर
जो कह गया उसी के क्रम में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
मध्यम से पंचम तक होती आरोहित जब जब भी सरगम
तब तब उसमें लिपटे सिमटे स्वर के अर्थ भिन्न हो जाते
कुसुमित मौसम की गागर से झरते हैं पांखुर से पल जब
तब मन की देहलीज बना कर नई अल्पनायें रँग जाते
नयनों की प्रत्यंचा खींचे, तुमने जो स्वर संधाने हैं
उनके पुष्पित शर की सीमा में, मैं उलझा हुआ अभी तक
सम्बोधन के शब्दों से ले कर अपने प्रतिबिम्बों तक में
सामंजस्यों के धागों की कड़ियाँ लेकर जोड़ रहा हूँ
जो अक्सर भ्रम दे जाते हैं, कुछ अस्पष्ट स्वरों के खाके
उनके कुहसाये चित्रों में , मैं परिभाषा जोड़ रहा हूँ
सपनों के गलियारे से चल आती हैं जो दोपहरी तक
सम्बोधन ले उन घड़ियों में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
बस उस के ही सन्दर्भों में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
फ़िसला हुआ अधर की कोरों से, चढ़ कर स्वर की लहरी पर
थाम हवाओं के झोंके की उंगलियाँ जो मुझ तक आया
मन में उमड़ रहे भावों की ओढ़े रंग भरी दोशाला
जिसे सांझ की परछाईं ने काजल करके नयन सजाया
वह इक शब्द कान के मेरे दरवाजे पर दस्तक देकर
जो कह गया उसी के क्रम में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
मध्यम से पंचम तक होती आरोहित जब जब भी सरगम
तब तब उसमें लिपटे सिमटे स्वर के अर्थ भिन्न हो जाते
कुसुमित मौसम की गागर से झरते हैं पांखुर से पल जब
तब मन की देहलीज बना कर नई अल्पनायें रँग जाते
नयनों की प्रत्यंचा खींचे, तुमने जो स्वर संधाने हैं
उनके पुष्पित शर की सीमा में, मैं उलझा हुआ अभी तक
सम्बोधन के शब्दों से ले कर अपने प्रतिबिम्बों तक में
सामंजस्यों के धागों की कड़ियाँ लेकर जोड़ रहा हूँ
जो अक्सर भ्रम दे जाते हैं, कुछ अस्पष्ट स्वरों के खाके
उनके कुहसाये चित्रों में , मैं परिभाषा जोड़ रहा हूँ
सपनों के गलियारे से चल आती हैं जो दोपहरी तक
सम्बोधन ले उन घड़ियों में, मैं हूँ उलझा हुआ अभी तक
कभी कभी गुनगुना लिया है
जो भी आधा और अधूरा शब्द मिला मुझको राहों में
मैने उसको पिरो छन्द में कभी कभी गुनगुना लिया है
जितनी देर टिके पाटल प
टपके हुए भोर के आंसू
उतनी देर टिकी बस आकर
है मुस्कान अधर पर मेरे
जितनी देर रात पूनम की
करती लहरों से अठखेली
उतनी देर रहा करते हैं
आकर पथ में घिरे अंधेरे
किन्तु शिकायत नहीं, प्रहर की मुट्ठी में से जो भी बिखर
आंजुरि भर कर उसे समेटा और कंठ से लगा लिया है
पतझड़ का आक्रोश पी गया
जिन्हें पत्तियो के वे सब सुर
परछाईं बन कर आते हैं
मेरे होठों पर रुक जात
खो रह गईं वही घाटी म्रं
लौट न पाईं जो आवाज़ेंं
पिरो उन्हीं में अक्षर अक्षर
मेरे गीतों को गा जाते
सन्नाटे की प्रतिध्वनियों में लिपटी हुई भावनाओं को
गूंज रहे निस्तब्ध मौन में अक्सर मैने सजा लिया है
यद्यपि रही सफ़लताओं स
मेरी सदा हाथ भर दूरी
मैने कभी निराशाओं का
स्वागत किया नहीं है द्वारे
थके थके संकल्प्प संवारे
बुझी हुई निष्ठा दीपित कर
नित्य बिखेरे अपने आंगन
मैने निश्चय के उजियारे
सन्मुख बिछी हुई राहों का लक्ष्य कोई हो अथवा न हो
मैने बिखरी हुई डगर को पग का सहचर बना लिया है
मैने उसको पिरो छन्द में कभी कभी गुनगुना लिया है
जितनी देर टिके पाटल प
टपके हुए भोर के आंसू
उतनी देर टिकी बस आकर
है मुस्कान अधर पर मेरे
जितनी देर रात पूनम की
करती लहरों से अठखेली
उतनी देर रहा करते हैं
आकर पथ में घिरे अंधेरे
किन्तु शिकायत नहीं, प्रहर की मुट्ठी में से जो भी बिखर
आंजुरि भर कर उसे समेटा और कंठ से लगा लिया है
पतझड़ का आक्रोश पी गया
जिन्हें पत्तियो के वे सब सुर
परछाईं बन कर आते हैं
मेरे होठों पर रुक जात
खो रह गईं वही घाटी म्रं
लौट न पाईं जो आवाज़ेंं
पिरो उन्हीं में अक्षर अक्षर
मेरे गीतों को गा जाते
सन्नाटे की प्रतिध्वनियों में लिपटी हुई भावनाओं को
गूंज रहे निस्तब्ध मौन में अक्सर मैने सजा लिया है
यद्यपि रही सफ़लताओं स
मेरी सदा हाथ भर दूरी
मैने कभी निराशाओं का
स्वागत किया नहीं है द्वारे
थके थके संकल्प्प संवारे
बुझी हुई निष्ठा दीपित कर
नित्य बिखेरे अपने आंगन
मैने निश्चय के उजियारे
सन्मुख बिछी हुई राहों का लक्ष्य कोई हो अथवा न हो
मैने बिखरी हुई डगर को पग का सहचर बना लिया है
गीत कोई कलम से झरा ही नहीं
प्रार्थना कर थकी छन्द की भूमिका
मुक्तकों ने कई बार आवाज़ दी
दोहे दस्तक लगाते रहे द्वार पर
सोरठे बन गये शब्द के सारथी
चन्द चौपाईयाँ चहचहाती रहीं
गुनगुनाती रही एक गम की गज़ल
थे सवैये प्रतीक्षा सजाये खड़े
बँध गया लय में अतुकान्त भी एक पल
भावना सिन्धु सूखा भरा ही नहीं
गीत कोई कलम से झरा ही नहीं
जो अलंकार थे अल्पना बन गये
भित्तिचित्रों में संवरी रही व्याकरण
देहरी रोलियों अक्षतों से सजी
कुछ अलग सा किये जा रही आचरण
पंथ जितने सुपरिचित रहे खो गये
दृष्टि का दायरा संकुचित हो गया
एक पल नाम जिस पर कभी था लिखा
वह न दिख पाया शायद कहीं खो गया
संचयित कोष जो था रखा पास में
वह कसौटी पे उतरा खरा ही नहीं
सांझ जब भी ढली नैन के गांव में
नींद आकर बजाती रही बांसुरी
तारकों की गली में भ्टकती रही
कोई संवरी नहीं स्वप्न की पांखुरी
याद के दीप जल तो गये अनगिनत
रोशनी वर्त्तिका में सिमट रह गई
जो सृजनशीलता है, कहीं खो गई
बात ये लेखनी से मसी कह गई
कल्पना अश्व अड़ कर खड़ा मोड़ पर
एड़ कितनी लगाईं बढ़ा ही नहीं
सांस करती तकाजा रही रात दिन
ज़िन्दगी उनकी मज़दूरियों को भरे
चक्रवॄद्धि हुआ ब्याज बढ़ता रहा
मूल तो हो रहा पीढियों के परे
हम थे असमर्थता की ध्वजायें लिय
बद्ध सीमाओं में छटपटाते रहे
और दिनमान सूखे हुए पात से
वर्ष की शाख से टूट जाते रहे
जो बही में लिखा वक्त ने, नाम था
देखा उसमें जमा था जरा भी नहीं
मुक्तकों ने कई बार आवाज़ दी
दोहे दस्तक लगाते रहे द्वार पर
सोरठे बन गये शब्द के सारथी
चन्द चौपाईयाँ चहचहाती रहीं
गुनगुनाती रही एक गम की गज़ल
थे सवैये प्रतीक्षा सजाये खड़े
बँध गया लय में अतुकान्त भी एक पल
भावना सिन्धु सूखा भरा ही नहीं
गीत कोई कलम से झरा ही नहीं
जो अलंकार थे अल्पना बन गये
भित्तिचित्रों में संवरी रही व्याकरण
देहरी रोलियों अक्षतों से सजी
कुछ अलग सा किये जा रही आचरण
पंथ जितने सुपरिचित रहे खो गये
दृष्टि का दायरा संकुचित हो गया
एक पल नाम जिस पर कभी था लिखा
वह न दिख पाया शायद कहीं खो गया
संचयित कोष जो था रखा पास में
वह कसौटी पे उतरा खरा ही नहीं
सांझ जब भी ढली नैन के गांव में
नींद आकर बजाती रही बांसुरी
तारकों की गली में भ्टकती रही
कोई संवरी नहीं स्वप्न की पांखुरी
याद के दीप जल तो गये अनगिनत
रोशनी वर्त्तिका में सिमट रह गई
जो सृजनशीलता है, कहीं खो गई
बात ये लेखनी से मसी कह गई
कल्पना अश्व अड़ कर खड़ा मोड़ पर
एड़ कितनी लगाईं बढ़ा ही नहीं
सांस करती तकाजा रही रात दिन
ज़िन्दगी उनकी मज़दूरियों को भरे
चक्रवॄद्धि हुआ ब्याज बढ़ता रहा
मूल तो हो रहा पीढियों के परे
हम थे असमर्थता की ध्वजायें लिय
बद्ध सीमाओं में छटपटाते रहे
और दिनमान सूखे हुए पात से
वर्ष की शाख से टूट जाते रहे
जो बही में लिखा वक्त ने, नाम था
देखा उसमें जमा था जरा भी नहीं
केवल एक तुम्हीं हो कारण
सरगम की सीमा ने अपनी सीमा तुम्हें देख कर ,मानी
कहा आठवें सुर की संरचना का एक तुम्ही हो कारण
रूप न कर पाई वाणी जब सातों सुर लेकर के वर्णित
शब्दों के अनथके प्रयासों ने केवल असफ़लता पाई
लहरों ने रह रह कर छेड़ी जलतरंग की मधुर रागिनी
जो कि तुम्हारे थिरके अधरों की रेखा तक पहुँच न पाई
उस पल भाषा ने नव अक्षर रच कर यह सन्देश सुनाया
शायद बिखरे असमंजस का हो पाये अब सहज निवारण
सुर से लेकर शब्दों तक की सीमा में ही गूँजा करती
जागी हुई भोर की परछाईं में घुलती हुई आरती
एक शिल्प के आकारों में कुछ गहराई और भर सके
मंदाकिनियां नभ से आकर प्राची के हैं पग पखारती
किन्तु शिल्प में ढले खंड भी पाषाणों के कह देते हैं
संभव नहीं तुम्हारे अंशों जितना भी पायें विस्तारण
प्रतिबिम्बित हो बरखा की बून्दों से किरन धूप की कोई
खींचा करती रंग पिरोकर चित्र कामना के, अम्बर में
सतरंगी पुष्पित कमान की प्रत्यंचा के सिरे थाम कर
आस बनाती तुम जैसी हो अभिलाषायें भर कर कर में
लेकिन रंगों का फ़ीकापन हो असहाय समर्पित होता
नये रंग के बीज मंत्र का तुमसे ही होता उच्चारण
माँ शारदा के चरणों में सादर नमन
श्वेत पत्रों से पंकज के फिसली हुई ओस की बूँद ढल स्याहियों में गई
बीन के तार के कम्पनों से छिटक एक सरगम आ सहसा कलम बन गई
फिर वरद हस्त आशीष बन उठ गया बारिशें अक्षरों की निरंतर हुईं
शब्द की छंद की माल पिरती हुई आप ही आप आ गीत तब बन गई.
माँ शारदा के चरणों में सादर नमन
बीन के तार के कम्पनों से छिटक एक सरगम आ सहसा कलम बन गई
फिर वरद हस्त आशीष बन उठ गया बारिशें अक्षरों की निरंतर हुईं
शब्द की छंद की माल पिरती हुई आप ही आप आ गीत तब बन गई.
माँ शारदा के चरणों में सादर नमन
आँगन हो गया पराया
जकड़े हुए हमें अपनी कुंडलियों में यादों के विषधर
रजनी गंधा जहां महकती थी आँगन हो गया पराया
जीवन की सीमाओं पर अ
पौधे उगे नागफ़नियों के
सिंचित किये दूध से हमने
उपजे होकर फ़ेनिल सपने
लहरें उमड़ी निगल गईं हैं
नावें सब कोमल भावों की
और तीर हैं फ़न फ़ैलाये
तत्पौर हुए साध को डँसने
पायल की हर इक थिरकन पर उठने लगीं उंगलियां जग क
लेकिन क्या घुँघरू ने कहना चाहा कोई समझ न पाया
पग डगमग हैं निष्ठाओं क
बैसाखी पर नैतिकतायें
मूल्यों की परिभाषायें अब
सुबह शाम नित बदला करतीं
किरणों पर शीशे रख कर जो
रंगा सोच कर चित्र बनेगा
उसमें एक अकेली पीड़
सात रंग में सजी संवरती
तारों से उठती सरगम में सभी तलाशे रागिनियों को
लेकिन तार शब्द जो बोले उनको कोई नहीं सुन पाया
किसका आधिपत्य कितना है
किस पर कब निर्धारित होता
आज पास में जो है अपना
कल है संभव नजर न आये
बदल रहे मौसम की मर्जी
किस दिन क्या वह रूप संवार
भादों बने मरुथली, कार्तिक
संभव है सावन बरसाये
कभी कभी ऐसा लगता है छाई हुई धुन्ध को चीरूँ
और पुन: खड़काऊँ साँकल उसकी द्वार न जो खुल पाया
उत्तरदायित्वों के शव पर
कोई नहीं बहाता आँसू
आक्षेपों के तीर निरन्तर
इनदूजे पर छोड़े जाते
अपनी सुविधा वाली राहे
चुन कर सब ही बैठ गये हैं
दोषारोपण किया राह पर
अगर न मंज़िल का पथ पाते
यों चरित्र हमको अवाक इक दर्शक का ही मिला हुआ है
और नयन ने जो कुछ कहना चाहा कोई नहीं पढ़ पाया
रजनी गंधा जहां महकती थी आँगन हो गया पराया
जीवन की सीमाओं पर अ
पौधे उगे नागफ़नियों के
सिंचित किये दूध से हमने
उपजे होकर फ़ेनिल सपने
लहरें उमड़ी निगल गईं हैं
नावें सब कोमल भावों की
और तीर हैं फ़न फ़ैलाये
तत्पौर हुए साध को डँसने
पायल की हर इक थिरकन पर उठने लगीं उंगलियां जग क
लेकिन क्या घुँघरू ने कहना चाहा कोई समझ न पाया
पग डगमग हैं निष्ठाओं क
बैसाखी पर नैतिकतायें
मूल्यों की परिभाषायें अब
सुबह शाम नित बदला करतीं
किरणों पर शीशे रख कर जो
रंगा सोच कर चित्र बनेगा
उसमें एक अकेली पीड़
सात रंग में सजी संवरती
तारों से उठती सरगम में सभी तलाशे रागिनियों को
लेकिन तार शब्द जो बोले उनको कोई नहीं सुन पाया
किसका आधिपत्य कितना है
किस पर कब निर्धारित होता
आज पास में जो है अपना
कल है संभव नजर न आये
बदल रहे मौसम की मर्जी
किस दिन क्या वह रूप संवार
भादों बने मरुथली, कार्तिक
संभव है सावन बरसाये
कभी कभी ऐसा लगता है छाई हुई धुन्ध को चीरूँ
और पुन: खड़काऊँ साँकल उसकी द्वार न जो खुल पाया
उत्तरदायित्वों के शव पर
कोई नहीं बहाता आँसू
आक्षेपों के तीर निरन्तर
इनदूजे पर छोड़े जाते
अपनी सुविधा वाली राहे
चुन कर सब ही बैठ गये हैं
दोषारोपण किया राह पर
अगर न मंज़िल का पथ पाते
यों चरित्र हमको अवाक इक दर्शक का ही मिला हुआ है
और नयन ने जो कुछ कहना चाहा कोई नहीं पढ़ पाया
हर पल साथ रहे तुम मेरे
ओस में डूब कर फूल की पंखुड़ी भोर की इक किरण को लगी चूमने
गंध फिर तितलियों सी हवा में उड़ी, द्वार कलियों के आकर लगी घूमने
बात इतनी हुई एक पत्ता कहीं आपके नाम का स्पर्श कर आ गया
यों लगा आप चलने लगे हैं इधर, सारा उपवन खुशी से लगा झूमने
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
पतझड़ के पहले पत्ते के गिरने की आहट से लेक
अंकुर नये फ़ूटने के स्वर तक तुम साथ रहे हो मेरे
जब जब ढलती हुई सांझ ने अपना घूँघट जरा निकाला
चन्द्रज्योत्सना वाले मुख पर इक झीना सा परदा डाला
उड़ी धुन्ध के धुंधुआसे दर्पण में चित्र संवारे मैने
और ओढ़नी से तारों की बिन्दु बिन्दु को रखा संभाला
बढ़ते हुए निशा के पथ में मैने रखा हाथ वह थामे
जिसकी शुभ्र कलाई छूकर अस्त हुए स्वयमेव अंधेरे
दिन का दीपक जला जिस घड़ी प्राची की पूजा थाली में
गंध उगाने लगी फूल जब सूखे कीकर की डाली में
दोपहरी आचमन कर गई बही धार के गंगाजल का
और तीसरा पहर अटक कर रहा पीतवर्णी बाली में
तब तब बन कर शलभ रहा मैं साथ ज्योति की अँगड़ाई के
नहीं मेघ की परछाईं फिर डाल सकी आंगन में डेरे
गति के चलते हुए चक्र में कोंपल फिर उगती झर जाती
और शेष हो रह जाती है एक बार जल कर के बाती
एक बार उद्गम से निकला नहीं लौटता कोई वापिस
और बात शब्दों में ढल कर बचती नहीं खर्च हो जाती
लेकिन साथ तुम्हारा मेरे संचय की इक अक्षय निधि है
तॄण भी एक न कम हो पाता बीते संध्या और सवेरे
गंध फिर तितलियों सी हवा में उड़ी, द्वार कलियों के आकर लगी घूमने
बात इतनी हुई एक पत्ता कहीं आपके नाम का स्पर्श कर आ गया
यों लगा आप चलने लगे हैं इधर, सारा उपवन खुशी से लगा झूमने
xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
पतझड़ के पहले पत्ते के गिरने की आहट से लेक
अंकुर नये फ़ूटने के स्वर तक तुम साथ रहे हो मेरे
जब जब ढलती हुई सांझ ने अपना घूँघट जरा निकाला
चन्द्रज्योत्सना वाले मुख पर इक झीना सा परदा डाला
उड़ी धुन्ध के धुंधुआसे दर्पण में चित्र संवारे मैने
और ओढ़नी से तारों की बिन्दु बिन्दु को रखा संभाला
बढ़ते हुए निशा के पथ में मैने रखा हाथ वह थामे
जिसकी शुभ्र कलाई छूकर अस्त हुए स्वयमेव अंधेरे
दिन का दीपक जला जिस घड़ी प्राची की पूजा थाली में
गंध उगाने लगी फूल जब सूखे कीकर की डाली में
दोपहरी आचमन कर गई बही धार के गंगाजल का
और तीसरा पहर अटक कर रहा पीतवर्णी बाली में
तब तब बन कर शलभ रहा मैं साथ ज्योति की अँगड़ाई के
नहीं मेघ की परछाईं फिर डाल सकी आंगन में डेरे
गति के चलते हुए चक्र में कोंपल फिर उगती झर जाती
और शेष हो रह जाती है एक बार जल कर के बाती
एक बार उद्गम से निकला नहीं लौटता कोई वापिस
और बात शब्दों में ढल कर बचती नहीं खर्च हो जाती
लेकिन साथ तुम्हारा मेरे संचय की इक अक्षय निधि है
तॄण भी एक न कम हो पाता बीते संध्या और सवेरे
भाषा नयन की लिख रहा हूँ
चाहता हूँ मैं लिखूँ कुछ प्रीत के नूतन तराने
भाव में डूबे हुए कुछ बिम्ब ले लेकर सुहाने
किन्तु वर्णन न्यायसंगत हो नहीं पाता तनिक भी
शब्द जितने पास मेरे, हो चुके हैं सब पुराने
इसलिये अब शब्द बिन भाषा नयन की लिख रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा
खींचता हूँ आज रेखाचित्र मैं नीले गगन पर
टाँकत हूँ भावना की कूचियाँ लेटे पवन पर
गंध की उमड़ी हुई जो लहर में सिमटे हुए हैं
रंग भरता हूँ वही मैं एक कलिका के बदन पर
उड़ रही इक कल्पना का थाम कर आभास झीना
मैं क्षितिज पर बिन किसी आधार के ही टिक रहा हूँ
ढाल; देता हूँ कलम को अब भवों की भंगिमा में
शब्द्कोशों को समाहित कर नयन की नीलिमा में
धड़कनों में बुन रहा हूँ मैं अधर की थरथराहट
घोलता अभिव्यक्ति चेहरे पर उभरती अरुणिमा में
भाव यूँ तो गूढ़ हूँ मैं, किन्तु परिभाषित रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा हूँ
भाव में डूबे हुए कुछ बिम्ब ले लेकर सुहाने
किन्तु वर्णन न्यायसंगत हो नहीं पाता तनिक भी
शब्द जितने पास मेरे, हो चुके हैं सब पुराने
इसलिये अब शब्द बिन भाषा नयन की लिख रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा
खींचता हूँ आज रेखाचित्र मैं नीले गगन पर
टाँकत हूँ भावना की कूचियाँ लेटे पवन पर
गंध की उमड़ी हुई जो लहर में सिमटे हुए हैं
रंग भरता हूँ वही मैं एक कलिका के बदन पर
उड़ रही इक कल्पना का थाम कर आभास झीना
मैं क्षितिज पर बिन किसी आधार के ही टिक रहा हूँ
ढाल; देता हूँ कलम को अब भवों की भंगिमा में
शब्द्कोशों को समाहित कर नयन की नीलिमा में
धड़कनों में बुन रहा हूँ मैं अधर की थरथराहट
घोलता अभिव्यक्ति चेहरे पर उभरती अरुणिमा में
भाव यूँ तो गूढ़ हूँ मैं, किन्तु परिभाषित रहा हूँ
आईना हूँ आपको अपने सरीखा दिख रहा हूँ
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प्यार के गीतों को सोच रहा हूँ आख़िर कब तक लिखूँ प्यार के इन गीतों को ये गुलाब चंपा और जूही, बेला गेंदा सब मुरझाये कचनारों के फूलों पर भी च...
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जाते जाते सितम्बर ने ठिठक कर पीछे मुड़ कर देखा और हौले से मुस्कुराया. मेरी दृष्टि में घुले हुये प्रश्नों को देख कर वह फिर से मुस्कुरा दिया ...